UPSC 2017: इस साल काफी चर्चा में रहा है चुनाव आयोग, जानें संभावित प्रश्नों से जुड़े उत्तर और अहम तथ्य…

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भारत संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है। लोकतंत्र भारत के सविंधान की अक्षुण्ण मौलिक विशेषताओं में एक है और यह सविंधान के बुनियादी ढ़ांचा का हिस्सा है (केशवानंद भारती बनाम केरल तथा अन्य एआईआर 1973 एससी 1461)। संविधान की लोकतंत्र की अवधारणा पहले से ही निर्वाचन के जरिए संसद तथा राज्य विधानपालिकाओं में जन प्रतिनिधित्व को मानती है (एनपी पून्नू स्वामी बनाम निर्वाचन अधिकारी नामक्कल एआईआर 1952 एससी 64)। लोकतंत्र के बने रहने के लिए विधि का शासन आवश्यक है और यह भी आवश्यक है कि देश के उचित शासन के लिए सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध व्यक्ति को जनप्रतिनिधि चुना जाना चाहिए (गदाख यशवंतराव कंकरराव बनाम बाला साहिब विखेपाटिल एआईआर 1994 एससी 678)। सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध व्यक्ति को जनप्रतिनिधि चुनने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होने चाहिए तथा चुनाव ऐसे वातावरण में कराये जाने चाहिए जिसमें मतदाता अपनी स्वतंत्र इच्छा के अनुसार अपने मताधिकार का प्रयोग करें। इस तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र का आधार है।

भारत ने संसदीय प्रणाली की सरकार की ब्रिटिश वेस्टमिन्सटर प्रणाली अपनाई है। हमारे यहां निर्वाचित राष्ट्रपति, निर्वाचित उप-राष्ट्रपति, निर्वाचित संसद तथा प्रत्येक राज्य के लिए निर्वाचित राज्य विधानमण्डल है। हमारे यहां निर्वाचित नगरपालिकाएं, पंचायतें तथा अन्य स्थानीय निकाय हैं। इन पदों तथा निकायों के स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए तीन पूर्व आवश्यकताएं हैः (1) इन चुनावों को सम्पन्न कराने के लिए एक प्राधिकार जो राजनीतिक तथा कार्यपालक हस्तक्षेप से मुक्त हो, (2) ऐसे कानून जो चुनाव संचालन को शासित करे और जिसके अनुसार इन चुनावों को कराने के लिए जिम्मेदार प्राधिकार हो तथा (3) एक ऐसी व्यवस्था हो जो इन चुनावों से सम्बंधित सभी संदेहों तथा विवादों का समाधान करे।

भारत के संविधान ने इन सभी आवश्यकताओं की ओर उचित ध्यान दिया है और सभी तीन मामलों के लिए उचित प्रावधान किया है। सविंधान ने एक स्वतंत्र भारत निर्वाचन आयोग का गठन किया है। आयोग में भारत के राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति पद तथा संसद और राज्य विधानपालिकाओँ के चुनाव के लिए मतदाता सूचियों की तैयारी तथा चुनाव करने का अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण की शक्ति निहित है (अनुच्छेद 324)। इसी प्रकार नगरपालिकाओं, पंचायतों तथा अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव कराने के लिए स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकार का गठन किया गया है (अनुच्छेद 243के तथा 243जेडए)।

राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति तथा संसद और राज्य विधानपालिकाओं के चुनावों के लिए कानून बनाने का अधिकार संसद द्वारा दिया गया है (अनुच्छेद-71 तथा 327)। नगर पालिकाओं, पंचायतों तथा अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव करने संबंधी कानून राज्य विधानपालिकाएं बनाती हैं (अनुच्छेद-243के तथा 243जेडए)। राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति पद के चुनावों से संबंधित सभी संदेहों, विवादों का निपटारा उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाता है (अनुच्छेद-71), जबकि संसद तथा राज्य विधानपालिकाओं के चुनाव से संबंधित सभी संदेहों तथा विवादों को निपटाने का अधिकार संबद्ध राज्य के उच्च न्यायालय को है। इनमें उच्चतम न्यायालय में अपील करने का अधिकार भी है (अनुच्छेद-329)। नगरपालिकाओं आदि के चुनावों से संबंधित विवाद के मामलों का निर्धारण राज्य सरकारों द्वारा बनाये गए कानूनों के अनुसार निचली अदालतें करती हैं।

राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव से संबधित कानून संसद द्वारा राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति निर्वाचन अधिनियम 1952 बनाये गए हैं। इस अधिनियम की प्रतिपूर्ति राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति निर्वाचन नियम 1974 द्वारा की गई है और इसके आगे सभी पक्षों पर निदेश तथा निर्देशन निर्वाचन आयोग द्वारा दिया जाता है।
संसद तथा राज्य विधान पालिकाओं के चुनाव करने संबंधी प्रावधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में हैं। जनप्रतिनिधित्व अधिनयम 1950 मुख्यतः निर्वाचन सूचियों की तैयारी तथा पुनरीक्षण से संबंधित है। इस अधिनियम के प्रावधानों की प्रतिपूर्ति उस अधिनियम की धारा-28 के तहत केन्द्र सरकार द्वारा निर्वाचन आयोग के परामर्श से विस्तृत नियमों, निर्वाचक पंजीकरण नियमों 1960 से की जाती है तथा यह नियम मतदाता सूचियों की तैयारी, योग्य नामों को जोड़ने, अयोग्य नामों को हटाने तथा विवरणों में सुधार सहित समय-समय पर उनके पुनरीक्षणों से संबंधित हैं। इन नियमों में पंजीकृत मतदाताओं को फोटो वाले मतदाता पहचान पत्र राज्य के खर्च पर देने की व्यवस्था है। ये नियम निर्वाचन आयोग को मतदाताओं के फोटो वाले फोटो निर्वाचक सूची तैयार करने का अधिकार देते हैं। इन सूचियों में मतदाता के अन्य विवरण भी होते हैं। इन शक्तियों का प्रयोग करते हुए आयोग भारत के सभी संसदीय तथा विधानसभा क्षेत्रों के लिए निर्वाचक फोटो वाली मतदाता सूचियां तैयार कर रहा है, जिसमें व्यक्तिगत पहचान-पत्र जारी करने के अलावा मतदाता के फोटो होंगे।

चुनाव के वास्तविक संचालन से संबंधित सभी विषय जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के प्रावधानों से शासित होते हैं। इसकी प्रतिपूर्ति उस अधिनियम के अनुच्छेद-169 के तहत निर्वाचन आयोग के परामर्श से केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये निर्वाचन संचालन नियम 1961 से होती है। इस अधिनियम तथा नियमों में चुनाव संचालन के सभी चरणों के विस्तृत प्रावधान हैं यथा निर्वाचन अधिसूचना जारी करने, नामांकन पत्र दाखिल करने, नामांकन पत्रों की जांच, उम्मीदवारी वापसी, चुनाव कराने, मतगणना तथा घोषित परिणामों के आधार पर सदनों का गठन। संविधान द्वारा चुनाव अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग को प्रदान की गई हैं। निर्वाचन आयोग वैसे मामलों से निपटने के लिए विशेष आदेश या निर्देश जारी कर सकता है, जिसके बारे में संसद द्वारा पारित कानून ने कोई प्रावधान नहीं किया है या प्रावधान अपर्याप्त है। ऐसे विचारशून्य (अस्पष्ट) क्षेत्रों को भरने संबंधी शास्त्रीय उदाहरण चुनाव चिन्ह (आरक्षण तथा आबंटन) आदेश 1968 का जारी होना है। यह आदेश राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर राजनीतिक दलों की मान्यता से संबंधित मामलों, उनके लिए चुनाव चिन्हों का आरक्षण राजनीतिक दलों के अलग हुए गुटों के विवादों के निपटारे तथा चुनाव में सभी उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आबंटन संबंधी मामलों के बारे में है।

एक अन्य अस्पष्ट क्षेत्र है जहां संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग अपनी अंतर निहित शक्तियों का प्रयोग करता है। यह राजनीतिक दलों तथा निर्देशन के लिए आदर्श आचार संहिता को लागू करना है। आदर्श आचार संहिता स्वयं राजनीतिक दलों द्वारा विकसित दस्तावेज है जो यह शासित करता है कि चुनावों के दौरान सभी राजनीतिक दलों के लिए बराबरी का स्तर सुनिश्चित हो। विशेषकर सत्तारूढ़ दल या दलों द्वारा अपने उम्मीदवारों की चुनावी संभावना मजबूत करने के लिए सरकारी शक्ति तथा सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग को रोकता है। निर्वाचन के पश्चात चुनावों से संबंधित सभी संदेहों तथा विवादों का समाधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों के अनुसार किया जाता है। इस अधिनियम के अंतर्गत ऐसे सभी संदेह और विवाद संबद्ध राज्य के उच्च न्यायालय के समक्ष केवल चुनाव समाप्ति के बाद उठाये जा सकते हैं, चुनाव प्रक्रिया जारी रहने के समय नहीं।

उपरोक्त जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 तथा 1951 तथा निर्वाचन नियम 1960 के पंजीकरण तथा निर्वाचन नियम 1961 संसद के दोनों सदनों तथा राज्य विधानमण्डलों के चुनाव से संबंधित सभी विषयों के बारे में सम्पूर्ण संहिता हैं। चुनाव आयोग या इसके अधीन कार्य कर रहे प्राधिकार के किसी निर्णय से आहत कोई व्यक्ति इन अधिनियमों और ऩियमों के प्रावधानों के अनुरूप समाधान पा सकता है। ये अधिनियम और नियम निर्वाचन आयोग को निर्वाचक सूची की तैयारी/पुनरीक्षण तथा चुनाव संचालन से संबंधित सभी पक्षों के बारे में निर्देश जारी करने के अधिकार देते हैं। इसके अनुरूप आयोग ने अनेक निर्देश दिये हैं, जिनका उल्लेख निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों, निर्वाचन अधिकारियों, पीठासीन अधिकारियों, उम्मीदवारों, मतदान अभिकर्ताओं तथा मतगणना अभिकर्ताओं के लिए पुस्तिका में किया गया है।

