आज ही के दिन 1975 में एक फोन कॉल से लगा था देश में आपातकाल, जानें सबकुछ जो जानना चाहते हैं…

0
2318

इतिहास में 25 जून का दिन भारत के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटना का गवाह रहा है। आज ही के दिन 1975 में देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की गई जिसने कई ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म दिया। 25-26 जून 1975 की रात से 21 मार्च 1977 तक की अवधि में भारत में आपातकाल था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी। इस दौरान देश की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिले थे। आपातकाल के दौरान 26 जून की सुबह तक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई समेत तमाम बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे और इस दौरान प्रेस की आजादी पर भी हमला हुआ था। राजधानी दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित अखबारों के ऑफिसेज की बिजली काट दी गई थी और उस दौरान कई अखबारों ने मुखर होकर आपातकाल का विरोध किया था।

25 जून 1975 की सुबह एक फोन की घंटी ने देश में लिख दी थी ‘आपातकाल’ की काली रात

देश में आपातकाल की नींव तो 1971 के आमचुनाव के बाद से ही रख दी गई थी। लेकिन 1975 आते आते इमारत बुलंद हो चुकी थी। उस समय बेरोजगारी चरम पर थी, युवा में गुस्सा था और देश में बदलाव की लहर तेजी से उठ रही थी। विपक्ष की मांगे सरकार से बढ़ती जा रही थी और देश में राजनीतिक असंतोष पैदा होने के कारण केंद्र की कांग्रेस सरकार के खिलाफ देशभर में आवाजें बुलंद हो रही थीं। बिहार और गुजरात में विधानसभाएं भंग की जा चुकी थीं। विपक्षी पार्टी के बड़े कद्दावर नेता आंदोलन कर रहे थे और देश के युवा उनके साथ थे। हाथों से निकलती कमान, देश के बिगड़ते हालात और अमेरिका के खौफ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अंदर सत्ता खोने का भय जन्म ले रहा था और अपनी कुर्सी बचाने के लिए कुछ सख्त कदम उठाना चाह रही थीं। उन्हें यह भी खौफ था कि कहीं अमेरिका उनके खिलाफ कोई बड़ी चाल न चल दे और कहीं उनका तख्ता पलट न हो जाए। इंदिरा ने अपने एक साक्षात्कार में यहां तक कहा था कि वह अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की ‘हेट लिस्ट’ में सबसे ऊपर थीं और उन्हें डर था कि कहीं उनकी सरकार का भी सीआईए की मदद से चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर अयेंदे की तरह तख्ता न पलट दिया जाए।

वह 25 जून 1975 की सुबह थी जब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रॉय के फोन की घंटी बजी। वह उन दिनों दिल्ली में थे और फोन इंदिरा गांधी के ऑफिस से था और फोन पर थे उनके विशेष सहायक आरके धवन। धवन द्वारा प्रधानमंत्री निवास बुलाए जाने के बाद संवैधानिक मामलों के जानकार सिद्धार्थ शंकर रॉय जब इंदिरा गांधी के आवास 1 सफदरजंग रोड पर पहुंचे तो उन्होंने इंदिरा को अपनी स्टडी में ढेर सारी रिपोर्टों के ढेर के बीच खुद को उलझा हुआ पाया। वह काफी परेशान दिख रही थीं। इंदिरा ने रॉय को कुछ कड़े फैसले लेने की जरूरत बताई जिसके जवाब में उन्होंने इंदिरा को देश की आंतरिक गड़बड़ियों से निपटने का एक सूत्री उपाय आपातकाल बताया। इंदिरा पूरे मामले को गुपचुप तौर पर करना चाहती थीं इसलिए उन्होंने कई मामलों में और सलाह लेनी शुरू की जिसमें उन्होंने यह भी कहा कि वह अपने मंत्रिमंडल को यह जानकारी नहीं देना चाहती हैं तब वह रॉय ही थे जिन्होंने इंदिरा को सुझाया कि वह सीधे राष्ट्रपति फखरुद्दीन से धारा 352 पर बात करें। और आपातकाल की घोषणा कर दें। फिर सिद्धार्थ शंकर और इंदिरा शाम पांच बजे राष्ट्रपति भवन पुहंचे और देश और सारी परिस्थितियां समझाईं और उन्हें मनाने में कामयाब हुईं। दोनों वापस लौटे आपातकाल के कागजात तैयार कराए गए। तब तक रात के साढ़े 11, पौने 12 बज चुके थे। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने उन आपातकाल के घोषणा वाले कागजात पर हस्ताक्षर कर दिए और आपातकाल करीब 21 महीने तक देश पर लागू रहा।

