भारतीय संविधान में या फिर संसद के द्वारा पारित किसी भी अन्य विधि में लाभ के पद को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। इसकी जड़ें ब्रिटिश कानून ऐक्ट्स ऑफ यूनियन 1707 में है। दरअसल, ब्रिटेन में यह संसदीय परंपरा है कि सांसदों को लाभ के पद पर बैठने की अनुमति नहीं है और जब भी वहां कोई नया पद बनाया जाता है, उसके बारे में कानून बना कर स्पष्ट किया जाता है कि वह लाभ का पद है या नहीं। लेकिन भारत में इस परंपरा को तो अपनाया गया पर लाभ के पद की परिभाषा को अस्पष्ट छोड़ दिया गया। 1959 में बने एक कानून में उन पदों की एक सूची है जिन्हें लाभ का पद नहीं माना गया है और जो पद इस सूची में शामिल नहीं हैं, उन्हें लाभ का पद माना जा सकता है।

हालांकि लाभ के पद के बारे में संविधान में उल्लेख जरूर किया गया है। जनप्रतिनिधियों की अयोग्यता का कारण बनने वाला ‘लाभ का पद’ संविधान के अनुच्छेद 102(1)(ए) में सांसदों या विधायकों के ऐसे पद लेने पर रोक का प्रावधान है जिनमें वेतन, भत्ते या अन्य लाभ मिलते हों। इसके स्पष्टीकरण के अनुसार कोई भी व्यक्ति केवल इस कारण भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का या किसी राज्य का मंत्री है। इसमें उन सभी पदों को भी शामिल किया गया है जिन्हें संसद या राज्य सरकार के द्वारा मंत्री पद का दर्जा दिया गया है।

अनुच्छेद 103- संसद के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 102 के खंड 1 की किसी शर्त के कारण अयोग्य हो गया है या नहीं यह प्रश्न राष्ट्रपति के पास विमर्श के लिए भेजा जाएगा। ऐसे किसी भी मामले में निर्णय करने से पहले राष्ट्रपति, निर्वाचन आय़ोग की राय लेगा और उसकी राय के अनुसार कार्य करेगा।

इसके अलावा, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम,1951 के सेक्शन 9(ए) और संविधान के अनुच्छेद 191(1)ए के अनुसार भी सांसदों और किसी भी राज्य के विधायकों को अन्य पद ग्रहण करने के लिए रोक का प्रावधान है। कोई भी सांसद या विधायक दो जगहों से वेतन और भत्ते आदि प्राप्त नहीं कर सकता है।

लाभ का पद की शर्तें

– लाभ का पद वह पद कहा जाता है जिस पर नियुक्ति सरकार करती हो और नियुक्त व्यक्ति को हटाने और उसके कार्यक्षेत्र को नियंत्रित करने का अधिकार सरकार के पास में ही हो।

– पद पर नियुक्त वयक्ति को पद के साथ-साथ अन्य वेतन और भत्ते आदि सभी का लाभ मिलता हो।

– जिस जगह या पद पर नियुक्ति हुई हो वहां फंड रिलीज करना, जमीन का आवंटन और किसी भी तरह के लाइसेंस जारी करना एवं रद्द करना आदि शामिल हों।

– ऐसा कोई भी पद जो कि किसी भी अन्य व्यक्ति के निर्णय को प्रभावित कर सकता हो वह लाभ का पद माना जाता है।

लाभ के पद के मामले

– साल 2001 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन की संसद सदस्यता उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दी थी क्योंकि राज्यसभा में नामांकन पत्र दाखिल करते समय वह झारखंड सरकार द्वारा झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद के अध्यक्ष के रूप में लाभ के पद पर थे।

– साल 2006 में कांग्रेस पार्टी की पूर्व अध्यक्षता सोनिया गांधी को लोकसभा से इस्तीफा देकर रायबरेली से फिर से चुनाव लड़ना पड़ा था क्यों कि सांसद होने के साथ-साथ वह राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के पद पर भी थीं।

– साल 2006 में जया बच्चन राज्यसभा सांसद होने के साथ यूपी फिल्म विकास निगम की अध्यक्षा भी थीं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर किसी सांसद या विधायक ने लाभ का पद लिया है तो फिर उसकी सदस्यता समाप्त होगी चाहें उसने वेतन और दूसरे भत्ते आदि लिए हों या नहीं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संविधान में इस अनुच्‍छेद को रखने का उद्देश्य विधानसभा को किसी भी तरह के सरकारी दबाव से मुक्त रखना था, क्‍योंकि अगर लाभ के पदों पर नियुक्त व्यक्ति विधानसभा का भी सदस्य होगा तो इससे वह प्रभाव डालने की कोशिश कर सकता है।

 

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