2017, भारतीय विदेश नीति के बढ़ते प्रभुत्व की बानगी बना। इस वर्ष भारत जहां एक तरफ ‘उभरती हुई वैश्विक ताकत’ बना, तो वहीं, डोकलाम का मुद्दा भी सुलझा। कुलभूषण जाधव, आईसीजे में जस्टिस दलवीर भंडारी की जीत, एशिया-प्रशांत की भारत-प्रशांत क्षेत्र में तब्दीली, ‘नई अफगानिस्तान नीति’ में अहम भूमिका और वासेनर सदस्यता ने कूटनीतिक लिहाज़ से हमें और मज़बूत बनाया है।

अमेरिका ने कबूला भारत एक प्रमुख ‘वैश्विक शक्ति’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यभार संभालने के बाद वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उनसे पहली मुलाकात हुई जिसमें उन्होंने कहा था, “भारत के पास व्हाइट हाउस में एक ‘सच्चा दोस्त’ है।”

इस मुलाकात के ठीक 6 महीने बाद ट्रंप ने अपने सरकार की पहली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का ऐलान किया और इस अहम सामरिक दस्तावेज़ में अगर कोई देश अमेरिका के सबसे करीब दिखा तो वह था- भारत। अमेरिका ने जहां एक तरफ भारत को एक ‘उभरती हुई वैश्विक शक्ति’ माना तो वहींं उसने भारत के एक ‘अधिक मज़बूत सामरिक, रक्षा साझेदार और वैश्विक शक्ति’ के रूप में ‘उदय’ का स्वागत भी किया। गौरतलब है कि इससे पहले 8 वर्षों के बराक ओबामा राष्ट्रपति काल में तमाम करीबी के बावजूद भारत को दक्षिण एशिया में सुरक्षा का एक ‘क्षेत्रीय प्रदाता’ ही माना जाता था।

यह पहली बार था जब अमेरिका ने भारत को लिखित तौर पर न सिर्फ पहली बार एक वैश्विक शक्ति की मान्यता दी बल्कि तेज़ी से बदलते वैश्विक सामरिक परिदृश्य में जापान, ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से बनाए गए चतुष्कोणीय मंच पर भारत के साथ और संपर्क बढ़ाने में दिलचस्पी भी दिखाई।

आपसी सहमति से 73 दिनों बाद निकला डोकलाम विवाद का हल

वर्ष 2017 के मध्य में भारत के सिक्किम, भूटान और चीन के ट्राइजंक्शन पर सामरिक महत्व के एक क्षेत्र डोकलाम ने चीनी सैनिकों द्वारा सड़क निर्माण किए जाने पर एक बड़े विवाद की शक्ल ले ली। नतीज़तन भारतीय सशस्त्र बलों और चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के बीच एक-दो नहींं बल्कि 73 दिनों तक सैन्य सीमा गतिरोध बना रहा। मध्य जून, 2017 को शुरू हुए इस गतिरोध में भूटान की संप्रभुता के एक क्षेत्र में चीनी फौज द्वारा सड़क बनाए जाने पर भूटान ने तो पहले विरोध किया पर जब बात नहींं बनी तो भारत से मदद मांगी और भारत ने भूटान से हुए एक समझौते के तहत चीन को डोकलाम में सड़क बनाने से रोक दिया।

इस विवाद की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जहां एक तरफ चीन की सरकारी मीडिया शिन्हुआ ने भारत को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर भारत ने डोकलाम से अपने सैनिकों को वापस नहीं बुलाया तो उसे ‘शर्मिंदगी का सामना’ करना पड़ेगा। वहींं, चीनी रक्षा मंत्रालय ने कहा था, “अपने इलाके की रक्षा करने की चीनी सेना की क्षमता को लेकर भारत किसी भ्रम में ना रहे। पर्वत हिलाना आसान है लेकिन पीएलए को हिलाना मुश्किल।”

हालांकि चीन के इस धमकी भरे लहज़े के बीच भारत का रुख बिल्कुल साफ रहा और भारत, भूटान और चीन के साथ साझा वार्ता के बाद ही अपनी सेना हटाने की बात करता रहा। अंत में चीन को अपना रुख नरम करना पड़ा और सितम्बर माह में प्रस्तावित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से कुछेक दिन पहले 28 अगस्त 2017 को दोनों देशों में अपनी-अपनी सेनाएं पीछे हटाने की सहमति बन गई। यह भारत की एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी थी।