आपातकाल के कागजात पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद इंदिरा ने कैबिनेट की बैठक बुलाई। यह बैठक सुबह 6 बजे बुलाई गई। सारा घटना क्रम तेजी से घट रहा था। इंदिरा कल मंत्रिमंडल की बैठक में और रेडियो पर देश को क्या संदेश देंगी उसकी रूपरेखा तैयार की जा रही थी। इसी बीच संजय गांधी कई बार इंदिरा से मिलने आए। विपक्ष के उन नेताओं की लिस्ट तैयार की गई जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था। इसी दौरान मीडिया पर कैसे लगाम लगाई जाए इसपर भी बातचीत शुरू हो चुकी थी। सेंसरशिप लागू किए जाने से लेकर अखबार के दफ्तरों की बिजली काटे जाने तक की योजनाएं बनाईं जा रही थी। यही नहीं अदालतों पर भी जोर आजमाइश की कोशिश की जा रही थी।

मीडिया पर पाबंदी को लेकर पार्टी में विरोध था। खुद आपातकाल की एबीसी बताने वाले रॉय भी इसके खिलाफ थे। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रॉय के मीडिया और अदालत पर पाबंदी का विरोध किए जाने पर इंदिरा ने उन्हें कहा कि ऐसा कुछ नहीं होगा लेकिन 26 जून को सबकुछ उलट हुआ। तड़के ही गिरफ्तारियां शुरू कर दी गईं। मीडिया पर पाबंदी लगा दी गई। बिजली के कनेक्शन काट दिए गए। बहादुर शाह जफर मार्ग पर मौजूद एक भी अखबार के दफ्तर में अखबार की मशीने नहीं चलीं, नहीं छप सके समाचार पत्र। सिर्फ हिंदुस्तान टाइम्स छप सका क्योंकि उसका ऑफिस बहादुर शाह मार्ग पर नहीं था। रेडियो पर प्रसारित होने वाले बुलेटिन्स को प्रसारण से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय से अप्रूव कराने के आदेश जारी किए गए। और देश में यह हालात करीब 21 महीने तक रहे।

ऐसा माना जाता है कि आपातकाल के दौरान देश में अव्यवस्था के नाम पर संविधान और कानून में अपने हिसाब से बदलाव किए गए। आपातकाल के पहले हफ्ते में ही संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 को समाप्त किया गया। ऐसा कर सरकार ने कानून की नजर में सबकी बराबरी, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी और गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर अदालत के सामने पेश करने के अधिकारों पर रोक लगा दी। अभिव्यक्ति, प्रकाशन करने, संघ बनाने और सभा करने की आजादी को छीनने के लिए जनवरी 1976 में अनुच्छेद 19 को निलंबित किया गया। राष्ट्रीय सुरक्षा काननू (रासुका) तो पहले से ही लागू था जिसमें कई बदलाव किए गए।

वैसे आपातकाल की कहानी तो इलाहाबाद कोर्ट के उस फैसले के बाद लिखी गई थी जब राजनारायण के पक्ष में फैसला देते हुए 1971 के चुनाव को रद्द कर दियाथा। इंदिरा राजनारायण के इसी मुकदमे के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अपने पक्ष में करने और सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम फैसले का निबटारा करने के लिए कानून बनाया गया। इंदिरा गांधी की अपील को सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार करवाया गया ताकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनके रायबरेली संसदीय क्षेत्र से चुनाव रद्द किए जाने के फैसले को उलट दिया जाए। संविधान को संशोधित करके कोशिश की गई कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष पर जीवन भर किसी अपराध को लेकर कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इस संशोधन को राज्यसभा ने पारित भी कर दिया लेकिन इसे लोकसभा में पेश नहीं किया गया। सबसे कठोर संविधान का 42वां संशोधन था, इसके जरिए संविधान के मूल ढांचे को कमजोर करने, उसकी संघीय विशेषताओं को नुकसान पहुंचाने और सरकार के तीनों अंगों के संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास किया गया।