संसद द्वारा पारित कानून और इनकी पूर्ति के लिए बने नियम तथा आयोग के निर्देशों की समीक्षा समय-समय पर विभिन्न महत्वपूर्ण मामलों में उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई है। शीर्ष न्यायालय ने इन कानूनों को पूरक रूप देने तथा निर्वाचन प्रणाली के सुधार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

उदाहरण के लिए उच्चतम न्यायालय ने मोहिंदर सिंह गील बनाब मुख्य निर्वाचन आयुक्त (एआईआर 1978 एससी 851) मामले में व्यवस्था दी कि निर्वाचन आयोग संविधान सृजक के रूप में संसद द्वारा बनाये गये कानूनों की प्रतिपूर्ति वहां कर सकता है जहां कानून ने हमारे जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव संचालन के दौरान उत्पन्न किसी स्थिति के संबंध में कोई पर्याप्त प्रावधान नहीं किया है। इन शक्तियों का उपयोग करते हुए आयोग आदर्श आचार संहिता लागू कर रहा है। यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए स्वयं राजनीतिक दलों द्वारा किया गया अनूठा योगदान है।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिवर्टीज (एआईआर 2003 एससी 2363) मामले में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि संसद या राज्य विधानसभाओं के चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक उम्मीदवार को हलफनामे में उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि यदि कोई हो, उसकी, पति/पत्नी और आश्रित बच्चों की परिसम्पति, उसकी शैक्षणिक योग्यताओं का ब्यौरा देना होगा ताकि निर्वाचक अपना प्रतिनिधि चुनते समय अपनी पसंद व्यक्त कर सके।

रिसर्जेंस इंडिया[लाज (एससी)-2013-9-35] मामले में उच्चतम न्यायालय ने हाल में व्यवस्था दी कि निर्वाचन अधिकारी द्वारा बताने या स्मरण कराने के बाबजूद यदि कोई उम्मीदवार हलफनामे में आवश्यक जानकारी नहीं देता है तो उसके नामांकन पत्र के जांच के समय निर्वाचन अधिकारी नामांकन पत्र को नामंजूर कर सकता है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा चुनाव कानून से संबंधित एक अन्य महत्वपूर्ण योगदान पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज [लाज (एससी)-2013-9-87] मामले में किया गया है। इस मामले में न्यायालय ने कहा कि मतदाता को निर्वाचन क्षेत्र के सभी उम्मीदवारों के प्रति असंतोष व्यक्त करने तथा नकारात्मक मत देने का अधिकार है। उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय को लागू करने के लिए निर्वाचन आयोग ने वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में (नोटा-उपरोक्त में से कोई नहीं) का बटन जोड़ा है। इस बटन को दबाकर मतदाता यह व्यक्त कर सकता है कि वह किसी भी उम्मीदवार के लिए मत देना नहीं चाहता। यह व्यवस्था मतदाताओं को गोपनीय रूप से अपनी इच्छा व्यक्त करने योग्य बनाता है। लेकिन कानून यह नहीं कहता कि यदि ईवीएम में दर्ज नोटा विकल्प वाले वोटों की संख्या किसी उम्मीदवार द्वारा पाये गये मतों की संख्या से अधिक है तो यह उसके निर्वाचन पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।

डॉ. सुब्रमण्यन स्वामी [लाज (एससी)-2013-10-20] मामले में एतिहासिक निर्णय देते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा की इलेक्ट्रांनिक वोटिंग मशीनों में वोटर वैरीफाइबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) का प्रावधान होना चाहिए था कि मतदाता द्वारा अपना वोट डालने के बाद एक मुद्रित पर्ची निकले जिसमें मतदाता द्वारा व्यक्त पसंद के उम्मीदवार का नाम तथा चिन्ह लिखा होगा।

ईवीएम से जुड़े हालिया विवाद-

चुनाव आयोग ने यह पाया है कि गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पंजाब की राज्य विधानसभाओं के लिए हाल ही में हुए चुनावों के नतीजों की घोषणा के बाद कुछ राजनीतिक दलों ने ईसीआई-ईवीएम की विश्वसनीयता के खिलाफ आवाज उठाते हुए इन चुनावों के दौरान ईवीएम में छेड़छाड़ किये जाने का आरोप लगाया है। कोई विशिष्ट आरोप लगाये बगैर एक ज्ञापन 11 मार्च 2017 को राष्ट्रीय महासचिव, बीएसपी की ओर से प्राप्त हुआ है। ईसीआई ने 11 मार्च 2017 को ही इस ज्ञापन को खारिज करते हुए बीएसपी को विस्तृत जवाब दे दिया है। ईसीआई का जवाब www.eci.nic.in पर उपलब्ध है।
ईसीआई-ईवीएम का उपयोग शुरू किये जाने के बाद इन मशीनों में कथित छेड़छाड़ के बारे में इस तरह की कुछ चिंताएं पहले भी व्यक्त की जा चुकी हैं। उच्च न्यायालय/उच्चतम न्यायालय में भी इस तरह की चिंताएं जताई जा चुकी हैं। इन आरोपों को एक सिरे से खारिज कर दिया गया है। ईसीआई ने स्पष्ट रूप से यह बात दोहराई कि ईवीएम में निहित कारगर तकनीकी एवं प्रशासनिक हिफाजतों को देखते हुए ईवीएम में कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है और इस तरह चुनाव प्रक्रिया की प्रामाणिकता संरक्षित रहती है।
नागरिकों एवं सभी संबंधित लोगों की जानकारी के लिए इस विषय के मद्देनजर कुछ तथ्यों पर एक बार फिर प्रकाश डालना उपयोगी साबित होग

