जानें, अंतरिक्ष की लंबी और रोचक यात्रा– बैलगाड़ी पर रॉकेट ले जाने से लेकर मंगल तक का शानदार सफर

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उच्च-तकनीक वाले सबसे वजनी भू-स्थैतिक संचार उपग्रह, जी-सैट-19 को 05 जून को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर कक्षा में सफलतापूर्वक छोड़े जाने के बाद भारत ने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में एक बड़ी सफलता हासिल की है। इस उपग्रह को सबसे शक्तिशाली देसी रॉकेट जीएसएलवी मार्क-III द्वारा छोड़ा गया। जीएसएलवी मार्क-III 18 दिसंबर, 2014 को पहली प्रायोगिक उड़ान के साथ एक प्रोटोटाइप क्रू-कैप्सूल ले गया था। उपकक्षीय मिशन ने वैज्ञानिकों की यह समझने में मदद की कि यह यान वायुमंडल में कैसे काम करता है। साथ ही कैप्सूल का परीक्षण भी किया गया।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए इस वर्ष यह तीसरी उपलब्धि थी। इसने खुद के किफायती लेकिन प्रभावी क्रायोजनिक इंजन और अंतरिक्ष में 36,000 किलोमीटर पर कक्षा में 4 हजार किलोग्राम तक के भारी भरकम भू-स्थैतिक उपग्रहों को विकसित करने की देश की चाहत को पूरा किया।
इससे पहले 05 मई को भारत ने संचार सुविधा को बढ़ाने और पहला दक्षिण-एशिया उपग्रह (एसएएस) छोड़कर अपने 6 पड़ोसियों अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका को अनमोल तोहफा दिया था। 2,230 किलोग्राम के संचार अंतरिक्ष यान ने क्षेत्र में नए द्वार खोल दिए और भारत को अंतरिक्ष कूटनीति में अपने लिए अनोखा स्थान बनाने में मदद की।

इसरो द्वारा निर्मित और भारत द्वारा पूरी तरह वित्तपोषित, भू-स्थैतिक संचार उपग्रह-9 (जीसैट-9) अपने साथ जीएसएलवी-एफ09 रॉकेट ले गया। पृथ्वी की कक्षा में कार्टोसेट-2 श्रृंखला के उपग्रह सहित रिकॉर्ड-104 उपग्रहों के लिए पोलर सैटलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी सी-37) का इस्तेमाल करने के बाद फरवरी में अंतरिक्ष एजेंसी दुनियाभर में सुर्खियों में आ गयी थी। इस मास्टर स्ट्रोक ने भारत को छोटे उपग्रहों के लिए प्रक्षेपण सेवा प्रदात्ता के रूप में स्थापित कर दिया।
इन उपलब्धियों ने अंतरिक्ष की दौड़ में इसरो के लिए एक विशिष्ट स्थान बना दिया। केंद्र सरकार का इसरो से जुड़ाव अंतरिक्ष विभाग के लिए इस वर्ष के बजट में भी दिखाई दिया जिसमें भारी 23 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गयी। वर्षों से चल रहा भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम राष्ट्रीय अऩिवार्यता, और लोगों की सामाजिक और आर्थिक भलाई के लिए चल रहा है। भारत अपने उपग्रहों का इस्तेमाल विशेष रूप से विकास संबंधी उद्देश्यों – नागरिक (पृथ्वी की निगरानी, रिमोट सेंसिंग, संचार, मौसम विज्ञान) और रक्षा उद्देश्यों के लिए करता है। इसमें पर्यावरण अवकर्षण, भूमि का कटाव, मछली पकड़ने के संसाधनों पर निगरानी, बाढ़ और सूखे पर निगरानी, खनन, खनिज विज्ञान संबंधी संसाधनों का सर्वेक्षण और वन्य जन्तु पार्कों के लिए भूमि की कवरेज का पता लगाना शामिल है। अंतरिक्ष आधारित एप्लीकेशनों जैसे टेली-शिक्षा और टेली-मेडिसन ने इन आधारभूत जरूरतों तक ग्रामीण आबादी की पहुंच बढ़ा दी है।

पिछले तीन वर्षों के दौरान भारत अपने अंतरिक्ष मिशन में तेजी लाया है। 2016 की करीब दर्जनभर उपलब्धियों में दिसंबर में रिमोट सेंसिंग उपग्रह रिसोर्ससैट-2 के सफलतापूर्वक कार्य करने और जून में अकेले अंतरिक्ष उपग्रह में 20 उपग्रहों, 3 नेवीगेशन उपग्रहों और जीसैट-18 संचार उपग्रहों का रिकॉर्ड प्रक्षेपण शामिल है।
2015 में इसरो ने नवंबर में जीसैट-15 संचार उपग्रह और सितम्बर में मल्टी वेवलेंथ स्पेस ऑब्जरवेटर एस्ट्रोसेट छोड़ा। स्वदेश में विकसित उच्च प्रक्षेपक क्रायोजनिक रॉकेट इंजन का 800 सेकेंड के लिए जमीनी परीक्षण किया गया। इसके अलावा पीएसएलवी द्वारा जुलाई में पांच उपग्रह और मार्च में भारतीय क्षेत्रीय नेवीगेशन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) में चौथा उपग्रह आईआरएनएसएस-1डी छोड़ा गया।