रासुका में 29 जून, 1975 में ऐसे संशोधन किए गए जो किसी भी लिहाज से सही नहीं कहे जा सकते हैं। इस संविधान के संशोधन के बाद नजरबंदी की सजा काट रहे बंदियों को इसका कारण जानने का अधिकार खत्म कर दिया गया। इसे एक साल से अधिक समय तक बंदी बनाए रखने का प्रावधान बनाया गया। वहीं आपातकाल के तीसरे हफ्ते में 16 जुलाई, 1975 को इसमें बदलाव करके नजरबंदियों को कोर्ट में अपील करने के अधिकार भी छीन लिया गया। 10 अक्टूबर, 1975 के संशोधन के बाद नजरबंदी के कारणों की जानकारी कोर्ट या किसी को भी देने को अपराध बना दिया गया।

मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध

आपातकाल के दौरान मीडिया को पंगु बनाने की पूरी कोशिश की गई। बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित मीडिया हाउस की बिजली सप्लाई रोकी गई। अखबारों पर सेंसर लगा दिया गया। क्या छपेगा और क्या नहीं इसका नियंत्रण सरकार अपने हाथों में चाहती थी और इसपर नया कानून तक बनाया गया।। समाचार एजेंसियों पर लगाम लगाया गया। देशभर में पत्रकारों, मीडिया संस्थानों के मालिकों और संपादकों पर अत्याचार किया गया यही नहीं कई संपादकों को जेल की हवा तक खिलाई गई। इस दौरान पूरी कोशिश रही कि आम जनता तक नेताओं की गिरफ्तारी की खबरें न पहुंचे लेकिन सारी कोशिशें असफल रहीं। तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री आई के गुजराल के विरोध के बाद उन्हें पद से हाथ धोना पढ़ा और विद्याचरण शुक्ल को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई।

सिनेमा भी इससे अछूता नहीं रहा। आपातकाल के दौरान अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ को जबरदस्ती बर्बाद करने की कोशिश हुई। किशोर कुमार को काली सूची में डाल दिया गया। ऑल इंडिया रेडियो पर उनके गाए गीतों को बजाने की मनाही हो गई। फिल्म ‘आंधी’ पर पाबंदी लगा दी गई। इस फिल्म को इंदिरा के जीवन की कहानी प्रभावित फिल्म बताया जाता है।

महज आर्थिक आपातकाल कहकर भ्रम फैलाया गया

आपातकाल के दौरान मजदूरों और गरीबों का भी शोषण किया गया। सिर्फ पश्चिम बंगाल में करीब 16 हजार मजदूरों को जेल में बंद किया गया। देश में आर्थिक आपातकाल का भ्रम फैलाकर आम जनता से लेकर सरकारी महकमों में काम कर रहे लोगों के अधिकारों का दमन किया गया।

अदालत पर भी रहा आपातकाल का असर

आपातकाल के दौरान जिस जज और वकील ने सरकार की अनसुनी की सभी को खामियाजा भुगतना पड़ा। नजरबंदी मुकदमों के तहत जिन जजों ने सरकार पर उंगली उठाई उनका तबादला किया गया। लेकिन जज भी अपने अधिकार और कानून को जानते थे वह अड़े रहे और सरकार के प्रयासों को असफल करने में सफल रहे।