ईवीएम की पृष्ठभूमि

मतपत्रों के उपयोग से जुड़ी कुछ विशेष समस्याओं से निजात पाने और प्रौद्योगिकी के विकास से लाभ उठाने के उद्देश्य से आयोग ने दिसंबर, 1977 में ईवीएम का विचार सामने रखा था, ताकि मतदाता बगैर किसी संशय के सही ढंग से अपने वोट डाल सकें और अवैध वोटों की संभावनाओं को पूरी तरह से खत्म किया जा सके। संसद द्वारा दिसंबर 1988 में इस कानून को संशोधित किया गया था और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में एक नई धारा 61ए को जोड़ा गया था जिसके तहत वोटिंग मशीनों के उपयोग के लिए आयोग को अधिकार दिया गया था। संशोधित प्रावधान 15 मार्च, 1989 से प्रभावी हुआ।

केन्द्र सरकार ने जनवरी 1990 में चुनाव सुधार समिति का गठन किया था जिसमें अनेक मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय दलों के प्रतिनिधि शामिल थे। चुनाव सुधार समिति ने बाद में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) का आकलन करने के उद्देश्य से एक तकनीकी विशेषज्ञ समिति का गठन किया। समिति ने यह निष्कर्ष निकाला कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन एक सुरक्षित प्रणाली है। अत: विशेषज्ञ समिति ने और समय बर्बाद किये बगैर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का उपयोग किये जाने के बारे में अप्रैल 1990 में सर्वसम्मति से सिफारिश की। वर्ष 2000 के बाद ईवीएम का उपयोग राज्य विधानसभाओं के लिए हुए 107 चुनावों और वर्ष 2004, 2009 और 2014 में लोकसभा के लिए हुए 3 चुनावों में किया जा चुका है।

ईवीएम के इस्तेमाल पर न्यायिक निर्णय-

वर्ष 2001 के बाद ईवीएम में संभावित छेड़छाड़ के मसले को विभिन्न उच्च न्यायालयों में उठाया जा चुका है, जिसका उल्लेख नीचे किया गया है:

मद्रास उच्च न्यायालय-2001
दिल्ली उच्च न्यायालय-2004
कर्नाटक उच्च न्यायालय-2004
केरल उच्च न्यायालय-2002
बॉम्बे उच्च न्यायालय (नागपुर बेंच)-2004
उपर्युक्त सभी उच्च न्यायालयों ने भारत में हुए चुनावों में ईवीएम के उपयोग में निहित तकनीकी सुदृढ़ता और प्रशासनिक उपायों के समस्त पहलुओं पर गौर करने के बाद यह पाया है कि भारत में ईवीएम विश्वसनीय, भरोसेमंद एवं पूरी तरह से छेड़छाड़ मुक्त हैं। इनमें से कुछ मामलों में यहां तक कि उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के आदेशों के खिलाफ कुछ याचिकाकर्ताओं द्वारा दाखिल की गयी अपीलों को खारिज कर दिया है।

माननीय कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि “यह आविष्कार नि:संदेह इलेक्ट्रॉनिक एवं कम्प्यूटर प्रौद्योगिकी से जुड़ी एक महान उपलब्धि और राष्ट्रीय गौरव है।” कर्नाटक उच्च न्यायालय एवं मद्रास उच्च न्यायालय दोनों ने ही यह अवलोकन किया कि मतपत्र/मतपेटी वाली चुनाव प्रणाली की तुलना में चुनाव में ईवीएम के उपयोग के कई फायदे हैं। माननीय मद्रास उच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट शब्दों में ईवीएम में छेड़छाड़ किये जाने की संभावना से साफ इनकार किया है। मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा किया गया निम्नलिखित अवलोकन ध्यान देने योग्य है।

“कोई वायरस या बग डालने का सवाल भी नहीं पैदा होता है क्योंकि ईवीएम की तुलना पर्सनल कम्प्यूटर से नहीं की जा सकती है। कम्प्यूटर में अंतर्निहित सीमाएं होती हैं क्योंकि उसमें इंटरनेट के जरिए कनेक्शन होता है और उसके विशेष डिजाइन को देखते हुए प्रोग्राम विशेष में छेड़छाड़ की जा सकती है, लेकिन ईवीएम स्वतंत्र इकाइयां होती हैं और ईवीएम में प्रोग्राम पूरी तरह से एक भिन्न प्रणाली के रूप में होता है।”

इसके पश्चात, वर्ष 2009 में हुए आम चुनाव के बाद भी राजनीतिक दलों ने यह कहते हुए इस मसले को तूल दिया था कि ईवीएम पूरी तरह से छेड़छाड़ मुक्त नहीं हैं और इसमें फेरबदल की गुंजाइश रहती है। हालांकि, कोई विशिष्ट आरोप नहीं लगाया गया और न ही किसी अदालत में वे इसे साबित कर पाये।