आईसीजे ने कुलभूषण जाधव की फांसी पर लगाई रोक

नीदरलैंड के हेग स्थित आईसीजे (इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस) ने एक हाई प्रोफाइल केस में फैसला सुनाते हुए पाकिस्तान में गिरफ्तार पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव को पाकिस्तानी सैन्य अदालत द्वारा जासूसी के आरोप में दी गई फांसी की सज़ा पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। यही नहींं आईसीजे ने पाकिस्तान द्वारा विएना संधि के तहत स्वीकारे गए अंतर्राष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन पर आदेश सुनाते हुए जाधव पर दिए गए सैन्य अदालत के फैसले को अमान्य घोषित करने के भी निर्देश दिए।

ये फैसला कथित दो धुर विरोधी ताकतों के बीच मनमुटाव के अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन के रूप में सामने आया तो वहींं इसमें मिली जीत से भारतीय विदेश नीति की चमक सारी दुनिया ने देखी। आईसीजे में भारत का पक्ष रख रहे वकील हरीश साल्वे ने अपनी दलील सिर्फ ₹1 की एवज़ में रखी और फैसला भारत के पक्ष में ला दिया।

अपनी इस जगजाहिर हार से खार खाए पाकिस्तान ने पहले तो आईसीजे के फैसले को मानने से ही इनकार कर दिया पर बाद में पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने एक अंग्रेज़ी अखबार से कहा कि आईसीजे का पूरा फैसला आने तक कुलभूषण जाधव को फांसी नहीं दी जाएगी, चाहे उसमें 2-3 साल ही क्यों न लग जाएं। अाखिरकार पाकिस्तान को अपने पुराने राग से उलट कुलभूषण से उसकी पत्नी और मां की मुलाकात करानी पड़ी।

ब्रिटिश उम्मीदवार को हराकर आईसीजे में दोबारा चुने गए जस्टिस भंडारी

भूमंडलीकृत दौर में आईसीजे (इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस) की अपनी एक अलग ही पहचान है। जब किन्ही दो देश के मामले आपसी बातचीत से नहीं निबटाए जा पाते तो देश आईसीजे की शरण लेते हैं उदाहरण के लिए भारत का कुलभूषण जाधव मामला। यहां किसी देश की मौजूदगी तमाम न्यायिक सिद्धांतों के बावजूद उस देश को एक मनौवैज्ञानिक और नीतिगत बढ़त देती है।

भारत को यह नीतिगत बढ़त तब हासिल हुई जब साल के आखिर में भारतीय प्रतिनिधि जस्टिस दलवीर भंडारी ने लगातार दूसरी बार न्यायाधीश चुनाव जीतकर आईसीजे में जज बनाए गए। उन्होंने आईसीजे बेंच की एक सीट के चुनाव में ब्रिटिश उम्मीदवार क्रिस्टोफर ग्रीनवुड को हराने के बाद अगले 9 वर्षों के लिए आईसीजे में हर भारतीय दावे के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त सुनिश्चित करा दी। भारतीय विदेश नीति की यह ऐतिहासिक सफलता इसलिए भी उल्लेखनीय हो जाती है क्योंकि आईसीजे के 71 सालों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब आईसीजे में कोई ब्रिटिश जज नहीं है। 1945 में स्थापित आईसीजे में 15 जज होते हैं जिन्हें 9 साल के लिए यूएन महासभा और यूएन सुरक्षा परिषद द्वारा चुना जाता है।

आईसीजे में भारत से मिली इस हार के कुछ दिनों बाद ही ब्रिटेन ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में अपने राजदूत मैथ्यू राइक्रॉफ्ट को बदल दिया। यह भारत की वर्ष 2017 वैश्विक मंचों पर बढ़ती कूटनीतिक दखल का एक बड़ा सबूत था।

हथियारों का निर्यात नियंत्रित करने वाली ‘वासेनर अरेंजमेंट’ का सदस्य बना भारत

परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह (एनएसजी) में सदस्यता का भारत पुराना दावेदार रहा है पर तमाम कूटनीतिक प्रयासों और जनमत संग्रह के बावजूद भारत को अब तक सफलता हाथ नहीं लगी। हालांकि भारत वर्ष 2017 के आखिर तक पारंपरिक हथियारों के निर्यात को नियंत्रित करने वाली संस्था ‘वासेनर अरेंजमेंट’ का 42वां सदस्य बन गया। वासेनर का सदस्य बनने के बाद जहां देश के रक्षा और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में तेज़ी आएगी तो वहीं उसकी और बेहतरी के लिए दूसरे सदस्य देशों के साथ होने वाले समझौतों में रूकावटें भी कम होंगी। यह इसलिए भी हमारे देश की एक बड़ी कूटनीतिक जीत हो जाती है क्योंकि हमारी एनएसजी में सदस्यता के लिए लगातार रूकावटें पैदा करने वाला चीन इस संगठन का सदस्य नहीं है। चीन ने भी इस संगठन में अपनी सदस्यता के लिए आवेदन कर रखा है लेकिन चीन के इतिहास को देखते हुए उसे सदस्यता की मंज़ूरी अभी तक नहीं मिली है।

