भारत के कड़े विरोध के बीच चीन में ‘वन बेल्ट वन रोड’ समिट शुरू, जानें- क्या है परियोजना का असली गणित…

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भारत के कड़े विरोध के बीच चीन के बीजिंग में रविवार को ‘वन बेल्ट वन रोड’ प्रोजेक्ट समिट शुरू हो गया, जो दो दिन तक चलेगा। इसमें 29 देशों के राष्ट्राध्यक्ष, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस, विश्व बैंक के प्रेसिडेंट जिम योंग किम, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टीन लगार्ड के अलावा 130 देशों के अधिकारी, उद्योगपति, फाइनेंसर और पत्रकार हिस्सा ले रहे हैं। रविवार को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वन बेल्ट वन रोड फोरम का उद्घाटन किया। दुनिया भर से आए 1,500 प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उन्होंने वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटिव को ‘प्रोजेक्ट ऑफ द सेंचुरी’ करार दिया। उन्होंने कहा कि इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना से दुनिया भर के लोगों को फायदा होगा। चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि सालों पुरानी हजारों किलोमीटर लंबी प्राचीन सिल्क रूट शांति, समृद्धि, सहयोग और खुलेपन का प्रतीक रहा है। यह मानव सभ्यता की विरासत बन चुका है। इसी तरह नई सिल्क रोड परियोजना भी दुनिया में शांति, समृद्धि और स्थिरता लाएगी। ओबीओआर लगभग 1,400 अरब डॉलर की परियोजना है। चीन को उम्मीद है कि उसका यह ड्रीम प्रोजेक्ट 2049 तक पूरा हो जाएगा। 2014 में आई रेनमिन यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि नई सिल्क रोड परियोजना करीब 35 वर्ष में यानी 2049 तक पूरी होंगी। यानि समाजवादी चीन बनने की अपनी 100वीं वर्षगांठ को और अभिमान के साथ मनाने का चीन ने अभी से पूरा खांका तैयार कर लिया है। चीन चाहता है कि भारत भी उसके सिल्क रूट का हिस्सा बने। चीन की चाहत है कि बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (बीसीआईएम) गलियारा को भारत भी मंजूरी दे दे। इसके लिए चीन दबाव भी डालने की कोशिश में है, लेकिन भारत ने इस पर पहले ही इससे इनकार कर दिया। बीसीआईएम चीन के प्रस्तावित सिल्क रूट का हिस्सा है। बीसीआईएम के लिए राजी होने का मतलब है भारत के बाजारों का चीनी सामानों से पट जाना। दरअसल भारत में बांग्लादेश और म्यांमार के सामानों के मुकाबते चीनी सामानों की अच्छी खासी मांग है।

भारत का बहिष्कार…

चीन की बेहद महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट ‘वन बेल्ट वन रोड’ समिट का भारत ने बहिष्कार किया है। भारत ने साफ तौर पर कहा है कि वह ऐसी किसी परियोजना को स्वीकार नहीं कर सकता, जो संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करता हो। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गोपाल बागले ने एक बयान में कहा, मामले में अपने सैद्धांतिक रुख से निर्देशित, हम चीन से उसकी संपर्क पहल वन बेल्ट वन रोड पर उपयोगी वार्ता में भागीदारी का आग्रह करते हैं, जिसका नाम बाद में बेल्ट एंड रोड पहल किया गया। उन्होंने कहा कि वह चीन की तरफ से सकारात्मक जवाब का इंतजार कर रहे हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) पर भारत की गहरी आपत्ति है। दरअसल सीपीईसी गिलगिट और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के बालटिस्तान से होकर गुजरता है। भारत PoK सहित समूचे जम्मू कश्मीर राज्य को अपना अखंड हिस्सा मानता है। सीपीईसी चीन की विशिष्ट बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) की महत्वपूर्ण परियोजना है।

