केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को लोकसभा स्पीकर की मंज़ूरी मिल चुकी है और 20 जुलाई यानी शुक्रवार को इस पर मत विभाजन होगा और सदन में इस प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हो चुकी है। सरकार के खिलाफ पेश किए जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव के लोकसभा में पारित हो जाने पर मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ता है। अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित नियम 198 के तहत व्यवस्था है कि किसी भी सांसद द्वारा कम-से-कम 50 सदस्यों के समर्थन के साथ सौंपे गए इस प्रस्ताव को लोकसभा स्पीकर मंज़ूरी देते हैं। इसके बाद निर्धारित समय पर पक्ष-विपक्ष के सदस्य चर्चा करते हैं जिसके बाद मत-विभाजन होता है। हालांकि, सदन में हंगामा और संभ्रम (यानी अध्यक्ष का 50 सदस्यों की स्पष्ट गिनती करने में असमर्थ होना) की स्थिति में अविश्वास प्रस्ताव चर्चा के लिए नहीं लिया जा सकता। वहीं, विश्वास प्रस्ताव सरकार की ओर से अपना बहुमत और मंत्रिमंडल में सदन का विश्वास स्थापित करने के लिए लाया जाता है, जबकि अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष की ओर से सरकार के खिलाफ लाया जाता है।

भारतीय संसद के इतिहास में पहली बार अगस्त 1963 में जे बी कृपलानी ने अविश्वास प्रस्ताव रखा था। यह अविश्वास प्रस्ताव भारत-चीन युद्ध के बाद लाया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार के खिलाफ रखे गए इस प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट पड़े और विरोध में 347 वोट। पहला अविश्वास प्रस्ताव पंडित जवाहर लाला नेहरू सरकार के खिलाफ आया था। तब से लेकर अब तक संसद में कई बार अविश्वास प्रस्ताव रखे जा चुके हैं। 2014 में सत्ता में आई मोदी सरकार के खिलाफ यह पहला अविश्वास प्रस्ताव है।

नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ पेश होने वाले अविश्वास प्रस्ताव से पहले भी 26 बार संसद में ऐसे प्रस्ताव पेश हो चुके हैं जबकि 12 बार विश्वास प्रस्ताव पेश किया जा चुका है। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनकी विभिन्न सरकारों के खिलाफ विपक्षी दलों ने 15 बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किए। 12 बार उनके खिलाफ 1966 से 1975 के बीच अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और 1981 से 1982 के बीच 3 बार, हालांकि यह भी एक तथ्य है कि इंदिरा गांधी खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव कभी भी पास नहीं हो पाया। इंदिरा गांधी के बाद प्रधानमंत्री बने उनके बेटे राजीव गांधी को भी एक बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था। लाल बहादुर शास्त्री और नरसिम्हा राव की सरकारों ने तीन-तीन बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया।

1993 में नरसिंह राव बहुत कम अंतर से अपनी सरकार के ख़िलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को हरा पाए। अब तक अविश्वास प्रस्ताव में हुई वोटिंग में यह सबसे नजदीकी मामला था और उस समय सीपीआई के नेता अजय मुखोपाध्याय ने नरसिम्हा राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया था। यह अविश्वास प्रस्ताव महज 14 वोटों के करीबी अंतर से गिर गया था और बाद में उनकी सरकार पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को प्रलोभन देने का आरोप भी लगा। नब्बे के दशक में विश्वनाथ प्रताप सिंह, एच डी देवेगौड़ा, आई के गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारें विश्वास प्रस्ताव हार गईं थी। 1979 में ऐसे ही एक प्रस्ताव के पक्ष में ज़रूरी समर्थन न जुटा पाने के कारण तत्काली प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने इस्तीफा दे दिया था। आखिरी बार 2008 में तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह अमेरिका से हुए न्यूक्लियर डील के बाद सदन में विश्वास मत हासिल किया था।

एनडीए सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्ष में रहते हुए दो बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किए हैं और जब वो खुद प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने दो बार 1996 और 1998 में विश्वास प्रस्ताव पेश किया। वाजपेयी ने एक बार इंदिरा गांधी के खिलाफ और दूसरी बार नरसिम्हा राव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। वाजपेयी भारत के संसदीय इतिहास में एकलौते ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अविश्वास प्रस्ताव पेश भी किया है और पीएम रहते हुए इसका सामना भी किया है। 1996 में तो उन्होंने मतविभाजन से पहले ही इस्तीफा दे दिया और 1998 में वे एक वोट से हार गए। वाजपेयी के खिलाफ एक बार 2003 में अविश्वास प्रस्ताव भी लाया जा चुका है जिसमें वे सफल हुए थे।

मोरारजी देसाई सरकार के खिलाफ 1978 में लाया गया था। मोरारजी देसाई सरकार के कार्यकाल के दौरान दो बार अविश्वास प्रस्ताव रखा गया। पहले प्रस्ताव से उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन दूसरे के समय उनकी सरकार के घटक दलों में आपसी मतभेद थे और अपनी हार का अंदाज़ा लगते ही मोरारजी देसाई ने मतविभाजन से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया।

अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का रिकॉर्ड सीपीएम पार्टी के सांसद रहे और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योतिर्मय बसु के नाम है। उन्होंने चार बार इंदिरा सरकार के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया है।

क्या है अंकगणित?

