जानिए क्या है समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) और क्यों है इस पर विवाद?

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समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा। यूनियन सिविल कोड का अर्थ एक निष्पक्ष कानून है, जिसका किसी धर्म से कोई ताल्लुक नहीं है।

संविधान में समान नागरिक संहिता को लागू करना अनुच्‍छेद 44 के तहत राज्‍य की जिम्‍मेदारी बताया गया है, लेकिन ये आज तक देश में लागू नहीं हो पाया। इसे लेकर एक बड़ी बहस चलती रही है। संविधान सभा में काफी विचार-विमर्श के बाद संविधान के नीति निदेशक तत्वों में यह प्रावधान किया गया था कि राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लाने का प्रयास करेगा। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि सरकार पूरे देश में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगी। हालांकि, यह अब तक लागू नहीं हो पाया है। समान नागरिक संहिता का मसला धार्मिक पेचीदगियों की वजह से हमेशा संवेदनशील रहा है, इसलिए सरकारों ने इस पर कभी कोई ठोस पहलकदमी नहीं की।

औपनिवेशकालीन भारत में 1840 की लेक्स लोसाय रिपोर्ट ने जोर देकर कहा था कि अपराध, सबूत और अनुबंध को लेकर कानूनों में समान संहिता आवश्यक है, लेकिन इसके बावजूद इस समिति ने हिंदू और मुस्लिमों के निजी कानूनों को ऐसी किसी संहिता से दूर ही रखने की सिफारिश की थी।  1937 से मुस्लिम पर्सनल लॉ में कोई रिफार्म नहीं हुए हैं। समान नागरिक संहिता की बात आज़ादी के बाद हुई थी, लेकिन उसका विरोध हुआ जिस वजह से उसे 44वें अनुच्छेद में रखा गया। हलाकि गोवा का उदहारण भी है जहाँ समान नागरिक संहिता लागू है।
समान नागरिक संहिता 1980 के दशक में जन-चर्चा का बड़ा विषय बन गई थी, जब शाह बानो नामक मुस्लिम महिला को 73 साल की उम्र और विवाह के 40 वर्षों के बाद पति मोहम्मद अहमद खान ने सिर्फ तीन बार ‘तलाक’ कहकर त्याग दिया था। निचली अदालत ने तलाक देने वाले पति को शाहबानो को भरण-पोषण का खर्च देने का निर्देश दिया। अहमद खान ने 1981 में इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सर्वोच्च न्यायालय ने 1985 में ‘पत्नियों, बच्चों और पालकों के भरण-पोषण’ के तहत (अखिल भारतीय आपराधिक नागरिक संहिता का अनुच्छेद 125), जो सारे नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है, शाहबानो का दावा मंजूर किया।
मई 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता अनिवार्य रूप से लागू करने पर जोर दिया था। कोर्ट का कहना था, ‘इससे जहां पीड़ित महिलाओं की सुरक्षा हो सकेगी वहीं राष्ट्रीय एकता बढ़ाने के लिए भी यह आवश्यक है। किसी समुदाय के इस तरह के निजी कानून स्वायत्तता नहीं, बल्कि अत्याचार के प्रतीक हैं। भारत एक राष्ट्र है और कोई समुदाय मजहब के आधार पर स्वतंत्र अस्तित्व का दावा नहीं कर सकता’
वर्तमान में देश में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के अधीन करते हैं। फिलहाल मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का पर्सनल लॉ है जबकि हिन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं।