कुछ कार्यकर्ताओं ने वर्ष 2009 में उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल की थी। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने उन्हें ईसीआई जाने की सलाह दी। उसके बाद ही इन कार्यकर्ताओं ने खुला संवाद किया। उधर, ईसीआई ने यह खुली चुनौती दी कि क्या कोई भी व्यक्ति यह साबित कर सकता है कि ईसीआई के पास मौजूद मशीन से छेड़छाड़ की जा सकती है। हालांकि, ईसीआई द्वारा दिये गये अवसरों के तहत मशीनों को खोलने एवं आंतरिक कलपुर्जों को खोलकर दिखाने के बावजूद कोई भी व्यक्ति ईसीआई के मुख्यालय में इस मशीन में किसी भी तरह की छेड़छाड़ की गुंजाइश को प्रदर्शित नहीं कर पाया। इस कार्यवाही की वीडियोग्राफी भी की गयी।

वर्ष 2010 में ईसीआई द्वारा बुलाई गयी एक बैठक में असम एवं तमिलनाडु के कुछ राजनीतिक दलों को छोड़ सभी राजनीतिक दलों ने ईवीएम के कामकाज के तरीके पर संतुष्टि जताई। उसी दौरान वीवीपीएटी का विचार सामने रखा गया, ताकि आगे और ज्यादा जांच संभव हो सके।

ईसीआई द्वारा उपयोग की गयी ईवीएम में तकनीकी सुरक्षा

इस मशीन में छेड़छाड़/फेरबदल की रोकथाम सुनिश्चित करने के लिए इसे इलेक्ट्रॉनिक तरीके से सुरक्षित बनाया गया है। इन मशीनों में उपयोग किये गये प्रोग्राम (सॉफ्टवेयर) को तप्त करके वन टाइम प्रोग्राम/मास्क्ड चिप का रूप दे दिया जाता है, ताकि इसमें किसी भी तरह का फेरबदल अथवा छेड़छाड़ कतई संभव न हो सके। इसके अलावा, इन मशीनों की न तो किसी वायर के जरिये अथवा वायरलेस ढंग से ही किसी अन्य मशीन या प्रणाली से नेटवर्किंग की जाती है। अत: इसके डेटा में फेरबदल की कोई भी संभावना नहीं रहती है।
ईवीएम के सॉफ्टेवयर को बीईएल (रक्षा मंत्रालय का पीएसयू) और ईसीआईएल (परमाणु ऊर्जा मंत्रालय का पीएसयू) के इंजीनियरों के एक चुनिंदा समूह द्वारा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग इन-हाउस विकसित किया जाता है। दो-तीन इंजीनियरों का एक चुनिंदा सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट समूह सोर्स कोड की डिजाइनिंग करता है तथा इस कार्य के लिए किसी और से अनुबंध नहीं किया जाता है।
सॉफ्टवेयर की डिजाइनिंग का काम पूरा हो जाने के बाद सॉफ्टवेयर का परीक्षण एवं आकलन सॉफ्टवेयर आवश्यकता विनिर्देशों (एसआरएस) के अनुसार एक स्वतंत्र परीक्षण समूह द्वारा किया जाता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि वास्तव में केवल निर्धारित उपयोग के लिए ही तय की गयी आवश्यकताओं के अनुरूप इस सॉफ्टेवयर को लिखा गया है।
ईवीएम के सोर्स कोर्ड को हमेशा नियंत्रित स्थितियों में स्टोर करके रखा जाता है। इसकी निगरानी एवं नियंत्रण की पूरी व्यवस्था की जाती है, ताकि केवल अधिकृत अधिकारीगण ही इस कोड तक पहुंच सकें।
वर्ष 2006 में कुछ अतिरिक्त खूबियां ईसीआई-ईवीएम में डाली गयीं जैसे कि बैलट यूनिट (बीयू) और कंट्रोल यूनिट (सीयू) के बीच गतिशील कोडिंग, रीयल टाइम घड़ी लगाना, पूर्ण डिस्प्ले सिस्टम लगाना और ईवीएम में हर बार बटन को दबाने पर तारीख और समय का अंकित होना।

ईसीआई-ईवीएम की विशिष्टता

कुछ राजनीतिक दलों ने कहा है कि विदेश में कई देशों ने ईवीएम का इस्तेमाल बंद कर दिया है। आयोग ने ईसीआई-ईवीएम और विदेश में उपयोग की गयी ईवीएम के बीच तुलना की है। इस तरह की तुलना गलत के साथ-साथ गुमराह करने वाली भी है। ईसीआई-ईवीएम अपने-आप में बिल्कुल अलग एवं स्वतंत्र मशीन है। अत: ईसीआई-ईवीएम की तुलना अन्य देशों की मशीनों से नहीं की जा सकती है।

अन्य देशों में इस्तेमाल किये गये ज्यादातर सिस्टम इंटरनेट कनेक्टिविटी से युक्त कम्प्यूटर आधारित हैं। अत: इन सिस्टमों की हैकिंग किये जाने का खतरा बना रहता है।
ईसीआई-ईवीएम विभिन्न देशों में अपनायी गयी वोटिंग मशीनों और प्रक्रियाओं से बुनियादी तौर पर बिल्कुल भिन्न है।