अल्पसंख्यकों की जबरन नसबंदी

इस दौरान चुनचुन कर लोगों की नसबंदी कराई गई। दिल्ली साफ सुथरी बनाने के लिए गरीब झुग्गी में रह रहे लोगों के घरों पर बुल्डोजर चलाया गया और लोगों को रातों रात शहर से दूर भेजा गया। इन सबके बीच इंदिरा ने जहां 20 सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की वहीं आम जनता ने उनके जीवन के आतंक को इंदिरा के जीवन का आतंक बनाया और 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हारी। 21 महीने तक देश को झकझोर देने वाली इस घटना ने नए आयाम तय किए। 43 साल बाद भी आज उस दिन को काले अध्याय के रूप में ही देखा जाता है।

संजय गांधी ने चलाया था पांच सूत्रीय कार्यक्रम

एक तरफ देशभर में सरकार के खिलाफ बोलने वालों पर जुल्म हो रहा था तो दूसरी तरफ संजय गांधी ने देश को आगे बढ़ाने के नाम पर पांच सूत्रीय एजेंडे परिवार नियोजन, दहेज प्रथा का खात्मा, वयस्क शिक्षा, पेड़ लगाना, जाति प्रथा उन्मूलन पर काम करना शुरू कर दिया था। बताया जाता है कि सुंदरीकरण के नाम पर संजय गांधी ने एक ही दिन में दिल्ली के तुर्कमान गेट की झुग्गियों को साफ करवा डाला लेकिन पांच सूत्रीय कार्यक्रम में ज्यादा जोर परिवार नियोजन पर था। लोगों की जबरदस्ती नसबंदी कराई गई। 19 महीने के दौरान देश भर में करीब 83 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी करा दी गई। कहा तो ये भी जाता है कि पुलिस बल गांव के गांव घेर लेते थे और पुरुषों को पकड़कर उनकी नसबंदी करा दी जाती थी।

जानिए आपातकाल लागू करने के लिए क्यों मजबूर हुई थीं इंदिरा?

बता दें कि इंदिरा गांधी ने 1971 में हुए लोकसभा चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के राज नारायण को 11 लाख वोटों से हराया था। उनकी इस जीत के खिलाफ राज नारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी ने कई भ्रष्ट तरीकों और कानून तोड़कर चुनाव में जीत हासिल की थी। इस मामले की सुनवाई के बाद जज जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया। इसके साथ ही अगले 6 साल तक उनके चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। जज ने अपने फैसले में ये भी कहा कि इंदिरा गांधी संसद के सदन में तो बैठ सकती हैं लेकिन मतदान नहीं कर सकतीं।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए 20 दिन दिए गए। इंदिरा ने भले ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी लेकिन उन्हें पता था कि जिस जन-प्रतिनिधित्व कानून को तोड़ने का उनपर आरोप है उसमें संशोधन किए बिना उन्हें सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिलेगी। कहा जाता है कि इसी डर के चलते केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार ने जन-प्रनितिधित्व कानून में संशोधन करने का फैसला किया। साथ ही नए कानून को पिछे कह तारीख से लागू किया गया। कानून में संशोधन के बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला इंदिरा गांधी के पक्ष में गया।

इस पूरी प्रक्रिया के बीच जैसे ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया पूरे देश में हलचल मच गई। इन दिनों जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में देशव्यापी आंदोलन चल रहा था। 12 जून को ही गुजरात विधानसभा में कांग्रेस की हार की खबर ने पार्टी को बुरी तरह झकझोर दिया और विपक्ष ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग शुरु कर दी। इस मांग के समर्थन में देश भर में धरना, प्रदर्शन और सभाएं होने लगीं। देश में तत्कालीन सरकार के खिलाफ बढ़ते रोष के बीच अचानक 25 जून 1975 की रात देश आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई। आपातकाल का ये दौरा 19 महीने तक चला जिससे निराश हो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बाबू जगजीवन राम ने पार्टी छोड़ दी। आपातकाल की समाप्ति के बाद देश में लोकसभा चुनाव हुए। 1977 में हुए इस चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी और कांग्रेस पार्टी को अपने गलत फैसले की सजा मिली और वह केंद्र की सत्ता से बाहर हो गई।

