चुनाव आयोग ने की दोषी नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन बैन की मांग, जानें- आयोग में बारे में सब कुछ…

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एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जा चुके नेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। साथ ही, आयोग ने इन मामलों को जल्द निपटाने की बात भी कही है। आयोग का मानना है कि आपराधिक मामलों में आरोपी नेताओं का ट्रायल एक वर्ष के भीतर पूरा हो जाना चाहिए। फिलहाल दोषी ठहराया गया कोई नागरिक 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ सकता। आयोग ने कहा कि वह जनप्रतिनिधियों, सरकारी कर्मचारियों और न्यायपालिका के सदस्यों से जुड़े आपराधिक मामलों का फैसला करने के लिए विशेष अदालतें बनाने के भी पक्ष में है। विधायकों के लिए न्यूनतम योग्यता और अधिकतम आयु की सीमा तय करने से जुड़ी मांग पर आयोग ने कहा कि यह मुद्दा कानूनी दायरे में आता है और इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा।

आयोग का कहना था कि वह राजनीति के अपराधीकरण के मुद्दे को संवैधानिक और वैधानिक ढांचे के तहत उठा रहा है। इसके साथ ही इस मुद्दे पर आयोग के कार्यों और शक्तियों से जुड़े आर्टिकल 324 की भी मदद ली जा रही है। आयोग ने बताया कि उसने निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने और लोकतंत्र से अपराधीकरण को दूर करने के लिए आवश्यक निर्देश भी जारी किए हैं। साथ ही, आयोग ने कहा है कि चुनाव सुधार को लेकर उन्होंने विस्तृत प्रस्ताव सरकार को सौंप दिया है। इनमें अपराधमुक्त राजनीति, रिश्वत को संज्ञेय अपराध बनाना, पेड न्यूज पर पाबंदी और मतदान के 48 घंटे पहले तक विज्ञापनों पर प्रतिबंध आदि हैं। आयोग ने कहा कि अधिकतर सिफारिशों को विधि आयोग ने अपनी 244 और 255वीं रिपोर्ट को अप्रूव कर दिया है। फिलहाल यह केंद्र सरकार के विचाराधीन है और अब तक उन्हें मंजूरी नहीं मिली है। आयोग ने कहा कि यह राजनीति को संवैधानिक और कानूनी ढांचे के अंदर अपराधमुक्त करने की पुरजोर हिमायत करता रहा है।

इससे पहले चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार से देश में एक व्यक्ति द्वारा 2 सीटों से चुनाव लड़ने के प्रावधान को खत्म करने की सिफारिश की थी। हालांकि, आयोग ने यह भी कहा था कि यदि सरकार इस प्रावधान को बनाए रखना चाहती है तो उप-चुनाव का खर्च उठाने की ज़िम्मेदारी सीट छोड़ने वाले उम्मीदवार पर ही डाली जाए।जनप्रतिनिधित्व कानून किसी व्यक्ति को आम चुनाव या उप-चुनाव या दो साल पर होने वाले चुनाव में अधिकतम दो सीटों से किस्मत आजमाने की इजाजत देता है। हालांकि, दोनों सीटें जीत जाने पर कोई व्यक्ति इनमें से किसी एक सीट पर ही कायम रह सकता है और दूसरी सीट उसे छोड़नी पड़ती है। चुनाव कानूनों में 1996 में हुए एक संशोधन से पहले किसी व्यक्ति की ओर से लड़ी जा सकने वाली सीटों की संख्या पर कोई बंदिश नहीं थी ।

इससे पहले आयोग  ने देशभर के 255 राजनीतिक दलों को डीलिस्ट यानि अपंजीकृत कर दिया था। आयोग के पास किसी राजनीतिक पार्टी को पंजीकृत करने का अधिकार तो है, लेकिन चुनावी कानूनों के तहत उसके पास किसी पार्टी को अपंजीकृत करने का अधिकार नहीं है। किसी पार्टी को अपंजीकृत करने का अधिकार दिए जाने की आयोग की मांग कानून मंत्रालय में लंबित है। हालांकि, आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल कर निष्क्रिया हो चुकी और लंबे समय से चुनाव नहीं लड़ने वाली पार्टियों को डीलिस्ट किया है। देश में 1780 से ज्यादा पंजीकृत, लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियां हैं। आयोग का मानना था कि इनमें से अधिकतर दल सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं ताकि चंदा लेकर लोगों के काले धन को सफेद करने में मदद की जा सके।

