क्या है धारा 370, क्यों है इस पर विवाद और क्या यह खत्म हो सकता है?

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अनुच्छेद 370 पर हमेशा देश की राजनीति में उबाल आता रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष स्वायत्ता दी गई है। जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराजा हरि सिंह जब जम्मू-कश्मीर का विलय भारतीय गणराज्य में कर रहे थे तो उस वक्त उन्होंने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन नाम के दस्तावेज पर साइन किया था। अनुच्छेद 370 इसी के अंतर्गत आता है। इसके प्रावधानों को शेख अब्दुला ने तैयार किया था, जिन्हें उस वक्त हरि सिंह और तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।  सरदार पटेल को अंधेरे में रखकर नेहरूजी ने धारा-370 का मसौदा पहले से ही तैयार करवा लिया था। इस धारा का विरोध उस समय कांग्रेस पार्टी में भी हुआ था। पं. नेहरू के समर्थन में और शेख अब्दुला के मंत्रिमंडल से विचार विमर्श के बाद गोपाल स्वामी अय्यंगार ने अनुच्छेद 370 की योजना बनवाई, जो भारत के साथ कश्मीर राज्य के संबंध की व्याख्या करता है। जब इस अनु. को संविधान सभा में रखा गया तब नेहरू जी अमेरिका में थे, लेकिन फार्मूले के मसौदे पर पहले ही उनकी स्वीकृति ले ली गई थी। सरदार पटेल के पत्र बताते हैं कि इस संबंध में उनसे कोई परामर्श नहीं किया गया था।

 कांग्रेस द्वारा 370 का कड़ा विरोध

संविधान सभा में अनु. के मसौदे का खुद कांग्रेस ने जोरदार बल्कि हिंसक ढंग से विरोध किया क्योंकि यह अनु. कश्मीर राज्य को एक विशेष दर्जा प्रदान करता था। सैंधातिक रूप से कांग्रेस पार्टी की यह राय थी कि कश्मीर भी उन्हीं मूलभूत व्यवस्थाओं अर्थात शर्तों के आधार पर संविधान को स्वीकार करे, जिन शर्तों पर अन्य राज्यों ने उसे स्वीकार किया है। पार्टी ने इस शर्त का विशेष रूप से जबरदस्त विरोध किया कि संविधान गत मूलभूत धाराएं यानी बुनियादी अधिकारों, संबंधी धाराएं कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होगीं। गोपाल स्वामी अयंगार ये बात पार्टी के अन्य नेताओं को समझा नहीं सके थे या उन्हें इस पृष्ठभूमी की प्रतीती नहीं करा सके थे। उन्होंने हमेशा की तरह फिर सरदार पटेल के हस्तक्षेप की मांग की। पटेल चाहते थे कि नेहरू जी की अनुपस्थिति में ऐसा कुछ भी न किया जाए, जो उन्हें नीचा उतारने वाला प्रतीत हो। इसलिए नेहरू जी की अनुपस्थिति में सरदार पटेल ने कांग्रेस पार्टी को अपना रवैया बदलने के लिए समझाने का कार्य अपने हाथ में लिया। उनके हस्तक्षेप के बाद संविधान सभा में इस अनु. की बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई। और न इसका विरोध हुआ। ये कार्य सरदार ने अपने स्वभाव के कितने विरुद्ध जाकर किया यह इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि एक समय जब गोपाल स्वामी अयंगार ने पार्टी द्वारा स्वीकृति अनुं. के मसौदे में कुछ फेरबदल कराना चाहा तो पटेल ने 16 अक्टू. 1949 को श्री अय्यंगार को लिखे पत्र में कहा कि जब हमारी पार्टी ने शेख साहब की हाजिरी में सारी व्यवस्था को स्वीकार कर लिया है तो उसके बाद उसमें परिवर्तन करना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। जब कभी शेख साब पलायन करना चाहते हैं तब वह जनता के प्रति अपने कर्तव्य की बात सामने रखकर हमारा विरोध करते हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष स्वायत्ता दी गई है। जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराजा हरि सिंह जब जम्मू-कश्मीर का विलय भारतीय गणराज्य में कर रहे थे तो उस वक्त उन्होंने इंस्टूमेंट ऑफ एक्ंसेशन नाम के दस्तावेज पर साइन किया था। अनुच्छेद 370 इसी के अंतर्गत आता है। इसके प्रावधानों को शेख अब्दुला ने तैयार किया था, जिन्हें उस वक्त हरि सिंह और तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।

क्या है खास– 

  • भारतीय संविधान की धारा 370 जम्मू-कश्मीर  को विशेष दर्जा प्रदान करती है।
  • 1947 में विभाजन के समयजम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह पहले स्वतंत्र रहना चाहते थे लेकिन उन्होंने बाद में भारत में विलय के लिए सहमति दी।
  • जम्मू-कश्मीर में पहली अंतरिम सरकार बनाने वाले नेशनल कॉफ्रेंस के नेता शेख़ अब्दुल्ला ने भारतीय संविधान सभा से बाहर रहने की पेशकश की थी।
  • इसके बाद भारतीय संविधान में धारा 370 का प्रावधान किया गया जिसके तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष अधिकार मिले हुए हैं।
  • 1951 में राज्य को संविधान सभा को अलग से बुलाने की अनुमति दी गई।
  • नवंबर, 1956 में राज्य के संविधान का कार्य पूरा हुआ। 26 जनवरी, 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया।