चीन ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका को सड़क मार्ग, रेलमार्ग, गैस पाइप लाइन और बंदरगाह से जोड़ने के लिए ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के तहत सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट और मैरीटाइम सिल्क रोड परियोजना शुरू की है। इसके तहत छह गलियारे बनाए जाने की योजना है। इसमें से कई गलियारों पर काम भी शुरू हो चुका है। इसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से गुजरने वाला चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा भी शामिल है, जिसका भारत कड़ा विरोध कर रहा है। भारत का कहना है कि पीओके में उसकी इजाजत के बिना किसी तरह का निर्माण संप्रभुता का उल्लंघन है। कुछ दिन पहले ही चीन ने भारत को शामिल करने के लिए चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का नाम बदलने पर भी राजी हो गया था, लेकिन बाद में इससे पलटी मार गया।

OBOR को टक्कर देगा भारत-रूस का ग्रीन कॉरिडोर

भारत और रूस साथ मिलकर दोनों देशों के बीच 7200 किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर बनाने की तैयारी कर रहे हैं। यह ग्रीन कॉरिडोर भारत और रूस की दोस्ती के 70 साल पूरे होने के मौके पर शुरू होगा। यह ग्रीन कॉरिडोर ईरान होते हुए भारत और रूस को जोड़ेगा. इसके साथ ही भारत यूरोप से भी जुड़ेगा।

क्या है इतिहास…

चीन में प्रॉजेक्ट का मकसद रेलवे, बंदरगाहों, हाइवे और पाइपलाइन के एक नेटवर्क के जरिए मध्य एशिया और यूरोप में व्यापार में नई जान डालना बताया जाता है। वन बेल्ट वन रोड के दो रूट होंगे। पहला लैंड रूट चीन को मध्य एशिया के जरिए यूरोप से जोड़ेगा, जिसे कभी सिल्क रोड कहा जाता था। दूसरा रूट समुद्र मार्ग से चीन को दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्वी अफ्रीका होते हुए यूरोप से जोड़ेगा, जो नया मैरिटाइम सिल्क रोड कहा जा रहा है। 2000 साल से ज्यादा वक्त गुजर गया जब चीन ने सिल्क रोड बनाया था। इसके तहत चीन को सेंट्रल एशिया और अरब से जोड़ने वाले ट्रेड रूट बनाए गए थे। तब चीन का सबसे अहम एक्सपोर्ट सिल्क था, जिसके कारण रूट का नाम सिल्क रोड पड़ा। कारोबार की बदौलत कई बरसों तक इस रूट के आसपास के विकास पर असर पड़ा।

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2013 में कजाकिस्तान में एक भाषण में सिल्क रोड आर्थिक बेल्ट के अपने नजरिए की रूपरेखा पेश की। शुरुआत में यह विचार मध्य एशिया में ट्रांसपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर की फाइनैंसिंग के लिए था। महीनों के भीतर, चीन ने बंदरगाह और दूसरी चीजों का ऐंगल जोड़ दिया। तय किया गया है कि प्रॉजेक्ट में 65 देशों की 4.4 अरब आबादी के साथ ग्लोबल जीडीपी का 2.1 पर्सेंट हिस्सा जुड़ा होगा। आर्थिक जानकारों का अनुमान है कि इसमें एक लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा का सरकारी पैसा लगेगा। चीन के कई देशों से अग्रीमेंट हो चुके हैं। कुछ प्रॉजेक्ट शुरू भी हो चुके हैं। प्रॉजेक्ट से जुड़े देशों में फ्री ट्रेड अग्रीमेंट का भी प्लान है।