भारत निर्वाचन आयोग के बारे में

भारतीय निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त एवं अर्ध-न्यायिक संस्थान है जिसका गठन भारत में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से विभिन्न से भारत के प्रतिनिधिक संस्थानों में प्रतिनिधि चुनने के लिए गया था। भारतीय संविधान के भाग-15 के अनुच्छेद-324 से 329 में निर्वाचन से संबंधित उपबंध दिया गया है। निर्वाचन आयोग का गठन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्तों से किया जाता है, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। भारत एक समाजवादी, धर्म निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य एवं विष्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। आधुनिक भारतीय राश्ट्र राज्य 15 अगस्त, 1947 को अस्तित्व में आया था। तब से संविधान में प्रतिश्ठापित सिद्धान्तों, निर्वाचन विधियों तथा पद्धति के अनुसार नियमित अन्तरालों पर स्वतंत्र तथा निश्पक्ष निर्वाचनों का संचालन किया गया है। भारत के संविधान ने संसद और प्रत्येक राज्य के विधान मंडल तथा भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के संचालन की पूरी प्रक्रिया का अधीक्षण, निदेषन तथा नियंत्रण का उत्तरदायित्व भारत निर्वाचन आयोग को सौंपा है। भारत निर्वाचन आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है। संविधान के अनुसार निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को की गई थी। आयोग ने अपनी स्वर्ण जयंती वर्श 2001 में मनाई थी। आयोग में केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे। वर्तमान में इसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त हैं। 16 अक्तूबर, 1989 को पहली बार दो अतिरिक्त आयुक्तों की नियुक्ति की गई थी परन्तु उनका कार्यकाल बहुत कम था जो 01 जनवरी, 1990 तक चला। तत्पष्चात् 01 अक्तूबर, 1993 को दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई थी। तब से आयोग की बहु-सदस्यीय अवधारणा प्रचलन में है, जिसमें निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है।

निर्वाचन आयोग के मुख्य कार्य:

(i) चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन,
(ii) मतदाता सूचियों को तैयार करवाना,
(iii) विभिन्न राजनितिक दलों को मान्यता प्रदान करना,
(iv) राजनितिक दलों को आरक्षित चुनाव चिन्ह प्रदान करना,
(v) चुनाव करवाना,
(vi) राजनितिक दलों के लिए आचार संहिता तैयार करवाना.

आयुक्तों की नियुक्ति एवं कार्यकाल

मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। उनका कार्यकाल 6 वर्ष तक, या 65 वर्ष की आयु तक, इनमें से जो भी पहले हो, तक का होता है। उनका वही स्तर होता है जो कि भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों का होता है तथा उन्हें उनके समतुल्य ही वेतन और अनुलाभ मिलते हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से, केवल संसद द्वारा महाभियोग के माध्यम से हटाया जा सकता है। नियुक्ति के पश्चात मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों की सेवा-शर्तों में कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता है और मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों का वेतन भरता की संचित निधि में से दिया जाता है।

कार्य निष्पादन

आयोग अपने कार्यों का निष्पादन, नियमित बैठकों के आयोजन और दस्तावेजों के परिचालन द्वारा करता है। आयोग द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया में सभी निर्वाचन आयुक्तों के पास समान अधिकार होते हैं। समय-समय पर आयोग अपने सचिवालय में अपने अधिकारियों को कुछ कार्यकारी प्रकार्यों का प्रत्यायोजन करता है।

संरचना

आयोग का नई दिल्ली में एक पृथक सचिवालय है जिसमें लगभग 300 अधिकारी/कर्मचारी पदानुक्रम रूप से कार्य करते हैं। आयोग के कार्यों में सहयोग देने के लिए सचिवालय के वरिश्ठतम अधिकारी के रूप में दो या तीन उप निर्वाचन आयुक्त और महानिदेषक होते हैं। वे सामान्यतः देष की राश्ट्रीय सिविल सेवा से नियुक्त किए जाते हैं और उनका चयन व कार्यकाल सहित उनकी नियुक्ति आयोग द्वारा की जाती है। इसी तरह से, निदेषक, प्रधान सचिव, सचिव, अवर सचिव और उप निदेषक, उप निर्वाचन आयुक्तों और महानिदेषकों को सहयोग देते हैं। आयोग में कार्य का प्रकार्यात्मक और प्रादेषिक वितरण किया गया है। कार्य को डिविजनों, षाखाओं और अनुभागों में वितरित किया गया है; उल्लिखित इकाईयों में से प्रत्येक आखिरी इकाई अनुभाग अधिकारी के प्रभार में होती है। मुख्य प्रकार्यात्मक प्रभाग हैः योजना, न्यायिक, प्रषासन, सुव्यवस्थित मतदाता षिक्षा एवं निर्वाचक सहभागिता (स्वीप), सूचना प्रणालियां, मीडिया और सचिवालय समन्वयन। विभिन्न जोन के लिए उत्तरदायी पृथक-इकाईयों के मध्य प्रादेषिक कार्य का बँटवारा किया गया है जिसके लिए प्रबंधन की सुविधा हेतु देष के 35 संघटक राज्यों और संघ राज्य-क्षेत्रों को समूहीकृत किया गया है।