प्रक्रियात्मक और प्रशासनिक सुरक्षा

आयोग ने सुरक्षा उपायों की एक विस्तृत प्रशासनिक प्रणाली और प्रक्रियात्मक निगरानी एवं नियंत्रण की पुख्ता व्यवस्था कर रखी है जिसका उद्देश्य किसी भी संभावित दुरुपयोग अथवा प्रक्रियात्मक खामी की रोकथाम सुनिश्चित करना है। ईसीआई द्वारा इन सुरक्षा उपायों पर पारदर्शी रूप से अमल किया जाता है जिसमें हर चरण में राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और उनके प्रतिनिधियों की सक्रिय एवं दस्तावेज संबंधी भागीदारी रहती है, ताकि ईवीएम की प्रभावकारिता और विश्वसनीयता पर उनका विश्वास सदैव बना रहे। ये सुरक्षा उपाय निम्नलिखित हैं:

(ए) प्रत्‍येक चुनाव के पहले राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ईवीएम बनाने वाली कंपनियों के इंजीनियरों द्वारा चुनाव में उपयोग में लाये जाने वाली प्रत्‍येक प्रत्‍येक ईवीएम की प्रथम स्‍तरीय जांच (एफएलसी) की जाती है। किसी ईवीएम में गडबडी पाये जाने पर उसे अलग रख दिया जाता है और चुनाव में उसका उपयोग नहीं होता।

(बी) प्रथम स्‍तर की जांच के समय ईवीएम बनाने वाली कंपनी प्रमाणित करती है कि ईवीएम में लगाये गये सभी उपकरण मौलिक हैं। इसके बाद ईवीएम की प्‍लास्टिक कैबिनेट नियंत्रण इकाई गुलाबी कागज की सील से सील की जाती है। इस पर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि हस्‍ताक्षर करते हैं और इसे स्‍ट्रॉंग रूम में रखा जाता है। इस चरण के बाद ईवीएम की प्‍लास्टिक कैबिनेट नियंत्रण इकाई को खोला नहीं जा सकता। ईवीएम के अंदर किसी तरह के उपकरण का प्रयोग नहीं हो सकता।

(सी) इसके अतिरिक्‍त, प्रथम स्‍तरीय जांच के समय राजनीतिक दलों द्वारा चुनी गई पांच प्रतिशत इलेक्‍ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों द्वारा कम से कम एक हजार वोट डाले जाते हैं। इस बनावटी मतदान के परिणामों के प्रिंट आउट और प्रथम स्‍तरीय जांच के समय बनावटी मतदान के दौरान क्रमानुसार डाले गये प्रत्‍येक वोट का प्रिंटआउट कम से कम पांच प्रतिशत ईवीएम के लिए निकाला जाता है और प्रिंटआउट राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को दिखाये जाते हैं। इसके लिए राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को इस बात की अनुमति दी जाती है कि वे अपनी इच्‍छा अनुसार मशीने उठायें। शेष मशीनों में बनावटी मतदान के दौरान डाले गये मतों से राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को संतुष्‍ट कराया जाता है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को स्‍वयं बनावटी मतदान संपन्‍न करने की अनुमति है। इसे डीओ/आरओ द्वारा दस्‍तावेज के रूप में दर्ज किया जाता है।

(डी) इसके बाद रखी गयी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में आवंटित करने के लिए ईवीएम मशीनों को दो बार कंप्‍यूटर सॉफ्टवेयर द्वारा खंगाला जाता है और ईवीएम मशीनों को उपयोग में लाने के लिए मतदान केंद्रों को वितरित करने से पहले उम्‍मीदवारों या उनके प्रतिनिधियों की उपस्थिति में मतदान केन्‍द्रों के लिए स्‍थानांतरित किया जाता है। राजनीतिक दलों /उम्‍मीदवारों को ईवीएम क्रम संख्‍या वाली सूची दी जाती है।

(ई) उम्‍मीदवारों तथा उनके प्रतिनिधियों को उम्‍मीदवार सेटिंग के समय ईवीएम पर बनावटी मतदान संचालित करने की अनुमति दी जाती है और मतदान के दिन वास्‍तविक मतदान से पहले भी उम्‍मीदवारों और उनके प्रतिनिधियों को इस तथ्‍य से संतुष्‍ट कराया जाता है कि ईवीएम मशीनें संतोषजनक रूप से काम कर रही हैं।

(एफ) उम्‍मीदवार सेटिंग का काम हो जाने के बाद ईवीएम की बैलट इकाई धागे / गुलाबी कागज की सील से सील की जाती है ताकि बैलट इकाई के अंदर किसी की पहुंच न हो सके। इन गुलाबी सीलों पर राजनीतिक दलों/ उम्‍मीदवार के प्रतिनिधियों के हस्‍ताक्षर होते हैं।