भारत को वासेनार में सदस्यता से परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में शामिल होने के लिए सहयोगपूर्ण माहौल बनाने में मदद मिलेगी क्योंकि मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (एमटीसीआर) और वासेनार संगठन के अधिकतर देश एनएसजी के भी सदस्य हैं। गौरतलब है कि पिछले साल जून में ही भारत मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था में बतौर पूर्ण सदस्य जुड़ा था।

सामरिक महत्व का एशिया-प्रशांत क्षेत्र बना ‘भारत-प्रशांत’ क्षेत्र

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वर्ष 2017 के आखिर में पूर्व एशियाई देशों की यात्रा की और फिर आसियान सम्मेलन में हिस्सा लेने फिलीपींस की राजधानी मनीला पहुंचे। इस दौरान ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की। इस मुलाकात की सबसे खास बात अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा एशिया-प्रशांत (एशिया-पैसिफिक) की जगह भारत-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) शब्द का इस्तेमाल करना रहा। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा सम्मेलन में अपने संबोधन में प्रयोग में लाए गए इस शब्द का मतलब था कि विश्व की सबसे बड़ी ताकत और भारत का ‘एक सच्चा दोस्त’ अमेरिका, भारत को सामरिक महत्व के इस क्षेत्र में अहम कड़ी बनाना चाहता है।

अमेरिका की यह सोच जहां चीनी शक्ति को नियंत्रित करने की है तो वहीं भारत-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत पर मुहर भी है। अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर यह माना कि ‘एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी भारत-प्रशांत क्षेत्र’ से ही ‘दीर्घकालिक वैश्विक हित’ जुड़े हुए हैं। अमेरिका द्वारा भारत-अमेरिका, भारत-जापान और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के रणनीतिक चतुर्भुज देशों (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के बीच हुई बैठकों में भारत को एक अहम सीट देना हमारी विदेश नीति की बड़ी सफलता साबित हुई जो वैश्विक संबंधों की पुनर्रचना की तरफ भी इशारा करते हैं।

अमेरिका की ‘नई अफगानिस्तान नीति’ में भारत को खुली छूट

भारत एशिया के दो सबसे बड़े देशों में से एक है पर भौगोलिक संरचना और हिंद महासागर से नज़दीकी उसे दूसरे देशों से भी ज़्यादा महत्व का बनाती हैं। ऐसे में एक स्थिर एशियाई समीकरण के लिए भारत की स्थिरता तो ज़रूरी है ही साथ ही भारतीय स्थिरता के लिए भारत के पड़ोसी देशों की स्थिरता भी उतनी ही ज़रूरी है।

भारत की इसी चिंता पर अमेरिका ने भी अपनी सहमति तब दर्ज कराई जब उसने भारत को अपनी ‘नई अफगानिस्तान नीति’ में और बड़ी भूमिका निभाने की अपील की।

दरअसल, भारत के हिंसाग्रस्त पड़ोसी देश अफगानिस्तान से कई सामरिक हित जुड़े हुए हैं लेकिन पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को अफगानिस्तान में भारत का हस्तक्षेप बिलकुल स्वीकार नहीं है। हालांकि इस सबके बावजूद भारत ने अफगानिस्तान को और अफगानिस्तान ने भारत को हमेशा से अपना सच्चा दोस्त माना है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न सिर्फ अफगानिस्तान में भारत द्वारा चलाए जा रहे विकास परियोजनाओं के लिए भारत की तारीफ की बल्कि भारत से और आगे बढ़कर अफगानिस्तान में शांति बहाली के अमेरीकी प्रयासों में मदद करने की भी अपील की। पाकिस्तान के लाख कोशिशों के बावजूद अफगानिस्तान में भारत को मिली खुली छूट वर्ष 2017 में भारतीय विदेश नीति को मिली बड़ी सफलताओं में से एक है।

अमेरिका के बगैर भी टिका रहा पेरिस जलवायु समझौता

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते वर्ष नवंबर, 2016 में जब अपना पदभार ग्रहण किया तो सबसे पहले अमेरिका के पेरिस जलवायु समझौते से निकलने का बयान दे डाला। यह भारत के लिए एक मुश्किल बयान था क्योंकि यह समझौता भारत और कुछ चुनिंदा विकासशील देशों के दिमाग की ही उपज था और ऐसे में दुनिया के सबसे विकसित देश अमेरिका का इससे बाहर होना समझौते की प्रामाणिकता और निरंतरता पर एक सवालिया निशान था।

