नेतृत्व मुख्य रूप से कार्यों को करने या संभव बनाने का विज्ञान है। कोई भी शख्स तब तक खुद को नेता नहीं कह सकता, जब तक कि उसके जीवन में कोई ऐसा लक्ष्य न हो जो उससे भी बड़ा हो।

छात्र-नेता को कार्यों को सम्भव बनाना चाहिए

छात्र-नेता की उपस्थिति इसलिए जरूरी हो जाती है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच नहीं पा रहे। वे पहुंचना तो चाह रहे हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वहां तक पहुंचा कैसे जाए।

छात्र-नेता के पास खुद से भी बड़ा लक्ष्य होना चाहिए

अपनी व्यक्तिगत जीवन-यापन की चिंताओं से परे जाकर वह जीवन को एक बड़े फ लक पर देख रहा होता है। छात्रनेता का मतलब है: एक ऐसा व्यक्ति जो उन चीजों को देख और कर सकता है, जो दूसरे लोग खुद के लिए नहीं कर सकते। ऐसा न हो तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। अगर एक नेता भी वही चीजें कर रहा है, जो हर कोई कर रहा है तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। अगर उसकी भी वही सोच है जो हर किसी की है तो आपको नेता की जरूरत ही नहीं है। तब तो नेताओं के बिना हम और बेहतर कर सकते हैं। नेता की उपस्थिति इसलिए जरूरी हो जाती है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच नहीं पा रहे। वे पहुंचना तो चाह रहे हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वहां तक पहुंचा कैसे जाए। इसीलिए एक  नेता जरूरी हो जाता है।

छात्र-नेता का व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढना

व्यक्ति नेता तब बनता है, जब वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढक़र सोचने लगता है, महसूस करने लगता है, और कार्य करने लगता है।

व्यक्ति नेता तब बनता है, जब वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढक़र सोचने लगता है, महसूस करने लगता है, और कार्य करने लगता है।

ऐसा कई बार वह किसी बड़े स्तर पर हो रहे अन्याय की वजह से, तो कई बार संघर्ष के पलों में वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढ़ जाता है। कई बार कुछ लोगों के भीतर की करुणा इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि वे अपनी सीमाओं से परे जाकर सोचने लगते हैं और खुद को ऐसे कामों और विचारों के साथ जोड़ लेते हैं जो उनके निजी स्वार्थों से संबंधित नहीं होते। या फिर कोई इंसान निजी महत्वाकांक्षा के कारण भी नेता बन सकता है।

छात्र-नेता के लिए भौतिकता से परे का अनुभव जरुरी है

कोई शख्स सही अर्थों में तब तक नेता बन ही नहीं सकता जब तक उसके जीवन का अनुभव और जीवन को देखने का तरीका उसकी व्यक्तिगत सीमाओं से परे न चला जाए। यानी नेता बनना या कहें नेतृत्व एक स्वाभाविक प्रक्रिया तब तक नहीं होगी, जब तक कि वह जीवन को देखने, समझने व महसूस करने के तरीके में एक व्यक्ति की सीमाओं से परे नहीं चला जाता।

अगर किसी तरह से आपने जीवन को भौतिकता की सीमाओं से परे महसूस करना शुरु कर दिया, तो आपमें बिना किसी खास कोशिश के, सहज रूप से नेतृत्व का गुण खिल उठेगा। क्योंकि तब आपका सरोकार केवल उन भौतिक सीमाओं से नहीं रह जाता, जिनसे आपके ‘मैं’ की पहचान जुड़ी हुई है। अगर आप अपनी अनुभूतियों के फलक का विस्तार नहीं करते हैं, तो नेतृत्व आपके लिए एक थोपी गई चीज होगी। यह फि र किसी न किसी चीज से संचालित हो रही होगी, यह कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं होगी। अगर नेता बनना एक स्वाभाविक घटना की तरह घटित हो, तो नेतृत्व आपके भीतर खुद ही प्रकट होने लगेगा, और वह भी उसी हद तक जिस हद तक जरुरी हो। जरुरत से आगे जाकर नेतृत्व खुद को आप पर नहीं थोपेगा।

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