(जी) बनावटी मतदान के परिणामों के प्रिंटआउट तथा बनावटी मतदान के दौरान डाले गये क्रमानुसार प्रत्‍येक वोट के प्रिंटआउट कम से कम पांच प्रतिशत ईवीएम मशीनों के लिए ईवीएम तैयार करने और उम्‍मीदवार सेटिंग के समय निकाले जाते हैं और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को दिखाया जाता है। इसके लिए राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को उनकी इच्‍छानुसार मशीनें चुनने की अनुमति है।

(एच) मतदान के दिन प्रत्‍येक मतदान केन्‍द्र पर उम्‍मीदवारों के प्रतिनिधियों / पोलिंग एजेंटों की उपस्थिति में कम से कम 50 मतों का बनावटी मतदान संपन्‍न कराया जाता है और प्रत्‍येक पीठासीन अधिकारी से बनावटी मतदान का प्रमाण पत्र प्राप्‍त किया जाता है।

(आई) बनावटी मतदान खत्‍म होने के बाद ईवीएम मशीनें धागे और हरे कागज की सील से सील की जाती है ताकि चुनाव कराने के लिए उपयोग में आने वाले बटनों को छोडकर सभी बटन तक पहुंच ब्‍लॉक कर दी जाए। कागज और धागे की इन सीलों पर पोलिंग एजेंटों के हस्‍ताक्षर की अनुमति है। मतदान सम्‍पन्‍न होने के बाद पोलिंग एजेंटों की उपस्थिति में पीठासीन अधिकारी ‘’क्‍लोज’’ बटन दबाते हैं। इसके बाद ईवीएम मशीन में कोई वोट नहीं डाला जा सकता।

(जे) इसके बाद पूरी ईवीएम सील कर दी जाती है। सीलों पर उम्‍मीदवारों और उनके हस्‍ताक्षर की अनुम‍ति होती है। मतगणना शुरू होने से पहले उम्‍मीदवार और उनके एजेंट हस्‍ताक्षर सटीक होने की जांच कर सकते हैं। मतदान केन्‍द्रों से मतगणना स्‍टोर रूम तक ईवीएम मशीनों को ले जाने वाले वाहनों के पीछे-पीछे उम्‍मीदवार/ उनके प्रतिनिधि चलते हैं।

(के) इसके अतिरिक्‍त मतगणना के लिए ईवीएम मशीनें रखने के लिए बने स्‍ट्रॉंगरूम को सील कर दिया जाता है और स्‍ट्रॉंग रूमों की दिन-रात निगरानी की जाती है। स्‍ट्रॉंगरूम की सीलों पर उम्‍मीदवारों और उनके प्रतिनिधियों के हस्‍ताक्षर की अनुमति है। उन्‍हें दिन रात स्‍ट्रॉंगरूम पर नजर रखने की अनुमति है।

(एल) सभी राजनीतिक दलों के उम्‍मीदवारों के प्रतिनिधियों को प्रथम चरण की जांच, मतदान से पहले ईवीएम मशीनें तैयार करने, बनावटी मतदान आदि में भाग लेने का अवसर दिया जाता है।

मतदाता सत्‍यापन योग्‍य पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी)

भारत निर्वाचन आयोग ने 2010 में राजनीतिक दलों के साथ हुई मंत्रणा के आधार पर पारदर्शिता बढाने की दृष्टि से मतदाता सत्‍यापन योग्‍य प्रेपर ओडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) के उपयोग करने पर विचार किया। वीवीपीएटी लागू करने का अर्थ यह है कि नियंत्रण इकाई में मत की रिकॉर्डिंग के साथ उम्‍मीदवार के नाम और चुनाव चिन्‍ह् वाली कागजी पर्ची निकाली जा सके ताकि किसी तरह के विवाद के मामले में ईवीएम मशीनों में दिखाये जा रहे परिणाम की पुष्टि कागजी पर्जी गिनकर की जा सके। वीवीपीएटी के अंतर्गत बैलट इकाई से प्रिंटर जुड़ा होता है और इसे मतदान के खांचे में रखा जाता है। सात सेकेंड के लिए वीवीपीएटी पर कागजी पर्ची दिखती है। वीएल / ईसीआईएल द्वारा निम्रित वीवीपीएटी के डिजाइन की मंजूरी 2013 ने भारत निर्वाचन आयोग द्वारा दी गई और उन लोगों को दिखाया गया जो इस मामले को उच्‍चतम न्‍यायालय में ले गये। नियमों में संशोधन किये गये। भारत निर्वाचन आयोग ने 2013 में नगालैंड के उप चुनाव में वीवीपीएटी का उपयोग किया। यह उपयोग काफी सफल रहा। उच्‍चतम न्‍यायालय ने चरणबद्ध तरीके से वीवीपीएटी लगाने का आदेश दिया और सरकार से वीवीपीएटी प्राप्‍त करने के लिए धन स्‍वीकृ‍त करने को कहा।

इस संबंध में जून 2014 में आयोग ने 2019 में होने वाले लोकसभा आम चुनाव में प्रत्‍येक मतदान केन्‍द्र पर वीवीपीएटी लागू करने का प्रस्‍ताव किया और सरकार से 317 करोड़ रूपये की राशि मांगी। माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने भी चरणबद्ध तरीके से वीवीपीएटी लागू करने की अनुमति भारत निर्वाचन आयोग को दी।