चीन को क्या लाभ

प्रॉजेक्ट से चीन अपने इस्पात और अन्य निर्माण सामग्री के लिए नए बाजार का लाभ उठा सकता है, जो ओवर प्रॉडक्शन का शिकार है। यह चीन में एनर्जी डिमांड पूरी करने के लिए भी अहम है। प्रॉजेक्ट ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका और पश्चिम के अन्य देशों में ग्लोबलाइजेशन का विरोध बढ़ रहा है, 2008 के आर्थिक संकट का जख्म रह-रह कर उभर आता है। यह पहल एशिया में बड़ी ताकत बनने के चीन के लक्ष्य को पूरा कर सकती है। वह सैन्य और आर्थिक रूप से अमेरिका के दशकों के प्रभुत्व को खत्म कर सकता है। कहा जा रहा है कि यह प्रॉजेक्ट एशिया के कई देशों में इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी को पूरा कर सकता है। मध्य एशिया के विकास से उइगर मुस्लिमों के बीच चरमपंथ बढ़ने का जोखिम कम हो सकता है, जो चीन के झिंजियांग में भी रह रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि इससे आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी होंगे। चीन पूरी दुनिया के सामने एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने वाले OBOR को वाणिज्यिक लाभ और तरक्की के एक नायाब मॉडल के रूप में पेश कर रहा है॥ चीन ने दुनिया के कई मुल्कों को इसमें भागीदारी के लिए राजी कर लिया है। पूरी दुनिया को इस आर्थिक गलियारे का सब्जबाग दिखाते हुए चीन यह साबित करने की कोशिश कर रहा कि इससे सबका फायदा होगा, इसलिए एशिया से लेकर यूरोप तक सभी देश इसमें शामिल हों। अपनी योजना में चीन काफी हद तक कामयाब भी हो गया है। फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, पोलैंड, बेलारुस, रूस, कजा​खस्‍तान, पाकिस्तान और नेपाल तक को चीन ने इस योजना में शामिल कर लिया है।

भारत क्यों है चिंतित

वन बेल्ट वन रोड प्रॉजेक्ट का एक अहम हिस्सा है- चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर। यह प्रॉजेक्ट पाकिस्तान के कब्जे वाले भारतीय इलाके गिलगित बाल्टिस्तान से गुजरेगा। गिलगित बाल्टिस्तान कानूनन भारत का हिस्सा है, जो जम्मू-कश्मीर के अंदर आता है। हालांकि यह क्षेत्र बरसों से पाकिस्तान के कब्जे में है, लेकिन बिना भारत की सहमति के इस इलाके में कोई द्विपक्षीय प्रॉजेक्ट बनाना इतना आसान नहीं है। भारत इस पूरे प्रॉजेक्ट पर अपनी चिंता कई बार साफ कर चुका है।

ऐसे माहौल में भारत के प्रधानमंत्री का वहां न होना, चीन के ओबीओआर की राजनैतिक मान्यता और आर्थिक साध्यता पर सवाल खड़े करता है। भारत, चीन का सबसे बड़ा पड़ोसी देश है। चाहे उसे उभरते हुए बाजार और जनसंख्या के दृष्टिकोण से देखें या आर्थिक व्यवस्था के आकार व इसकी रफ्तार की नजर से देखें, भारत की दृश्यता को आज नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि चीन तरह-तरह से भारत को लुभाने और उसे ओबीओआर में शामिल कराने की कोशिश में जुटा है।

फिलहाल भारत ओबीओआर को चीन की भू-राजनीति की रणनीति मानता है और खासकर चीन के 62 अरब डॉलर के चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को (सीपीईसी) को लेकर अपना पक्ष साफ कर चुका है। हाल ही में भारत के वित्त और रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने टोक्यो में कहा, इस बात में कोई शंका नहीं है कि भारत को भूमि संप्रभुता के मुद्दे को लेकर ओबीओआर पर गंभीर आपत्तियां हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि नब्बे के दशक से चीन ने संयुक्त राष्ट्र के 1948 के प्रस्ताव को छोड़कर 1972 की शिमला संधि के अंतर्गत कश्मीर को भारत-पाकिस्तान की आपसी बातचीत से सुलझाने का समर्थन किया है। पहली बात तो यह है कि इस तरह का सीपीईसी का नाम बदलने का प्रस्ताव मीडिया के जरिये करना शायद उचित नहीं था।

