क्या सच में सुलझ गया बरमूडा ट्राएंगल का रहस्य, जानें- इस शैतानी टापू से लौटकर आना क्यों है मुश्किल?

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फोटो स्रोत- सोशल मीडिया
ऐसा माना जा रहा है कि बरमूडा ट्राएंगल (नार्थ अटलांटिक महासागर का वह हिस्सा जिसे ‘डेविल्स ट्राएंगल’ यानी ‘शैतानी त्रिभुज’ भी कहा जाता है) की पहेली को सुलझा लिया गया है। साइंस चैनल ‘What on Earth?’ पर प्रसारित की गई एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है और कहा गया है कि अजीब तरह के बादलों की मौजूदगी के चलते ही हवाई जहाज और पानी के जहाजों के गायब होने की घटनाएं बरमूडा ट्राएंगल के आस पास देखने को मिलती है। इससे पहले  ऑस्ट्रेलिया में किए गए शोध से पता चला था कि इस समुद्री क्षेत्र के बड़े हिस्से में मिथेन हाईड्राइड की बहुलता है। इससे उठने वाले बुलबुले भी किसी जहाज के अचानक डूबने का कारण बन सकते हैं।

इन बादलों को Hexagonal clouds नाम दिया गया है जो हवा में एक बम विस्फोट की मौजूदगी के जितनी शक्ति रखते हैं और इनके साथ 170 मील प्रति घंटा की रफ़्तार वाली हवाएं होती हैं। ये बादल और हवाएं ही मिलकर पानी और हवा में मौजूद जहाजों से टकराते हैं और फिर वो कभी नहीं मिलते। हजारों स्क्वायर किलोमीटर में फैला यह इलाका पिछले कई सौ सालों से बदनाम रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक बेहद तेज रफ़्तार से बहती हवाएं ही ऐसे बादलों को जन्म देती हैं। ये बादल देखने में भी बेहद अजीब रहते हैं और एक बादल का दायरा कम से कम 45 फ़ीट तक होता है।

हेक्सागोनल दरअसल बादलों का एक खास तरह का पैटर्न है। सैटेलाइट से ये बादल मधुमक्खी के छत्तों जैसे दिखाई देते हैं और इनके हर कोठे का दायरा 45 फीट तक का होता है। सैटेलाइट इमेजेस में इस तरह के बादलों की उपस्थिति इंग्लैंड व आयरलैंड के पास भी मिली है, जहां इनकी संख्या बरमूडा ट्राएंगल से कहीं ज्यादा है। वैसे ऐसी हेक्सागोनल आकृतियां शनि ग्रह पर भी अक्सर देखी जाती रही हैं। ये बादल एक तरह के एयर बम जैसा काम करते हैं।

इनकी उपस्थिति जमीन के आसपास के इलाकों में न होकर गहरे समुद्री इलाकों में ही दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ये बादल बरमूडा द्वीप के दक्षिणी छोर पर पैदा होते हैं और फिर करीब 20 से 55 मील का सफर तय करते हैं। इनसे पानी 170 मील की रफ्तार से समुद्र पर गिरता है, तो वहां 150 मीटर गहरा और आधा किलोमीटर चौड़ा गड्ढा बन जाता है, जो भंवर जैसा दिखाई देता है। इस उठापटक के दौरान आसपास के इलाकों में इतनी ऊर्जा पैदा होती है कि कंपास क्या, विमानों और जहाजों की कई मशीनें तक खराब हो जाती है। यह बात और है कि बरमूडा ट्राएंगल में दुघर्टनाएं अब बहुत कम होती हैं।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ये हवाएं इन बड़े बड़े बादलों का निर्माण करती हैं और एक विस्फोट की तरह समुद्र के पानी से टकराते हैं और सुनामी से भी ऊंची लहरे पैदा करते हैं जो आपस में टकराकर और ज्यादा ऊर्जा पैदा करती हैं। इस दौरान ये अपने आस-पास मौजूद सब कुछ बर्बाद कर देते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक ये बादल बरमूडा आइलैंड के दक्षिणी छोर पर पैदा होते हैं और फिर करीब 20 से 55 मील का सफ़र तय करते हैं। कोलराडो स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और मीट्रियोलोजिस्ट Dr Steve Miller ने भी इस दावे का समर्थन किया है। उन्होंने भी दावा किया है कि ये बादल अपने आप ही पैदा होते हैं और उन्हें ट्रैक कर पाना भी बेहद मुश्किल है।

बरमूडा ट्राएंगल करीब 440,000 मील तक के समुद्री क्षेत्र में फैला हुआ है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के क्षेत्रों को मिला दे तो भी इसकी तुलना में यह क्षेत्र अधिक विस्तृत होगा। यह त्रिकोण निश्चित रूप से एक ही जगह स्थिर नहीं है। इसका प्रभाव त्रिकोण क्षेत्र के बाहर भी महसूस किया जा सकता है।

अमेरिका का बमवर्षक हो गया गायब

बीते 100 सालों में यहां हज़ारों लोगों की जान गई है। एक आंकड़े में यह तथ्य सामने आया है कि यहां हर साल औसतन 4 हवाई जहाज़ और 20 समुद्री जहाज़ रहस्यमयी तरीके से गायब होते हैं। 1945 में अमेरिका के पांच टारपीडो बमवर्षक विमानों के दस्ते ने 14 लोगों के साथ फोर्ट लोडअरडेल से इस त्रिकोणीय क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरी थी। यात्रा के लगभग 90 मिनट बाद रेडियो ऑपरेटरों को सिग्नल मिला कि कम्पास काम नहीं कर रहा है। उसके तुरंत बाद संपर्क टूट गया और उन विमानों में मौजूद लोग कभी वापस नहीं लौटे। उनके बचाव कार्य में गए तीन विमानों का भी कोई नामों-निशान नहीं मिला। शोधकर्ताओं का मानना है कि यहां समुद्र के इस भाग में एक शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र होने के कारण जहाज़ों में लगे उपकरण काम करना बंद कर देते हैं। जिस कारण जहाज़ रास्ता भटक जाते हैं और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।

कोलंबस ने सबसे पहले इसे देखा

बरमूडा ट्राएंगल के बारे में सबसे पहले सूचना देने वाले क्रिस्टोफर कोलंबस ही थे। कोलंबस ही वह पहले शख्स थे जिनका सामना बरमूडा ट्रायएंगल से हुआ था। उन्होंने अपनी पत्रिकाओं में इस त्रिकोण में होने वाली गतिविधियों का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि जैसे ही वह बरमूडा त्रिकोण के पास पहुंचे, उनके कम्पास (दिशा बताने वाला यंत्र) ने काम करना बंद कर दिया। इसके बाद क्रिस्टोफर कोलंबस को आसमान में एक रहस्यमयी आग का गोला दिखाई दिया, जो सीधा जाकर समुद्र में गिर गया।

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