जालना के शेडगांव गांव के एक ऑटोरिक्शा चालक के बेटे ‘अंसार शेख’ ने अपने पहले प्रयास में 21 साल की उम्र मेंआईएएस परीक्षा में सफलता प्राप्त कर 361वी रैंक हासिल किया। इसी के साथ वे सबसे कम उम्र में बनने वाले आईएस परीक्षा उत्तीर्ण होने का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया और कई युवाओं के प्रेरणा के स्रोत बन गए।

उनका गांव मराठवाड़ा में पड़ता है। उनके पिता ऑटो चलाते और मां, जो उनके पिता की दूसरी बीवी है, खेत मजदूर है। घर में ज्यादातर समय अनाज की किल्लत रहती थी, क्योंकि उनका पूरा इलाका सूखाग्रस्त है। शिक्षा की कमी के कारण गांव में लड़ाई-झगड़े और शराब पीने की आदत आम थी।

भाई छठी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़कर चाचा के गैराज में काम करने लगा था, लेकिन उन्हें पढ़ने का चस्का लग गया था। जब वो चौथी कक्षा में था, तब उनके रिश्तेदारों ने पिता पर उसकी पढ़ाई छुड़वा देने का दबाव डाला। एक दिन उनके पिता ने शिक्षक से स्कूल में मुलाकात की और कहा कि वह उनकी पढ़ाई बंद कराना चाहते हैं। शिक्षक का कहना था, आपका लड़का बहुत जहीन है। उसकी पढ़ाई पर खर्च करें। वह आप लोगों की जिंदगी बदल देगा। पिता के लिए यह नई बात थी। उसके बाद उन्होंने कभी उनके पढ़ाई के बारे में कुछ नहीं कहा।

बारहवीं में उन्हें 91 फीसदी अंक मिले, तो गांव के लोगों ने उन्हें अलग तरह से देखना शुरू किया। पुणे के नामचीन फर्गुसन कॉलेज में दाखिला लेना उनके लिए एक कठिन फैसला था। उनके पास चप्पल और दो जोड़ी कपड़े थे। मराठी माध्यम से पढ़ाई करने और पिछड़े माहौल में रहने के कारण वो अंग्रेजी से डरते थे। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। पिता अपनी आय का एक छोटा हिस्सा उन्हें भेजते थे, जबकि भाई हर महीने छह हजार रुपये, जो उनका वेतन था, उनके खाते में डाल देते थे। और इस तरह पुणे के फर्गुसन कॉलेज से उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातक किया।

फर्स्ट ईयर में ही प्रोफेसरों ने उन्हें यूपीएससी परीक्षा के बारे में बताया। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने यूपीएससी की कोचिंग के बारे में भी सोचा। पर उसकी फीस दे पाना उनके लिए आसान नहीं था। अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में कोचिंग संस्थान को बताया। उनसे बातचीत करने के बाद उन्होंने फीस में पचास फीसदी कटौती कर दी।

स्वयं के लिए रहने का आवास ढूंढते हुए उन्हें कटु अनुभव हुआ, जब उन्हें मुस्लिम होने के कारण कई जगह ना बोला गया बाद में उन्होंने अपने मित्र का नाम जो हिन्दू थे, उनके नाम का सहारा लिया। हालाँकि अब उनका कहना है अब नाम छुपाने की जरूरत नहीं लेकिन, उनके इस अनुभव ने धार्मिक समानता बढ़ाने की दिशा में काम करने के लिए जरूर प्रेरित कर दिया है।

दृढ़इच्छा से प्रेरित, उन्होंने अपनी यूपीएससी परीक्षाओं की तैयारी करते हुए लगातार तीन वर्षों तक 12-12 घंटे अपनी शिक्षा को दिया। अंसार शेख को सामाजिक भेदभाव के साथ साथ पारिवारिक तकलीफों का सामना करना पड़ा, जिसे उन्होंने चारित्रिक बल से हराया और प्रेरणादायी बन गए।

इंटरव्यू में उनसे मुस्लिम युवाओं के कट्टरवादी संगठनों से जुड़ने पर सवाल किया गया। एक ने उनसे पूछा कि वो शिया है या सुन्नी। उन्होंने कहा, सबसे पहले मैं भारतीय हूं। इस तरह 21 साल की उम्र में अपनी पहली ही कोशिश में मैं आईएएस हो गया।

Ansar Shaikh

“मेरा मानना है कि गरीबी और प्रतिकूल स्थिति आपके दृढ़ इरादे को नहीं बदल सकती। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि यूपीएससी में लाखों छात्रों से मुकाबला है। बल्कि मुकाबला सिर्फ अपने आप से है।”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here