ऐसा नहीं है कि भारत ओबीओआर से जुड़ा नहीं है। गत माह कोलकाता में ढाई साल के अंतराल के बाद बांग्लादेश, चीन, इंडिया, म्यांमार (बीसीआईएम) इकॉनोमिक कॉरिडोर पर बातचीत फिर से शुरू हुई। इस आर्थिक गलियारे को भी चीन ओबीओआर का ही हिस्सा मानता है। इसके साथ-साथ चीन के एशिया इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक, ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक और सिल्क रोड फंड में भी भारत हिस्सेदार है। और, ये संस्थान ओबीओआर को वित्तीय सहायता देने के लिए बनाए गए हैं। अगले माह कजाकिस्तान (अस्ताना) में शंघाई कॉपरेशन ऑर्गेनाइजेशन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में भारत पूर्ण सदस्य की हैसियत से शामिल होगा। एससीओ की सदस्यता लेने के लिए भारत को यह मानना होगा कि एससीओ की पूर्व में की गई सभी घोषणाओं से वह सहमत है।

याद रहे कि 2016 की एससीओ की घोषणा ने ओबीओआर का पूर्ण समर्थन किया था। इसके अलावा ओबीओआर में चार और आर्थिक गलियारों- मंगोलिया, मध्य एशिया, इंडो-चाइना और हिंद महासागर का भी प्रस्ताव है। यहां भारत पहले से ही हर तरह से जुड़ा हुआ है। इससे लगता है कि भारत और चीन के ओबीओआर पर तालमेल न बनने में सबसे बड़ी समस्या सीपीईसी ही है। इस जटिल समस्या को शायद भारत-चीन और पाकिस्तान की परमाणु समीकरण के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा। आज भारत के 1998 के परमाणु विस्फोटों की 19वीं वर्षगांठ है।

इस दौरान परमाणु हथियारों के मामले में पाकिस्तान को भारत से बराबरी की होड़ में चीन पर निर्भर होते देखा है। पिछले दो वर्षों से भारत न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) की सदस्यता पाने की कोशिश कर रहा है तो चीन ने पाकिस्तान को भी इसकी सदस्यता देने के प्रति रुझान दिखाया है। इस मुद्दे को लेकर भारत-चीन में काफी तनातनी बनी हुई है और इसका सीधा असर भारत-चीन के बीच ओबीओआर पर तालमेल न बनने पर भी है।

यहां पर चीन को भारत के आर्थिक बाजार और राजनैतिक समर्थन की आवश्यकता है और ठीक उसी तरह भारत को भी चीन की पूंजी व तकनीक से फायदा मिल सकता है। हालांकि दोनों देशों को आर्थिक परियोजनाओं में भागीदारी बनाने से फायदा होगा लेकिन भू-राजनीति के दृष्टिकोण में लचीलापन नहीं दिख रहा है।

इन गलियारों से जाल बिछाएगा चीन

न्यू सिल्क रोडके नाम से जानी जाने वाली ‘वन बेल्ट, वन रोड’ परियोजना के तहत छह आर्थिक गलियारे बन रहे हैं। चीन इन आर्थिक गलियारों के जरिए जमीनी और समुद्री परिवहन का जाल बिछा रहा है।

1.चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा
2. न्यू यूराशियन लैंड ब्रिज
3. चीन-मध्य एशिया-पश्चिम एशिया आर्थिक गलियारा
4. चीन-मंगोलिया-रूस आर्थिक गलियारा
5. बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारा
6. चीन-इंडोचाइना-प्रायद्वीप आर्थिक गलियारा

इसके अलावा चीन से एक जल मार्ग थाईलैंड, मलेशिया होते हुए सिंगापुर और हिंद महासागर की ओर जाएगा। इस तरह सड़क, रेल और बंदरगाहों के जाल बुनने के लिए चीन क़रीब 60 लाख करोड़ रुपए से अधिक की रकम उपलब्ध कराएगा। दुनियाभर में कुल कारोबार का तक़रीबन 90 फ़ीसद हिस्सा अभी समुद्री रास्तों से होकर जाता है। ये सीधे-सीधे द्विपक्षीय आदान-प्रदान होता है। यानी अगर सऊदी अरब से तेल चीन ले जाना हो तो जहाज़ समुद्री रास्ते से चीन पहुँचेगा और ऐसा बहुत कम होता है कि रास्ते में पड़ने वाले किसी और देश को इस व्यापारिक सौदे का फ़ायदा हो। इस परियोजना से व्यापार के लिए समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम हो जाएगी और जहाँ तक अहमियत का सवाल है तो इससे वैश्विक कारोबार की तस्वीर बदल जाएगी क्योंकि,समुद्री रास्तों से कारोबार पर अभी अमरीका का दबदबा है।