चुनाव के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी और मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने। अपनी सांसदी बचाने के लिए इंदिरा गांधी का आपातकाल लगाने का वो फैसला अब देश का सबसे काला दौर माना जाता है। 1975 की इमरजेंसी को पूरे 42 वर्ष हो गए हैं। इसके साथ ही यह एक ऐसा इतिहास बन गया है, जो कभी भुलाया नहीं जा सकता।


आपातकाल को लेकर क्या कहता है देश का संविधान:

देश में आंतरिक अशांति को खतरा होने, बाहरी आक्रमण होने अथवा वित्तीय संकट की स्थिति में आपातकाल की घोषणा की जाती है और हमारे संविधान में तीन तरह के आपातकाल की व्यवस्था की गई है। देश ने 1962 में चीन के साथ एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान आपातकाल का दौर देखा था, पर यह बाहरी आक्रमण के कारण लगाया गया था। 25 जून 1975 की मध्यरात्रि से 21 मार्च 1977 के बीच जो आपातकाल का दौर देश ने देखा, वह आंतरिक अशांति के करण अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया गया था। भारत में आपातकालीन प्रावधान जर्मनी के संविधान से उधार लिए गए हैं। भारत के संविधान में निम्नलिखित तीन प्रकार की आपात स्थिति की परिकल्पना की गई हैः

 

(i) अनुच्छेद 352– राष्ट्रीय आपातकाल,

(ii) अनुच्छेद 356– राज्य में आपातकाल (राष्ट्रपति शासन)

(iii) अनुच्छेद 360– वित्तीय आपातकाल

इस तीनों ही आपातकालीन स्थितियों को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के आदेश पर लागू करता है:


राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352)-
इसके तहत, अगर राष्ट्रपति युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर देश की सुरक्षा के लिए पैदा हुई स्थिति को गंभीर मानें तो देश में आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं। आपातकाल पूरे भारत में या उसके किसी हिस्से में घोषित किया जा सकता है। सिर्फ कैबिनेट की लिखित सलाह पर ही राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं। आपातकालीन प्रस्ताव को मंजूरी देने के लिए विशेष बहुमत आवश्यक है। एक बार मंजूरी दे दिए जाने के बाद, आपातकाल छह माह से अधिक के लिए नहीं लगाया जा सकता है। लोकसभा के पास किसी भी वक्त राष्ट्रीय आपातकाल को खत्म करने का अधिकार होता है, अगर लोकसभा के 1/10 सदस्यों से कम ने लोकसभा अध्यक्ष या राष्ट्रपति को लिखित में न दिया हो, अगर सदन का सत्र चल रहा हो, फिर अध्यक्ष या राष्ट्रपति जैसा भी मामला हो, 14 दिनों के भीतर लोकसभा का विशेष सत्र बुलाएंगे और अगर ऐसा प्रस्ताव पारित होता है, तो राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल को रद्द कर देंगे।

 

 

महत्वपूर्ण तथ्य:

– आपात की उदघोषणा को न्यायालय में प्रश्नगत किया जा सकता है।

– राष्ट्रीय आपात के समय राज्य सरकार निलंबित नहीँ की जाती है, अपितु वह संघ की कार्यपालिका के पूर्ण नियंत्रण मेँ आ जाती है।

– राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की घोषणा एक माह तक प्रवर्तन मेँ रहती है और यदि इस दौरान इसे संसद के दो तिहाई बहुमत से अनुमोदित करवा लिया जाता है, तो वह 6 माह तक प्रवर्तन मेँ रहती है। संसद इसे पुनः एक बार में 6 महीने तक बढ़ा सकती है।

– यदि लोकसभा साधारण बहुमत से आपात उद्घोषणा को वापस लेने का प्रस्ताव पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति को उद्घोषणा को वापस लेनी पड़ती है।

 

– आपात उद्घोषणा पर विचार करने के लिए लोकसभा का विशेष अधिवेशन तब आहूत किया जा सकता है, जब लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 1/10 सदस्योँ द्वारा लिखित सूचना लोकसभा अध्यक्ष को, जब सत्र चल रहा हो या राष्ट्रपति को, जब तक नहीँ चल रहा हो, दी जाती है।