राज्य स्तर पर निर्वाचन कार्य का अधीक्षण राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा आयोग के समग्र अधीक्षण, निदेषन और नियंत्रण के अध्यधीन किया जाता है, इन मुख्य निर्वाचन अधिकारियों की नियुक्ति संबंधित राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित वरिश्ठ सिविल सेवकों में से आयोग द्वारा की जाती है। अधिकतर राज्यों में वे एक पूर्णकालिक अधिकारी होते हैं और उनके पास सहायक स्टाफ की छोटी सी एक टीम होती है।

जिला एवं निर्वाचन क्षेत्र स्तरों पर जिला निर्वाचन अधिकारी, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और रिटर्निंग अधिकारी होते हैं जिन्हें बड़ी संख्या में कनिश्ठ पदाधिकारियों का सहयोग मिलता है और वे निर्वाचन कार्य निश्पादित करते हैं। वे सभी अपने अन्य दायित्वों के अतिरिक्त निर्वाचनों से संबंधित अपने प्रकार्यों का भी निश्पादन करते हैं। तथापि, निर्वाचन के दौरान, वे आयोग के लिए कमोबेष, पूर्णकालिक आधार पर उपलब्ध होते हैं।

देष व्यापी स्तर पर साधारण निर्वाचन का संचालन करने के लिए अति विषाल कार्यबल में लगभग पाँच मिलियन निर्वाचन कर्मी एवं सिविल पुलिस बल षामिल हैं। यह विषाल निर्वाचन तंत्र निर्वाचन आयोग की प्रतिनियुक्ति पर माना जाता है और निर्वाचन अवधि, जो डेढ़ से दो महीनों की अवधि तक विस्तारित होती है, के दौरान उसके नियंत्रण, अधीक्षण एवं अनुषासन के अध्यधीन होता है।

बजट एवं व्यय

आयोग सचिवालय का अपना एक स्वतंत्र बजट होता है जिसे आयोग और संघ सरकार के वित्त मंत्रालय के परामर्ष से अंतिम रूप दिया जाता है। वित्त मंत्रालय सामान्य रूप से आयोग के बजट हेतु इसकी संस्तुतियों को स्वीकार कर लेता है। तथापि, निर्वाचनों के वास्तविक संचालन पर मुख्य व्यय, संघ राज्यों तथा संघ षासित क्षेत्रों की संबंधित घटक इकाईयों के बजट में प्रतिबिंबित किया जाता है। यदि निर्वाचन केवल लोक सभा के लिए ही करवाए जाते हैं तो व्यय समग्र रूप से संघ सरकार द्वारा वहन किया जाता है जबकि केवल राज्य विधान मंडल के लिए करवाए जाने वाले निर्वाचनों के लिए सारा व्यय संबंधित राज्य द्वारा वहन किया जाता है। संसदीय एवं राज्य विधान मंडल के निर्वाचन साथ-साथ होने की स्थिति में, केन्द्र एवं राज्य सरकार के बीच व्यय की समान रूप से हिस्सेदारी होती है। पूंजीगत उपस्कर, निर्वाचक नामावलियों को तैयार करने संबंधी व्यय तथा निर्वाचकों के पहचान पत्रों संबंधी योजना का व्यय भी समान रूप से बांट लिया जाता है।

कार्यकारी हस्तक्षेप प्रतिबंधित

अपने कार्यों के निश्पादन में, निर्वाचन आयोग कार्यकारी हस्तक्षेप से मुक्त है। आयोग ही निर्वाचनों के संचालन के लिए निर्वाचन कार्यक्रम के बारे में निर्णय लेता है चाहे वह साधारण निर्वाचन हों या उप निर्वाचन। पुनः, आयोग ही मतदान केन्द्रों की अवस्थिति, मतदान केन्द्रों के अनुसार मतदाताओं का आबंटन, मतगणना केन्द्रों की अवस्थिति, मतदान केन्द्रों एवं उसके आस-पास किए जाने वाले प्रबंधों और मतगणना केंद्रों तथा सभी संबंधित मामलों पर निर्णय लेता है।

