शत्रु संपत्ति कानून संशोधन विधेयक 2017 को संसद की मंज़ूरी, जानें- इस विधेयक की खास बातें…

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लोकसभा ने शत्रु संपत्ति कानून (संशोधन) विधेयक 2017 में राज्यसभा द्वारा किए गए संशोधनों को मंज़ूरी दे दी है। इस विधेयक में युद्ध के बाद पाकिस्तान और चीन पलायन कर गए लोगों द्वारा छोड़ी गई संपत्ति पर उत्तराधिकार के दावों को रोकने के प्रावधान हैं। यह विधेयक सरकार द्वारा इस संबंध में जारी किए गए अध्यादेश का स्थान लेगा। इस विधेयक में कुछ शब्दों को प्रतिस्थापित किया गया है जिसमें 67वें के स्थान पर 68वें, 2016 के स्थान पर 2017 तथा किसी विधि के स्थान पर किन्ही विधियों आदि को प्रतिस्थापित किया गया है। विधेयक में प्रस्ताव किया गया है कि शत्रु सम्पत्ति संशोधन और विधिमान्यकरण अधिनियम 2017 द्वारा यथासंशोधित इस अधिनियम के तहत किसी सम्पत्ति के संबंध में या इस बाबत केंद्र सरकार या अभिरक्षक द्वारा की गई किसी कार्रवाई के संबंध में किसी वाद या कार्यवाही पर विचार करने का अधिकार नहीं होगा।

क्या है शत्रु संपत्ति बिल:

49 साल पुराने शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 के संशोधन विधेयक, 2016 के तहत वो संपत्ति आती है जिसका रखरखाव या जिसके मालिक या फिर प्रबंधन कोई दुश्मन देश, दुश्मन देश का नागरिक या फिर दुश्मन देश की कंपनी करती हो। केंद्र सरकार ने अब कानूनन ऐसे किसी भी दुश्मन (अमूमन पाकिस्तान और चीन) संपत्ति से उस देश के नागरिकों के उत्तराधिकार के दावों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है। भारत में ऐसे विवादास्पद संपत्ति के हालात भारत-पाक युद्ध (1965) के बाद बने थे। इसीलिए इस अधिनियम को पहली बार 1968 में लागू किया गया था। जो ऐसी संपत्तियों को कानूनी दायरे में रखता था। लेकिन उत्तराधिकार कानून के आने के बाद दुश्मन संपत्ति के भी दुश्मन देशों से दावेदार खड़े होने लगे थे। इसी समस्या का हल संशोधन विधेयक में निकाला गया है।

इसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति आदेश की सूचना अथवा प्राप्ति की तारीख के साठ दिन की अवधि के भीतर ऐसे आदेश से उत्पन्न किसी प्रश्नगत तथ्य अथवा विधि के संबंध में उच्च न्यायालयों में अपील कर सकता है। राजनाथ ने कहा कि इस प्रकार का कानून पाकिस्तान और चीन सहित दुनिया के कई अन्य देशों में पहले से लागू है। यह केवल पाक गए लोगों की संपत्ति का ही नहीं बल्कि 1962 के युद्ध के बाद चीन गए लोगों की संपत्ति का भी मामला है. इससे मानवाधिकारों या न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों का कहीं से कोई उल्लंघन नहीं होता है। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, शत्रु संपत्ति के मालिक का कोई उत्तराधिकारी भी यदि भारत लौटता है तो उसका इस संपत्ति पर कोई दावा नहीं होगा। एक बार कस्टोडियन के अधिकार में जाने के बाद शत्रु संपत्ति पर उत्तराधिकारी का कोई अधिकार नहीं होगा।

इस अधिनियम के बन जाने के बाद सभी ‘शत्रु संपत्तियों’ का नियंत्रण केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त संरक्षकों के पास चला जाएगा। पुश्तैनी जायदाद पर परिवार के वारिसों का अधिकार खत्म हो जाएगा। उत्तर प्रदेश की 1519 शत्रु संपत्तियों में कम से कम 622 ऐसे हैं, जिन्हें संरक्षकों के हवाले किया जा चुका है। 897 संपत्तियां ऐसी हैं, जिनके संरक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है। सूत्रों ने बताया कि फिलहाल इस बिल को आगे की प्रक्रिया के लिए विधि निर्माण शाखा के पास भेजा जाएगा। मुंबई स्थित मुख्यालय से दिशानिर्देश जारी होने के बाद ही संरक्षकों की भूमिका शुरू हो सकेगी।

राज्यसभा में यह विधेयक पहले ही पास हो चुका है और संसद में लंबित रहने के दौरान विधेयक की वैधानिकता को बनाए रखने के लिए सरकार को पांच बार अध्यादेश जारी करना पड़ा था। इस बारे में हुई चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि किसी सरकार को अपने शत्रु राष्ट्र या उसके नागरिकों को संपत्ति रखने या व्यावयायिक हितों के लिए मंजूरी नहीं देनी चाहिए। शत्रु संपत्ति का अधिकार सरकार के पास होना चाहिए न कि शत्रु देशों के नागरिकों के उत्तराधिकारियों के पास। राजनाथ ने कहा कि जब किसी देश के साथ युद्ध होता है तो उसे शत्रु माना जाता है और शत्रु संपत्ति (संशोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक 2017’ को 1962 के भारत चीन युद्ध, 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध और 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। उपरोक्त युद्धों की पृष्ठभूमि में अपनी पुश्तैनी संपत्ति को छोडकर शत्रु देश में चले जाने वाले पाकिस्तानी और चीनी नागरिकों के संबंध में लाए गए इस विधेयक के संबंध में राजनाथ ने कहा कि इस विधेयक को पारित कराना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसा नहीं होने से लाखों करोड़ों रुपये की संपत्ति का नुकसान होगा।

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