– यह आपात उद्घोषणा दूसरे सदन द्वारा संकल्प पारित किए जाने की तारीख 6 मास की अवधि तक प्रवर्तन मेँ रहैगी, परंतु इसको असंख्य बार विस्तारित किया जा सकता है, प्रत्येक प्रत्येक बार केवल 6 मास की अवधि के लिए।

– आपात, राष्ट्रपति द्वारा किसी समय हटाया जा सकता है। लोकसभा, आपात को समाप्त करने के लिए साधारण बहुमत द्वारा संकल्प पारित कर आपात को हटा सकती है।

राष्ट्रीय आपात का दुरुपयोग रोकने के लिए संविधान मेँ उपबंध

इन उपबंधोँ मेँ अधिकांशतः 44 वेँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 352 मेँ संशोधन कर लाए गए हैं।

– पहले राष्ट्रीय आपात, युद्ध या वाह्य आक्रमण या आंतरिक अशांति के आधार पर लगाया जा सकता था। 44वेँ संविधान संशोधन अधिनियम ने आंतरिक अशांति की जगह सशस्त्र विद्रोह का प्रावधान कर दिया है।

– राष्ट्रपति द्वारा आपात की उद्घोषणा करने के लिए संघ मंत्रिमंडल की लिखित राय जरुरी है।

– संसद द्वारा एक अनुमोदन के बाद क्या केवल 6 माह तक प्रवर्तन मेँ रह सकता है लोक सभा द्वारा साधारण बहुमत से पारित एक संकल्प द्वारा इसे समाप्त किया जा सकता है।

 

– एक माह के अंदर संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत द्वारा इसका अनुमोदन जरुरी है (पहले यह दो माह और साधारण बहुमत था।)

– पहले सभी प्रकार के आपात मेँ अनुच्छेद 19 स्वतः निलंबित हो जाता था। लेकिन अब केवल वाह्य आपात की दशा मेँ ही अनुछेद 19 स्वतः निलंबित होता है।
अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 12 वाह्य आपातकाल मेँ भी निलंबित नहीँ हो सकता है।

– अन्य सभी मूल अधिकार, राष्ट्रपति की पृथक, उद्घोषणा द्वारा निलंबित किए जा सकते हैं।

– राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त हो जाता है, किस संविधान के अनुच्छेद 20-21 मेँ उल्लिखित अधिकारोँ के क्रियान्वयन के लिए न्यायपालिका की शरण लेने के अधिकार को स्थगित कर दें।

– अनुच्छेद 352 के अधीन वाह्य आक्रमण के आधार पर प्रथम आपात की घोषणा चीनी आक्रमण के समय 26 अक्टूबर, 1962 ईं को की गई थी। यह उद्घोषणा 10 जनवरी 1968 को वापस ले ली गयी।

– दूसरी बार आपात की उदघोषणा 3 दिसंबर, 1971 ईं को पाकिस्तान से युद्ध के समय की गई (वाह्य आक्रमण के आधार पर)।

संशोधन

• 38वां संविधान संशोधन अधिनियम 1975: आपातकाल लागू होने के बाद भी विभिन्न परिस्थितियों में राष्ट्रीय आपातकाल लगाने का अधिकार राष्ट्रपति को देता है।

• 42वां संविधान संशोधन अधिनियम 1976:

(i) यह, राष्ट्रीय आपातकाल में संशोधन या बदलने का अधिकार राष्ट्रपति को देता है। मूल संविधान के तहत, सिर्फ लागू करना या पूरी तरह से हटाया जाना संभव है।

(ii) मूल संविधान के तहत, राष्ट्रपति सिर्फ पूरे भारत में राष्ट्रीय आपातकाल लागू कर सकते हैं। इस संशोधन ने उन्हें देश के कुछ हिस्से में आपातकाल लागू करने का अधिकार दिया, जो कि पहले नहीं था ।