क्या है हिन्दू पर्सनल लॉ: भारत में हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल लाया गया। देश में इसके विरोध के बाद इस बिल को चार हिस्सों में बांट दिया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे हिन्दू मैरिज एक्ट, हिन्दू सक्सेशन एक्ट, हिन्दू एडॉप्शन एंड मैंटेनेंस एक्ट और हिन्दू माइनोरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट में बांट दिया था। इस कानून ने महिलाओं को सीधे तौर पर सशक्त बनाया। इनके तहत महिलाओं को पैतृक और पति की संपत्ति में अधिकार मिलता है। इसके अलावा अलग-अलग जातियों के लोगों को एक-दूसरे से शादी करने का अधिकार है लेकिन कोई व्यक्ति एक शादी के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकता है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड : देश के मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड है। इसके लॉ के  अंतर्गत शादीशुदा मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को महज तीन बार तलाक कहकर तलाक  दे सकता है। हालांकि मुस्लिम पर्सनल में तलाक के और भी तरीके दिए गए हैं, लेकिन उनमें से तीन बार तलाक भी एक प्रकार का तलाक माना गया है, जिसे कुछ मुस्लिम विद्वान शरीयत के खिलाफ भी बताते हैं।

तलाक के बाद अगर दोनों फिर से शादी करना चाहते तो महिला को पहले किसी  और पुरुष के साथ शादी रचानी होगी, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने होंगे। इसे हलाला कहा जाता है। उससे तलाक लेने के बाद ही वो पहले पति से फिर शादी कर सकती है। इस लॉ में महिलाओं को तलाक के बाद पति से किसी तरह के गुजारे भत्ते या संपत्ति पर अधिकार नहीं दिया गया है बल्कि मेहर अदायगी का नियम है। तलाक लेने के बाद मुस्लिम पुरुष तुरंत शादी कर सकता है जबकि महिला को इद्दत के निश्चित दिन गुजारने पड़ते हैं।

क्यों है देश में इस कानून की आवश्यकता: अलग-अलग धर्मों के अलग कानून से न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है। समान नागरिक संहिता लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी और अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े मामलों के फैसले जल्द होंगे। शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे में सबके लिए एक जैसा कानून होगा फिर चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो। वर्तमान में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ यानी निजी कानूनों के तहत करते हैं।

सभी के लिए कानून में एक समानता से देश में एकता बढ़ेगी और जिस देश में नागरिकों में एकता होती है, किसी प्रकार वैमनस्य नहीं होता है वह देश तेजी से विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा। देश में हर भारतीय पर एक समान कानून लागू होने से देश की राजनीति पर भी असर पड़ेगा और राजनीतिक दल वोट बैंक वाली राजनीति नहीं कर सकेंगे और वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होगा।

महिलाओं की स्थिति में होगा सुधार : समान नागरिक संहिता लागू होने से भारत की महिलाओं की स्थिति में भी सुधार आएगा। कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं। इतना ही नहीं, महिलाओं का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में भी एक समान नियम लागू होंगे।

क्यों हो रहा है विरोध: यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करने वालों का कहना है कि ये सभी धर्मों पर हिन्दू कानून को लागू करने जैसा है।

इन देशों में लागू है यूनिफॉर्म सिविल कोड: एक तरफ भारत में समान नागरिक संहिता को लेकर बड़ी बहस चल रही है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट जैसे कई देश इस कानून को अपने यहां लागू कर चुके हैं।

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने इस मुद्दे पर सर्वे कराया था। इस सर्वे में 57 फीसदी लोगों ने विवाह, तलाक, संपत्ति, गोद लेने और भरण-पोषण जैसे मामलों में समुदायों के लिए पृथक कानून के पक्ष में राय जाहिर की। केवल 23 फीसदी लोग समान नागरिक संहिता के पक्ष में थे। 20 फीसदी लोगों ने कोई राय ही नहीं रखी। 55 फीसदी हिंदुओं ने संपत्ति और विवाह के मामले में समुदायों के अपने कानून रहने देने के पक्ष में राय दी, जबकि ऐसे मुस्लिम 65 फीसदी थे। अन्य अल्पसंख्यक समुदायों (ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन) ने सर्वे में इससे मिलती-जुलती या इससे थोड़ी ज्यादा संख्या में समान नागरिक संहिता का समर्थन किया। अल्पसंख्यक समुदायों का बहुमत मौजूदा व्यवस्था कायम रखने के पक्ष में है। सीएसडीएस का निष्कर्ष था कि शिक्षित वर्ग में भी समान नागरिक संहिता से असहमति रखने वालों का बहुमत है।

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