उच्‍चतम न्‍यायालय में चल रहे मामले में आयोग ने मार्च 2017 में शीर्ष अदालत को बताया कि भारत निर्वाचन आयोग सरकार की ओर से राशि जारी करने के समय से 30 महीनों में बने आवश्‍यक संख्‍या में वीवीपीएटी प्राप्‍त कर लेगा।

2013 में भारत निर्वाचन आयोग को 20 हजार वीवीपीएटी प्राप्‍त हुए और तब से 143 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में वीवीपीएटी का उपयोग किया गया है। वर्ष 2016 में बीईएल द्वारा 33500 वीवीपीएटी तैयार किये गये हैं। अब तक 255 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों और 9 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में वीवीपीएटी का उपयोग किया गया है। 2017 में गोवा चुनाव में सभी 40 विधानसभा क्षेत्रों में वीवीपीएटी की तैनाती की गई थी। हाल में पांच राज्‍यों में हुए चुनाव में भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 52000 वीवीपीएटी की तैनाती की गई थी। भारत निर्वाचन आयोग 2014 से आवश्‍यक संख्‍या में वीवीपीएटी तैयार करने के लिए सरकार से 3174 करोड़ रूपये की राशि जारी करने का आग्रह कर रहा है, ताकि 2019 के लोकसभा आम चुनाव में सभी मतदान केन्‍द्रों पर वीवीपीएटी का उपयोग हो सके।

जैसा की ऊपर बताया गया है आयोग ने चुनाव में ईवीएम के कार्य दोषमुक्‍त तरीके से सुनिश्चित करने के लिए व्‍यापक तकनीकी और प्रशासनिक प्रणाली की व्‍यवस्‍था की है। इस तरह आयोग भारत निर्वाचन आयोग- ईवीएम के सुरक्षित कामकाज को लेकर पूरी तरह संतुष्‍ट है। यह कहा जा सकता है कि इस तरह के आरोप और शंकाएं पहली बार नहीं व्‍यक्‍त की गई हैं। पहले भी आयोग ने अनेक बार ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगाने वालों को संतुष्‍ट होने का अवसर दिया है और कोई भी यह दिखा नहीं पाया है कि देश की चुनाव प्रक्रिया में उपयोग में लाई गई भारत निर्वाचन आयोग की ईवीएम मशीनें में जोड़ तोड़ और छेड़छाड़ की जा सकती है। आयोग इस तरह के आरोपों में किसी तरह का तथ्‍य नहीं पाता और कुछ राजनीतिक दलों द्वारा लगाये गये आरोपों और व्‍यक्‍त की गई शंकाओं को आयोग नामंजूर करता है।

भारत निर्वाचन आयोग सभी नागरिकों को आश्‍वस्‍त करता है कि भारत निर्वाचन आयोग की ईवीएम मशीनों से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती और आयोग ईवीएम उपयोग करने वाली निर्वाचन प्रक्रिया की शुद्धता से पूरी तरह संतुष्‍ट है। भारत निर्वाचन आयोग चरणबद्ध तरीके से वीवीपीएटी की तैनाती करके निर्वाचन प्रक्रिया में नागरिकों के विश्‍वास को और आगे बढ़ायेगा।

हाल में सम्‍पन्‍न चुनाव प्रक्रिया के दौरान ईवीएम मशीनों से कथितरूप से छेड़छाड़ के बारे में आयोग को राजनीतिक दलों / उम्‍मीदवारों की ओर से कोई विशेष शिकायत या ठोस सामग्री नहीं प्राप्‍त हुई है। अभी आधारहीन, अनुमानित और बेबुनियाद आरोप लगाये जा रहे हैं और ये सभी आरोप नामंजूर करने के योग्‍य हैं।

निर्वाचन आयोग इस बात पर बल देना चाहेगा कि उसे हमेशा यह संतुष्टि रही है कि ईवीएम से छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता। 2004, 2009 तथा 2014 में हुए राष्‍ट्रव्‍यापी आम चुनावों सहित पिछले अनेक वर्षों में हुए चुनावों में मशीनों के उपयोग के बारे में आयोग की आस्‍था कभी नहीं डिगी। आज की तिथि तक कोई यह नहीं दिखा सका है कि निर्वाचन द्वारा उपयोग की जाने वाली ईवीएम मशीनों से छेड़छाड़ किया जा सकता है और इसमें किसी तरह का जोड़ तोड़ किया जा सकता है। जो दिखाया गया है और दिखाये जाने का दावा किया जा रहा है वह नि‍जी रूप से एकत्रित भारत निर्वाचन आयोग की तरह दिखने वाली मशीने हैं और भारत निर्वाचन आयोग की वास्‍तविक ईवीएम मशीनें नहीं हैं। भारत निर्वाचन आयोग मुख्‍यालय में 2009 में असाधारण कदम उठाते हुए ईवीएम मशीनों के बारे में छोटे से छोटे संदेह और गलतफहमियों को दूर करने के लिए डिमॉन्‍सट्रेशन किया गया था। आज आयोग एक बार फिर ईवीएम मशीनों के अचूक होने के बारे में अपने विश्‍वास की पूरी तरह पुष्टि करता है। हमेशा कि तरह ईवीएम मशीनें छेड़छाड़ मुक्‍त हैं।

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