ईयू से झटका खाए ब्रिटेन को दिखा सहारा

चीन की बढ़ती ताकत देख ब्रिटेन उसका मुरीद हो चुका है। शायद इसीलिए ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने चीन से व्यापार में दिलचस्पी दिखाते हुए लंदन को मुख्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा था। मौजूदा पीएम थेरेसा मे भी कैमरन से सहमत हैं। उनको भी उम्मीद है कि इससे लंदन को लाखों डॉलर का फायदा होगा। यूरोपियन यूनियन से बाहर होने के बाद से ब्रिटेन को अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए वैसे भी इतने बड़े निवेशक की दरकार थी। चीन से लंदन तक का रेलवे ट्रैक सात देशों की अर्थव्यवस्था को आपस में जोड़ेगा। इसके साथ ही लंदन यूरोप का 15वां ऐसा शहर बन गया है, जिससे चीन का ट्रेन के जरिये संपर्क हुआ। इससे पहले यह ट्रेन लंदन के लिए 1 जनवरी 2017 को चीन से चली थी, जो 18 दिनों में लंदन पहुंची। फिलहाल चीन और लंदन समुद्री रास्ते के जरिए एक-दूसरे को सामान भेजते हैं, जिसमें दो गुना समय के साथ-साथ पैसा भी ज्यादा लगता है।

निर्यात बढ़ाने के लिए चीन को है इसकी दरकार

चीन ने अपने रेलमार्ग का इतना अधिक विस्तार कर लिया है कि 2011 से ही वह यूरोप के कई देशों को ट्रेन के जरिए सामान भेज रहा है। सामानों को निर्यात करने की उसकी बहुत बड़ी ताकत ट्रेन ही है। अब लंदन तक अपनी ट्रेनों की पहुंच बनाकर एक बार फिर उसने अपनी मंशा जाहिर कर दी है। यूरोप और चीन के बीच 2016 में 40 हजार कंटेनर सामान का आयात-निर्यात हुआ था। चीन ने 2020 तक इसे एक लाख कंटेनर करने का लक्ष्य रखा है, जो ट्रेन से ही पूरा होगा। दरअसल पिछले कुछ सालों में चीन का निर्यात घटा है। साल 2015 में चीन का निर्यात घटकर 2.27 ट्रिलियन डॉलर का रह गया था। 2014 में यह 2.34 ट्रिलियन डॉलर था. वहीं 2015 में चीन की आर्थिक वृद्धि दर 7.0 फीसदी से घटकर 6.5 फीसदी रह गई थी। यदि यही रफ्तार कुछ और समय तक रहती तो चीन की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगता, लेकिन सिल्क रूट के बहाने चीन ने न सिर्फ लंदन तक अपनी मालगाड़ी पहुंचाई, बल्कि OBOR के जरिए विश्व के कई बड़े देशों को अपने साथ जोड़ लिया।

सात देशों की अर्थव्यवस्था से जुड़ेगा चीन

हाल ही में 29 अप्रैल को 12 हजार किलोमीटर लंबा फासला तय कर पहुंची अपनी ट्रेन का चीन ने शाही अंदाज में खैरमकदम किया। दुनिया के दूसरे सबसे लंबे ट्रेन रूट पर लंदन से चली ईस्ट विंड मालगाड़ी 20 दिनों में पूर्वी चीन के यिवू शहर पहुंची. 30 डिब्‍बों वाली ट्रेन में व्हिस्‍की, सॉफ्ट ड्रिंक, विटामिन और दवाइयां थीं. यह मालगाड़ी फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, पोलैंड, बेलारुस, रूस और कजाखस्‍तान से होते हुए चीन पहुंची। अभी चीन के यिवु शहर से स्पेन के मैड्रिड तक बना रेलवे रूट दुनिया का सबसे लंबा रेल रूट है। इसकी लंबाई करीब 13 हज़ार किलोमीटर है। इससे पहले चीन ने 18 नवंबर 2014 को 82 बोगियों वाली एक मालगाड़ी को 21 दिनों में तकरीबन दस हजार किलोमीटर दूर स्पेन की राजधानी मैड्रिड भेजा था। अक्टूबर 2013 में भी चीन ने 9820 किलोमीटर दूर जर्मनी के तटीय शहर हैम्बर्ग तक एक ट्रेन भेजी थी।