2014 में संचार उपग्रह जीसैट-16 दिसंबर में छोड़ा गया और कक्षा में स्थापित किया गया। आने वाले वर्षों में इसरो के वैज्ञानिकों ने उपग्रह प्रक्षेपण की श्रृंखला तैयार कर रखी है। अगली प्रमुख परियोजना भारत का चंद्रमा पर दूसरा अन्वेषण मिशन, चंद्रयान-2 भेजना है। इसके चंद्रमा की धरती का खनिज विज्ञान संबंधी और तात्विक अध्ययन करने की उम्मीद है। इसे 2018 की पहली तिमाही में छोड़ने की तैयारी है। 10 वर्ष पूर्व चंद्रयान-1 सफलतापूर्वक छोड़ा गया था। इसरो की अगली बड़ी योजना सौर प्रभामंडल (कोरोनाग्राफ के साथ – एक टेलीस्कोप), फोटोस्फेयर, वर्णमण्डल (सूर्य की तीन प्रमुख बाहरी परतें) और सौर वायु का अध्ययन करने के लिए सूर्य में वैज्ञानिक मिशन भेजना है। श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-एक्सएल द्वारा इसे 2020 में छोड़ा जाना है। आदित्य-एल1 उपग्रह कक्षा से सूर्य का अध्ययन करेगा जो पृथ्वी से करीब 1.5 मिलियन किलोमीटर दूर है।

आदित्य-एल1 मिशन इस बात की जांच करेगा कि क्यों सौर चमक और सौर वायु पृथ्वी पर संचार नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक्स में बाधा पहुंचाती है। इसरो की उपग्रह से प्राप्त उन आंकड़ों का इस्तेमाल करने की योजना है ताकि वह गर्म हवा और चमक से होने वाले नुकसान से अपने उपग्रहों का बेहतर तरीके से बचाव कर सके।
जल्द ही भारत पहली बार शुक्र ग्रह का भी उपयोग करेगा और संभवतः 2021-2022 के दौरान दूसरे मंगल ओर्बिटर मिशन के साथ लाल ग्रह पर लौटेगा। उसकी मंगल की धरती पर रोबोट रखने की योजना है।

भारत की अंतरिक्ष यात्रा 53 वर्षों का सफर पूरा कर चुकी है। देश ने पहली बार 21 नवंबर 1963 को केरल में मछली पकड़ने वाले क्षेत्र थुंबा से अमेरिकी निर्मित दो-चरण वाला साउंडिंग रॉकेट (पहला रॉकेट) ‘नाइक-अपाचे’ का प्रक्षेपण कर अंतरिक्ष पर पहला हस्ताक्षर किया। चूंकि तिरुअनंतपुरम के बाहरी हिस्से स्थित थुंबा भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रक्षेपण स्टेशन पर कोई इमारत नहीं थी इसलिए बिशप के घर को निदेशक का कार्यालय बनाया गया, प्राचीन सेंट मैरी मेगडलीन चर्च की इमारत कंट्रोल रूम बनी और नंगी आंखों से धुआँ देखा गया। यहाँ तक की रॉकेट के कलपुर्जों और अंतरिक्ष उपकरणों को प्रक्षेपण स्थल पर बैलगाड़ी और साइकिल से ले जाया गया था।

इसके करीब 12 वर्ष बाद भारत ने अपने पहले प्रायोगिक उपग्रह आर्यभट्ट के साथ अंतरिक्ष युग में प्रवेश किया जिसे 1975 में रूसी रॉकेट पर रवाना किया गया। इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ. यू.आर.राव ने एक इंटरव्यू में बताया कि उन दिनों बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं था। जो कुछ उपलब्ध था हमने उसका इस्तेमाल किया। यहाँ तक की हमने बैंगलोर में एक शौचालय को डेटा प्राप्त करने के केंद्र में तब्दील कर दिया। थुंबा से सफर शुरू करने से लेकर भारत का अंतरिक्ष सफर काफी आगे निकल चुका है। भारत ने चंद्रमा संबंधी अनुसंधान शुरू करने, उपग्रह बनाने, अन्य के लिए भी, विदेशी उपग्रहों को ले जाने और मंगल तक पहुंचने में सफलता अर्जित कर दुनियाभर में अपनी पहचान बना ली है।

स्रोत-पीआईबी

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