राजनीतिक दल एवं आयोग

राजनीतिक दल विधि के अधीन निर्वाचन आयोग के साथ पंजीकृत हैं। आयोग उन पर सामयिक अंतरालों पर संगठन संबंधी निर्वाचन करवाने हेतु जोर देकर उनके कामकाज में आंतरिक दलीय लोकतंत्र सुनिष्चित करता है। निर्वाचन आयोग के साथ इस प्रकार पंजीकृत राजनैतिक दलों को निर्वाचन आयोग, अपने द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार, साधारण निर्वाचनों में राजनैतिक दलों के मतदान प्रदर्शन के आधार पर राज्यीय एवं राष्ट्रीय स्तर की मान्यता प्रदान करता है। आयोग, अपने अर्ध-न्यायिक अधिकार क्षेत्र के भाग के रूप में, ऐसे मान्यता प्राप्त दलों से अलग हुए दलों के बीच के विवादों का भी निपटान करता है। निर्वाचन आयोग, राजनीतिक दलों की सहमति से तैयार की गई आदर्ष आचार संहिता का उनके द्वारा कड़ाई से अनुपालन करवाकर निर्वाचन मैदान में राजनीतिक दलों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करता है। आयोग राजनीतिक दलों के साथ आवधिक रूप से निर्वाचनों के संचालन संबंधी मामलों एवं आदर्श आचार संहिता के अनुपालन और आयोग द्वारा निर्वाचन संबंधी मामलों पर प्रस्तावित नए उपायों को लागू करने पर विचार विमर्श करता है।

परामर्शी अधिकार क्षेत्र एवं अर्ध-न्यायिक प्रकार्य

संविधान के अधीन आयोग के पास संसद एवं राज्य विधान मंडलों के आसीन सदस्यों की निर्वाचन के पश्चात निरर्हता के मामले में परामर्शी अधिकार हैं। इसके अतिरिक्त निर्वाचनों में भ्रष्ट आचरण के लिए दोशी पाए जाने वाले व्यक्तियों के मामले, जो कि उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं, भी आयोग की राय जानने के लिए कि क्या ऐसे लोगों को निर्रहित कर दिया जाए और, यदि हां, तो कितने समय के लिए, संबंधी मामले आयोग को सन्दर्भित किए जाते हैं। ऐसे सभी मामलों में आयोग की राय राश्ट्रपति या राज्यपाल, यथामामला जिन्हें ऐसी राय प्रस्तुत की जाती है, पर बाध्यकारी होते हैं। आयोग के पास ऐसे अभ्यर्थी, जो विधि द्वारा निर्धारित समय और रीति से अपने निर्वाचन व्यय के लेखे दाखिल करने में असफल हो जाते हैं, को निर्रहित करने का अधिकार है। आयोग के पास विधि के अधीन अन्य निर्रहता तथा साथ ही ऐसी निर्रहता की अवधि को समाप्त करने या कम करने का अधिकार भी है।

न्यायिक समीक्षा

आयोग के निर्णयों को भारत के उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में उचित याचिका द्वारा चुनौती दी जा सकती है। लंबे समय से चली आ रही परिपाटी और अनेक न्यायिक घोशणाओं के द्वारा, यदि एक बार निर्वाचनों की वास्तविक प्रक्रिया षुरू हो जाती है तो न्यायपालिका मतदान के वास्तविक संचालन में हस्तक्षेप नहीं करती है। एक बार मतदान समाप्त हो जाने एवं परिणाम घोशित हो जाने पर, आयोग किसी परिणाम का पुनरीक्षण स्वयं नहीं कर सकता है। संसदीय एवं राज्य विधान मण्डलों के निर्वाचनों के संबंध में इसका पुनरीक्षण केवल निर्वाचन याचिका की प्रक्रिया के माध्यम से किया जा सकता है जो कि उच्च न्यायालय के समक्ष रखी जाती है। राश्ट्रपतीय और उप राश्ट्रपतीय कार्यालयों के निर्वाचनों के संबंध में, ऐसी याचिका केवल उच्चतम न्यायालय के समक्ष ही दायर की जा सकती है।