सीपीईसी में चीन ने लगाया पूरा जोर

OBOR का हिस्सा बनने जा रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) पर तकरीबन 48 अरब डॉलर का निवेश होगा। सीपीईसी की रूपरेखा चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने अप्रैल 2015 के पाकिस्तान दौरे से समय ही खींच ली थी। सीपेक पर भारत को मनाने के लिए चीन लगातार दिलासा दे रहा कि इसका कश्मीर मसले से कोई लेना-देना नहीं है। चीन का ये आश्वासन तब छलावा लगता है जब अगले ही पल उसका बयान आता है कि कश्मीर मामले पर अभी भी उसका रुख पुराना ही है। ग्वादर पोर्ट पर चीनी गतिविधि बढ़ने से पहले ही भारत एतराज जता चुका है।

दुनिया की 60 फीसदी लोगों पर राज करेगा चीन

चीन अपनी इस महत्वाकांक्षी परियोजना के जरिए दुनिया की 60 फीसदी आबादी यानी 4.4 अरब लोगों पर शिकंजा कसने की कोशिश कर रहा है। वह इनको रोजगार देने का लालच दे रहा है। उसने इस परियोजना को लेकर अपनी नीतियां भी स्पष्ट नहीं की है। वह कभी-भी अपने वादे से मुकर सकता है और इन देशों की प्राकृतिक संपदा का दोहन करके आर्थिक लाभ कमा सकता है। ऐसे में इसके भावी परिणाम बेहद गंभीर साबित हो सकते हैं। चीन का रिकॉर्ड रहा है कि वह बिना स्वार्थ के कोई काम नहीं उठाता है। खासकर विदेशी निवेश को लेकर उसका रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है।

दुनिया के 65 देशों की सरकार को भी लालच

चीन ने वन बेल्ट वन रोडपरियोजना को अंजाम देने के लिए न सिर्फ 65 देशों की जनता को बरगला रहा है, बल्कि वह इन देशों की सरकारों को भी लालच दे रहा है। चीनी मीडिया का कहना है कि इस परियोजना के इन देशों की सरकारों को 1.1 अरब डॉलर टैक्स मिलेगा। इससे इनकी आय में इजाफा होगा। साथ ही बेरोजगारी कम होगी। फिलहाल भारत के सभी पड़ोसी देश इसमें फंसते नजर आ रहे हैं। खासकर नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार इस चीनी जाल में फंसते नजर आ रहे हैं। पाकिस्तान तो पहले ही इसकी मंजूरी दे चुका है। भविष्य में चीन इन देशों में आर्थिक नियंत्रण करने के बाद सत्ता में भी दखल बढ़ाने में कामयाब हो सकेगा.

अलग-थलग पड़े PAK के लिए राहत

चीन और पाकिस्तान एक-दूसरे को अपने सबसे करीबी दोस्त मानते हैं। चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़ा रहता है। चाहे फिर आतंकवाद का मसला हो या फिर कूटनीतिक। आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंधित सूची में शामिल कराने की भारत की कोशिश पर चीन का अड़ंगा इस बात का उदाहरण हैं। ऐसे में यह परियोजना पाकिस्तान के लिए फायदेमंद साबित हो रही है। दुनिया में अलग-थलग पड़े पाकिस्तान अब चीन के रहमोकरम पर खुद को आगे बढ़ा पाएगा, जो भारत के लिए घातक है।

अमेरिका ने भी लिया यू-टर्न

‘वन बेल्ट, वन रूट’ परियोजना शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने से इनकार करने वाले अमेरिका ने भी यू-टर्न ले लिया है। उसने इस शिखर सम्मेलन में शामिल होने का फैसला लिया है।

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