जानें तीन तलाक से जुड़े विधेयक ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2017’ की मुख्य प्रावधानों को

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केंद्र सरकार ने इस सत्र में तकरीबन 18 महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने के लिए सूचीबद्ध किए हैं। जिसमे मुस्लिम महिलाओं के हितों से जुड़ा हुआ अति महत्वपूर्ण मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2017 एक है। आईये जानते है इस विधेयक से जुड़े हुए मुख्या बिंदु और नजर डालते है सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में सुनाए गए निर्णयों पर,

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2017 लोकसभा में कानून और न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद ने 28 दिसंबर, 2017 को पेश किया था।

विधेयक तलाक कहने को जिसमे लिखित और इलेक्ट्रॉनिक दोनों रूप शामिल है कानूनी रूप से अमान्य और गैरकानूनी बनाता है। बिल के अनुसार तलाक से अभिप्राय है तलाक-ए-बिद्दत या किसी भी दूसरी तरह का तलाक जिसके परिणामस्वरूप मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को इंस्टेंट और इररेवोकेब्ल (जिसे पलटा  ना जा सके) तलाक दे देता है।तलाक-ए-बिद्दत मुस्लिम पर्सनल कानून के अंतर्गत ऐसी प्रथा है जिसके परिणामस्वरूप मुस्लिम पुरुष एक सिटींग में अपनी पत्नी को इंस्टेंट और इररेवोकेब्ल (जिसे पलटा  ना जा सके) तलाक दे देता है।

अपराध और जुर्माना:

विधेयक तलाक को एक संज्ञेय और गैर जमानती अपराध की घोषणा करता है। (एक संज्ञेय अपराध वह है जिसके लिए एक पुलिस अधिकारी वारंट के बिना आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है।) पति पर, तालाक घोषित करने के साथ तीन साल तक जुर्माना लगाया जा सकता है।

भत्ता:

एक मुस्लिम महिला जिसके खिलाफ तलाक घोषित किया गया है, अपने पति से अपने और अपने आश्रित बच्चों के लिए निर्वाह भत्ता लेने का हकदार है। भत्ता की राशि प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा तय की जाएगी।

बच्चों की कस्टडी:

एक मुस्लिम महिला जिसके खिलाफ इस तरह की तलाक घोषित की गई है, वह अपने नाबालिग बच्चों की  कस्टडी लेने का हकदार है। मजिस्ट्रेट द्वारा हिरासत का निर्धारण किया जाएगा।

पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के सुनाए फैसले की 5 बड़ी बातें-

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में अपने सुनाए फैसले में तीन तलाक की प्रथा इस बात को साफ किया था। कोर्ट ने कहा कि तीन तलाक असंवैधानिक है, केंद्र सरकार को इसको लेकर 6 महीने के अंदर कानून बनाना चाहिए. कोर्ट ने अपने फैसले में ये 5 बड़ी बातें कहीं..

  • मुस्लिमों में तीन तलाक के जरिए तलाक देने की प्रथा गैरकानूनी और असंवैधानिक है।
  • 5 में से 3 जजों ने कहा कि ट्रिपल तलाक जैसी कोई भी प्रथा मान्य नहीं है जो कुरान के मुताबिक न हो।
  • 3 जजों का यह भी कहना था कि ट्रिपल तलाक के जरिए तलाक देना एक तरह से मनमानी है, यह संविधान का उल्लंघन है इसे खत्म किया जाना चाहिए।
  • वहीं दो जजों ने कहा कि अगर केंद्र सरकार अगले 6 महीने में इसको लेकर कानून नहीं बनाया तो इस पर बैन जारी रहेगा।
  • देश की सर्वोच्च अदालत ने सभी राजनीतिक पार्टियों को कहा कि कानून बनाने के लिए अपने मतभेदों को किनारे रखते हुए केंद्र सरकार की मदद करें। मुख्य न्यायधीश जे.एस. खेहर और जस्टिस नजीर ने अपने फैसले में विचार व्यक्त किया कि केंद्र जो भी कानून बनाए उसमें मुस्लिम लॉ और शरियत की चिंताओं को भी शामिल किया जाए।

इन पांच जजों की बेंच ने सुनाया थाफैसला,

  1. चीफ जस्टिस जेएस खेहर
  2. जस्टिस कुरियन जोसेफ
  3. जस्टिस आरएफ नरिमन
  4. जस्टिस यूयू ललित
  5. जस्टिस अब्दुल नज़ीर

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