मीडिया नीति

मीडिया के संबंध में आयोग की व्यापक नीति है। निर्वाचन अवधि के दौरान एवं अन्य अवसरों पर यथा आवश्यकता और विशिष्ट अवसरों पर लघु अंतरालों पर प्रिंट एवं इलेक्ट्राॅनिक मास मीडिया के लिए यह नियमित ब्रीफिंग आयोजित करता है। मीडिया के प्रतिनिधियों को मतदान एवं मतगणना के वास्तविक संचालन पर रिपोर्ट बनाने के लिए सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती हैं। उन्हें आयोग द्वारा जारी प्राधिकार पत्रों के आधार पर मतदान केन्द्रों एवं गणना केन्द्रों में जाने की अनुमति दी जाती है। इसमें अंतर्राश्ट्रीय एवं राश्ट्रीय मीडिया दोनों के सदस्य षामिल होते हैं। आयोग सांख्यिकीय रिपोर्ट एवं अन्य दस्तावेज प्रकाषित करता है जो लोकव्यापी रूप में उपलब्ध होते हैं। आयोग का पुस्तकालय मीडिया प्रतिनिधियों एवं अन्य कोई भी इच्छुक व्यक्ति जो इसमें रूचि रखता हो, के शोध एवं अध्ययन के लिए उपलब्ध है।

आयोग ने मतदाताओं की जागरूकता के लिए राज्य के स्वामित्व वाले मीडिया – दूरदर्शन एवं आका।वाणी के सहयोग से बड़ा प्रचार अभियान चलाया है। प्रसार भारती काॅर्पोरेशन, जो राष्ट्रीय रेडियो एवं टेलीविजन नेटवर्क का प्रबंधन करती है, ने इस उद्देश्य के लिए अनेक नवीन एवं प्रभावकारी लघु क्लिप बनाई हैं।

मतदाता शिक्षा

लोकतान्त्रिक एवं निर्वाचन प्रक्रियाओं में मतदाता सहभागिता किसी भी लोकतन्त्र की सफलता के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है और लोकतान्त्रिक निर्वाचनों का पूर्ण आधार यही है। इस तथ्य को पहचानते हुए, निर्वाचन आयोग ने वर्श 2009 में निर्वाचन प्रबन्धन के अभिन्न अंग के रूप में मतदाता शिक्षा और निर्वाचन सहभागिता को औपचारिक रूप से अपनाया है।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

भारत, लोकतंत्र और निर्वाचन सहायता हेतु अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, (आई डी ई ए) स्टाॅकहोम, स्वीडन का एक संस्थापक सदस्य है। अभी हाल ही में, आयोग ने निर्वाचन प्रबंधन एवं प्रषासन, निर्वाचक विधियां एवं सुधार के क्षेत्र में अपने अनुभव एवं विषेश जानकारी को साझा करने के लिए अंतर्राश्ट्रीय संबंधो को बढ़ाया है। विभिन्न देषों यथा रूस, श्रीलंका, नेपाल, इंडोनेषिया, दक्षिण अफ्रीका, बांग्लादेष, थाईलैण्ड, नाइजीरिया, नामीबिया, भूटान, आस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका और अफगानिस्तान इत्यादि के राश्ट्रीय निर्वाचन निकायों के निर्वाचन अधिकारी और अन्य षिश्ट मंडल भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया को बेहतर रूप से समझने के लिए आयोग का दौरा कर चुके हैं। आयोग ने संयुक्त राश्ट्रसंघ और राश्ट्रमंडल सचिवालय के सहयोग से अन्य देषों के निर्वाचनों के लिए प्रेक्षकों और विषेशज्ञों को भी उपलब्ध कराया था।

नई पहलें

आयोग ने हाल ही पूर्व में कई नई पहल की हैं। इनमें से कुछ उल्लेखनीय हैं – राजनैतिक दलों द्वारा रेडियो प्रसारण/दूरदर्षन प्रसारण के लिए राज्य के स्वामित्व वाली इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के प्रयोग पर योजना बनाना, राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगाना, निर्वाचक नामावलियों का कंप्यूटरीकरण, निर्वाचकों को पहचान पत्र उपलब्ध करवाना, अभ्यर्थियों द्वारा लेखों के रख रखाव करने और उन्हें जमा कराने की प्रक्रिया को सरल बनाना तथा आदर्ष आचार संहिता के कड़ाई से अनुपालन हेतु विविध उपाय करना, निर्वाचनों के दौरान अभ्यर्थियों को एक समान अवसर उपलब्ध करवाना।

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