विशेष अधिकार

– धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है। लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित क़ानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए।

– इसी विशेष दर्जें के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती। इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बरख़ास्त करने का अधिकार नहीं है।

– 1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता। सूचना का अधिकार कानून भी यहां लागू नहीं होता।

– इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कही भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते हैं।

– भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है।वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।

– राज्य की महिला अगर राज्य के बाहर शादी करती है तो वह यहां की नागरिकता गंवा देती है।

क्या यह खत्म हो सकता है

बगैर राज्य सरकार की सहमति के आर्टिकल 370 का खत्म करना केंद्र सरकार के लिए संभव नहीं है। अनुच्छेद 370 के उपबंध 3 के तहत राष्ट्रपति चाहें तो अधिसूचना जारी कर इस आर्टिकल को खत्म कर सकते हैं या उसमें बदलाव कर सकते हैं। लेकिन, ऐसा करने से पहले उन्हें राज्य सरकार से मंजूरी लेने की दरकार होगी। जब नैशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी इसके खिलाफ हैं, तो फिर ऐसी मंजूरी मिलना नामुमकिन सा है।

हो चुके हैं बदलाव

शेख अब्दुल्ला को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री बना दिया था। अनुच्छेद 370 की वजह से ही जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा और प्रतीक चिह्न भी है। हालांकि 370 में समय के साथ-साथ कई बदलाव भी किए गए हैं। 1965 तक वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री नहीं होता था। उनकी जगह सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री हुआ करता था। जिसे बाद में बदला गया। इसके अलावा पहले जम्मू-कश्मीर में भारतीय नागरिक जाता तो उसे अपना साथ पहचान-पत्र रखना जरूरी थी, जिसका बाद में काफी विरोध हुआ। विरोध होने के बाद इस प्रावधान को हटा दिया गया।

क्या कहा कोर्ट ने?

हाईकोर्ट ने कहा है जम्मू-कश्मीर भारत के दूसरे राज्यों की तरह नहीं है। इसे सीमित संप्रभुता (limited sovereignty) मिली हुई है। इसी वजह से इसे विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है। इसके अलावा सिर्फ आर्टिकल 370(1) ही राज्य पर लागू होता है। इसमें राष्ट्रपति को संविधान के किसी भी प्रावधान को राज्य में लागू करने का अधिकार है। लेकिन इसके लिए भी राज्य से सलाह लेना जरूरी है। उन्हें किसी भी कानून को लागू करने, बदलने या हटाने का अधिकार है।

डिफेंस, फॉरेन और कम्युनिकेशन से जुड़े कानून ही बना सकती है संसद

हाईकोर्ट ने कहा कि जम्मू-कश्मीर ने भारत में शामिल होते वक्त अपनी सीमित संप्रभुता कायम रखी थी। उसने अन्य राज्यों की तरह अपना राज्य भारतीय संघ के अधीन नहीं किया था। राज्य को सीमित संप्रभुता की वजह से स्पेशल स्टेट्स मिला हुआ है। आर्टिकल 370 के तहत भारतीय संसद के पास राज्य के डिफेंस, फॉरेन पॉलिसी और कम्युनिकेशन के क्षेत्र में ही कानून बनाने का अधिकार है।

विरोध का इतिहास

‘भारतीय जन संघ’ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 के खिलाफ लड़ाई लड़ने का बीड़ा उठाया था. मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जन संघ की स्थापना की थी, जिसका नाम 1980 में बदल कर भारतीय जनता पार्टी रख दिया गया था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस संवैधानिक प्रावधान के पूरी तरह ख़िलाफ़ थे. उन्होंने कहा था कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रहा है. यही नहीं, मुखर्जी का ये भी मानना था कि यह धारा शेख अब्दुल्ला के ‘तीन राष्ट्रों के सिद्धांत’ को लागू करने की एक योजना है। मुखर्जी 1953 में भारत प्रशासित कश्मीर के दौरे पर गए थे। वहां तब ये क़ानून लागू था कि भारतीय नागरिक जम्मू कश्मीर में नहीं बस सकते और वहां उन्हें अपने साथ पहचान पत्र रखना ज़रूरी था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तब इस क़ानून के खिलाफ भूख हड़ताल की थी. वे जम्मू-कश्मीर जाकर अपनी लड़ाई जारी रखना चाहते थे लेकिन उन्हें जम्मू-कश्मीर के भीतर घुसने नहीं दिया गया. वे गिरफ्तार कर लिए गए थे। 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान उनकी मौत हो गई। पहचान पत्र के प्रावधान को बाद में रद्द कर दिया गया।

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