अब सवाल यह उठता है कि क्या मोदी सरकार के पास इस अविश्वास प्रस्ताव को विफल करने के लिए पर्याप्त नंबर हैं और इससे केंद्र सरकार को कोई ख़तरा तो नहीं है? गौरतलब है कि वर्तमान में लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 है जिनमें से 9 सीटें अभी खाली हैं यानी इस वक्त लोकसभा के कुल 534 सांसद हैं। इस लिहाज से लोकसभा में साधारण बहुमत का आंकड़ा 534 का आधा 267+1 यानी 268 होता है।

फ़िलहाल लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी और अकेले उसके पास 272+1 (लोकसभा अध्यक्ष) सांसद हैं और सहयोगी दलों को मिलाकर एनडीए गठबंधन के पास 310 से अधिक सांसद हैं। इनमें शिवसेना के सांसद (18), एलजेपी (6), अकाली दल (4), आरएलएसपी (3), जेडीयू (2), अपना दल (2), एनआर कांग्रेस (1), पीएमके (1) और एनपीपी (1) हैं।

अगर सहयोगी दलों को छोड़ भी दें तो भाजपा अकेले अपने दम पर सदन में विश्वास मत हासिल कर लेगी। ऐसे में तकनीकी तौर पर देखा जाए तो सरकार को पेश होने वाले अविश्वास प्रस्ताव से कोई ख़तरा नहीं है।

सदन में मौजूदा सांसद- 534
बहुमत का आंकड़ा – 268
एनडीए – 310 से अधिक
रुख साफ नहीं – 72
यूपीए और अन्य 147

कमजोर विपक्ष, सरकार को खतरा नहीं

अन्नाद्रमुक-37, बीजद-20, टीआरएस-11, इनेलो-02, पीडीपी-01, पप्पू यादव-01 समेत 72 सांसद ऐसे हैं जो दोनों पक्षों से बराबर दूरी बनाए हुए हैं। यह अगर विपक्ष के साथ नहीं जाते हैं तो अविश्वास प्रस्ताव के साथ खड़े कांग्रेस, तेलुगुदेशम, माकपा, भाकपा, सपा, तृणमूल कांग्रेस, राकांपा, आप, राजद समेत एक दर्जन से ज्यादा दलों के पास 147 सांसदों का ही समर्थन रह जाता है, जो एनडीए से बहुत पीछे है। ऐसे में सरकार को कोई खतरा नहीं दिखता है।

दरअसल अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव में अंतर होता है। पहली स्थिति में सरकार के गठन के वक्त और दूसरी स्थिति में राष्ट्रपति के कहने पर विश्वास प्रस्ताव पेश किया जाता है। अब तक राष्ट्रपति के दिशा-निर्देश पर 11 बार विश्वास प्रस्ताव पेश किए जा चुके हैं। जिसमें से 6 बार सरकारें सफल हुई हैं और 5 बार असफल हुई हैं। विश्वास प्रस्ताव को ‘ट्रस्ट वोट’ भी कहा जाता है।

इन प्रधानमंत्रियों की जा चुकी है विश्वास प्रस्ताव में कुर्सी

अब तक 6 प्रधानमंत्रियों ने विश्वास प्रस्ताव पेश किया है। दो बार तो प्रधानमंत्रियों ने बिना विश्वास प्रस्ताव का सामना किए बगैर ही इस्तीफा दे दिया था। मोरारजी देसाई के इस्तीफा देने के बाद 1979 में केंद्र में चौधरी चरण सिंह की सरकार बनी थी। कांग्रेस ने चरण सिंह की सरकार को बाहर से समर्थन देने का ऐलान किया था लेकिन विश्वास प्रस्ताव से पहले समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी। इसकी वजह से चौधरी चरण ने विश्वास प्रस्ताव को पेश किए बगैर इस्तीफा दे दिया। इस तरह चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री रहते हुए संसद न जाने वाले पहले और अबतक के एकमात्र प्रधानमंत्री हुए।

7 नवंबर, 1990 को वीपी सिंह ने बीजेपी के समर्थन वापस लेने के बाद विश्वास प्रस्ताव पेश किया था। इस विश्वास प्रस्ताव में कांग्रेस, चंद्रशेखर गुट और बीजेपी के एक साथ आने की वजह से वीपी सिंह यह प्रस्ताव हार गए। वीपी सिंह के पक्ष में 152 वोट और खिलाफ में 356 वोट पड़े। वीपी सिंह के मामले में मजेदार तथ्य यह है कि लोकसभा के एक सदस्य ने वीपी सिंह की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा अध्यक्ष को दिया था। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने सरकार को विश्वास प्रस्ताव पेश करने को कहा।

28 मई, 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वास मत को पास न होता देख 13 दिनों में ही इस्तीफा दे दिया। 11 अप्रैल, 1997 में एचडी देवेगौड़ा कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद विश्वास प्रस्ताव में हार गए। 17 अप्रैल, 1999 अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार जयललिता द्वारा समर्थन वापस लेने की बाद 1 वोट से गिर गई। विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 269 और खिलाफ में 270 वोट पड़े।

इसके बाद 2008 में लेफ्ट पार्टियों द्वारा न्यूक्लियर डील पर समर्थन वापस लेने के बाद मनमोहन सिंह की सरकार ने विश्वास प्रस्ताव पेश किया था। इसमें काफी नजदीकी अंतर से मनमोहन सिंह की सरकार को जीत मिली थी। सरकार के पक्ष में 275 वोट पड़े और विपक्ष में 256 वोट जबकि 10 सदस्य लोकसभा से अनुपस्थित रहे।

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