2017 के मध्य तक अमेरिका ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ का हवाला देते हुए पेरिस जलवायु समझौते से अपने पैर आधिकारिक तौर पर पीछे खींच लिए पर इस कदम की न सिर्फ पूरी दुनिया ने आलोचना की बल्कि सभी ने एक सुर में पेरिस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी जताई। दुनिया के एक सुर में पेरिस समझौते के समर्थन से भारत के सॉफ्ट पॉवर को एक बार फिर बल मिला और दुनिया के करीब सभी देशों ने अमेरिकी अगुवाई के बिना ही 21वीं शताब्दी मे वैश्विक तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने के दस्तावेज़ पर अपने हस्ताक्षर कर डाले। वर्तमान में अमेरिका और सीरिया को छोड़कर जहां संयुक्त राष्ट्र के सभी देश इस समझौते में शामिल हैं वहीं ‘धरती मां’ का भारतीय विचार अभी भी उतना ही जीवंत है।

ब्रिक्स के घोषणापत्र में पहली बार पाक स्थित आतंकी संगठनों का ज़िक्र

ब्रिक्स ब्रजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसी बड़ी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है जो दुनिया की आबादी में 43%, दुनिया की कुल जीडीपी में 30% तो वहीं, वैश्विक बाज़ार में करीब 17% की हिस्सेदारी रखता है। इसका सीधा मतलब यह है कि इसके सालाना मंच से कही जाने वाली बात पूरी दुनिया में सुनी जाती है। पर, इस बार के ब्रिक्स सम्मेलन में एक खास बात रही और वह यह कि ब्रिक्स में पहली बार किसी साझा घोषणापत्र में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों- लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद समेत तालिबान, आई.एस., अलकायदा व हक्कानी नेटवर्क की हिंसा का ज़िक्र किया गया और वह भी तब जब पाकिस्तान का करीबी दोस्त चीन इस सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा था।

भारत द्वारा किसी विशुद्ध आर्थिक विकास के मंच से ऐसे कड़े बयान जारी करवाने में सक्षम होना भारतीय विदेश नीति की एक बड़ी जीत है। इसकी पुष्टि इस बात से की जा सकती है कि पाकिस्तान ने इस पर अगले ही दिन प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उसकी धरती आतंकवादियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह नहीं है और वह ब्रिक्स सम्मेलन के साझा घोषणापत्र के इस बयान को सिरे से नकारता है।

आसियान के सभी राष्ट्राध्यक्ष भारतीय गणतंत्र दिवस पर बतौर अतिथि आमंत्रित

बतौर खबर, आसियान के सभी 10 देशों ने अगले वर्ष 2018 में गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत के प्रमुख अतिथि होने का आमंत्रण स्वीकार कर लिया है। थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस और ब्रुनेई इस दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संघ (आसियान) के सदस्य देश हैं जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने आसियान-भारत के संवाद वर्ष के 25 वर्ष पूरे होने पर बतौर प्रमुख अतिथि आमंत्रित किया था। यह पहला मौका होगा जब भारत के राष्ट्रीय समारोह मंच पर एक साथ इतने देश जुटेंगे। गौरतलब है कि भारतीय विदेश नीति का ‘मास्टर स्ट्रोक’ कहे जा रहे इस कदम से न सिर्फ काफी वक्त से भारत से कटे इस सामरिक महत्व के क्षेत्र में भारत की पकड़ मज़बूत होगी बल्कि बातों ही बातों में चीन को उसके ‘स्ट्रिंग अॉफ पर्ल्स’ थ्योरी का जवाब भी मिल जाएगा।

पीएम मोदी ने कहा, ‘‘हम अपने साझा मूल्यों और साझी नियति को लेकर भारत आसियान संबंधों की 25वीं वर्षगांठ संयुक्त रूप से मना रहे हैं। इस मौके पर कई गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा…मैं 25 जनवरी 2018 को भारत-आसियान सृमिति शिखर सम्मेलन में आप सभी के स्वागत को लेकर उत्सुक हूं।’’ पीएम मोदी ने कहा कि 125 करोड़ भारतीय 2018 के गणतंत्र दिवस में आसियान नेताओं के स्वागत की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

गौरतलब है कि पीएम मोदी इससे पहले अपने शपथ ग्रहण समारोह में भी सार्क देशों के सभी राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित कर चुके हैं जिसकी काफी सराहना हुई थी।

(साभार- Inshorts Medialabs Lvt. Ltd.)

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