• 44वां संविधान संशोधन 1978: इसे कार्यकारिणी द्वारा आपातकाल में मिली शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए लाया गया था।

राष्ट्रीय आपात का प्रभाव

• कार्यकारिणी पर– राज्य सरकारों को बर्खास्त नहीं किया जाएगा, वे काम करना जारी रखेंगे लेकिन वे केंद्र के नियंत्रण में होंगी जो राज्य सरकार को निर्देश देने का अधिकार रखता है और राज्य को उन निर्देशों का पालन करना होगा।

• विधानमंडल पर– राज्य विधानमंडल काम करना और कानून बनाना जारी रखेंगे लेकिन संसद के पास राज्य के संबंध में समवर्ती विधायी अधिकार होंगे और संसद द्वारा पारित ऐसा कोई भी कानून, अक्षमता की हद तक, राष्ट्रीय आपातकाल के हटाए जाने के बाद छह माह की समाप्ति पर समाप्त हो जाएगा।

• वित्तीय संबंधों पर– राष्ट्रपति केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण को रोक सकते हैं और राज्य एवं केंद्र जिस वजह से आपातकाल घोषित किया गया है, के आधार पर, किसी भी राष्ट्रीय संसाधन का उपयोग कर सकते हैं।

• हमारे मौलिक अधिकार– अनुच्छेद 358 अनुच्छेद 19 में दिए गए मौलिक अधिकारों के निलंबन जबकि अनुच्छेद 359 अन्य मौलिक अधिकारों ( अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा दिए गए के अलावा) के निलंबन के बारे में है।

• अनुच्छेद 358 के अनुसार, जब राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया जाता है, अनुच्छेद 19 के तहत दिए गए छह मौलिक अधिकारों को सिर्फ तभी निलंबित किया जाता है जब युद्ध और बाहरी आक्रमण के आधार पर आपातकाल की घोषणा की गई हो और आपातकाल सशस्त्र विद्रोह के आधार पर न लगाया गया हो।

• अनुच्छेद 359 राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए राष्ट्रपति को किसी भी न्यायालय में जाने का अधिकार देता है, सिर्फ अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर।

राष्ट्रपति शासन (राज्य आपातकाल)

अनुच्छेद 355 के अनुसार, संघ का कर्तव्य होगा कि वह बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की रक्षा करे और इस बात को सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार काम कर रही है। अनुच्छेद 356 के तहत, राष्ट्रपति किसी राज्य में यह समाधान हो जाने पर कि राज्य में सांविधानिक तंत्र विफल हो गया है तो आपातकाल की घोषणा कर सकता है । सांविधानिक तंत्र के विफल होने की जानकारी सम्बंधित राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति को देता है ।

राष्ट्रपति शासन के प्रभाव ( राज्य आपातकाल)

• कार्यकारिणी पर– राज्य सरकार को बर्खास्त कर दिया जाता है और राज्य सरकार की कार्यकारिणी अधिकारों का प्रयोग केंद्र सरकार करने लगती है ।

• विधानमंडल पर– राज्य विधानमंडल कानून बनाने का काम नहीं करता; राज्य विधानसभा को निलंबित या भंग कर दिया गया जाता है ।

• वित्तीय संबंध पर– केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

संशोधन

1. 42वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1976, में राज्य आपातकाल की अवधि छह माह से एक वर्ष के लिए बढ़ा दी गई है।

2. 44वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1978, राज्य में छह माहीने के आपातकाल के नियम को वापस लाया गया। इसमें आपातकाल की स्थिति को अधिकतम तीन वर्ष की अवधि के लिए किया जिसमें एक वर्ष सामान्य परिस्थितियों में आपातकाल और दो वर्ष असामान्य परिस्थितियों में आपातकाल की व्यवस्था की गई (परंतु एक बार मेँ केवल 6 माह के लिए), इसके लिए निम्नलिखित 2 शर्तें पूरी हो रही हों-

1. संपूर्ण भारत मेँ या संपूर्ण राज्य मेँ या राज्य के किसी भाग मेँ आपात स्थिति लागू है।
2. निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित कर देता है कि राज्य विधानसभा के साधारण निर्वाचन कराने मेँ कठिनाई के कारण राष्ट्रपति शासन जारी रखना आवश्यक है।

राष्ट्रीय आपात और राष्ट्रपति शासन मेँ अंतर

– राष्ट्रीय आपात मेँ केंद्र और सभी राज्योँ के मध्य संबंधों (केवल वही राज्य नहीँ जहां आपात स्थिति लागू है।) मेँ मूलभूत परिवर्तन आता है, जबकि राष्ट्रपति शासन मेँ केंद्र तथा केवल संबंधित राज्य के मध्य संबंध मेँ परिवर्तन आता है।

– राष्ट्रीय आपात मेँ राज्य मंत्री परिषद अस्तित्व मेँ रहती है और अपने कर्तव्योँ का निर्वहन जारी रखती है, जबकि राष्ट्रपति शासन मेँ राज्य मंत्री परिषद बर्खास्त कर दी जाती है।

– राष्ट्रीय आपात मेँ राज्य विधान सभा कार्य करना जारी रखती है, जबकि ,राष्ट्रपति शासन मेँ यह बर्खास्त या निलंबित कर दी जाती है।

– राष्ट्रीय आपात मेँ मूल अधिकार प्रभावित होते हैँ, राष्ट्रपति शासन मेँ ऐसा कोई प्रभाव नहीँ पड़ता है।

– राष्ट्रीय आपात मेँ केंद्र और राज्योँ के मध्य वित्तीय संबंध प्रभावित हो सकते हैं, किंतु राष्ट्रपति शासन मेँ नहीँ।

वित्तीय आपातकाल

अनुच्छेद 360– के तहत, अगर राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हो कि ऐसी स्थिति पैदा हो चुकीं है जिसमें भारत या इसके किसी भी हिस्से की सीमा में, वित्तीय या साख की स्थिरता पर खतरा पैदा हो गया है, तो वे तत्काल प्रभाव से इस आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं। यह आपातकाल देश कभी भी नहीं लगाया गया है। जब राष्ट्रपति को पूर्ण रूप से विश्वास हो जाए कि देश में ऐसा आर्थिक संकट बना हुआ है, जिसके कारण भारत के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा है। अगर देश में कभी आर्थिक संकट जैसे विषम हालात पैदा होते हैं, सरकार दिवालिया होने के कगार पर आ जाती है, भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त होने की कगार पर आ जाए, तब इस वित्तीय आपात के अनुच्छेद का प्रयोग किया जा सकता है। इस आपात में आम नागरिकों के पैसों एवं संपत्ति पर भी देश का अधिकार हो जाएगा। राष्ट्रपति किसी कर्मचारी के वेतन को भी कम कर सकता है।

वित्तीय आपात की घोषणा दो महीनों के भीतर संसद के दोनो सदनो के सम्मुख रखना तथा उनकी स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है। यदि वित्तीय आपात की घोषणा उस समय की जाती है, जब लोकसभा विघटित हो, तो दो महीने के भीतर राज्य सभा की स्वीकृति मिलने के उपरांत वह आगे भी लागू रहेगी किंतु नवनिर्वाचित लोक सभा द्वारा उसकी प्रथम बैठक के आरंभ से 30 दिन के भीतर ऐसी घोषणा की स्वीकृति आवश्यक है। राष्ट्रपति वित्तीय आपात की घोषणा को किसी भी समय वापस ले सकता है।

वित्तीय आपात का निम्नलिखित प्रभाव होता है–

– राज्योँ के राज्यपालोँ को यह निर्देश दिया जा सकता है कि वे राज्य के सभी धन एवं वित्त विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करेँ।

– राज्योँ को वित्तीय अनुशासन कायम करने के लिए कहा जा सकता है।

– केंद्र एवं राज्योँ के मध्य वित्तीय संशोधनों के विभाजन को निलंबित रखा जा सकता है।

– संवैधानिक अधिकारियोँ के वेतन एवं भत्ते कम किए जा सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here