UPSC 2017: कुलभूषण मामले को लेकर काफी चर्चा में रहा है अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, जानें- कैसे करता है काम

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Delivery of the Court’s Order on the request for the indication of new provisional measures by Costa Rica in the case concerning Certain Activities carried out by Nicaragua in the Border Area (Costa Rica v. Nicaragua). This public session took place on 22 November 2013 in the Great Hall of Justice at the Peace Palace in The Hague, under the presidency of Judge Peter Tomka. The Court’s role is to settle, in accordance with international law, legal disputes submitted to it by States (its Judgments are final and binding) and to give advisory opinions on legal questions referred to it by authorized UN organs and agencies. Its official languages are English and French. ICJ news and archives can be accessed via www.icj-cij.org Lecture de l’ordonnance de la Cour sur la demande en indication de nouvelles mesures conservatoires déposée par le Costa Rica à la CIJ en l’affaire relative à Certaines activités menées par le Nicaragua dans la région frontalière (Costa Rica c. Nicaragua). Cette séance publique s’est déroulée le 22 novembre 2013 dans la grande salle de justice du Palais de la Paix, à La Haye, sous la présidence de M. Peter Tomka. La Cour est le seul des six organes principaux de l’ONU à ne pas avoir son siège à New York. Sa mission est de régler, conformément au droit international, les différends d’ordre juridique soumis par les Etats (ses arrêts sont sans appel et obligatoires pour les Parties) et de donner des avis consultatifs sur les questions juridiques que lui posent les organes et les institutions de l’ONU autorisés à le faire. Pour en savoir plus: www.icj-cij.org

भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान में फांसी की सजा सुनाए जाने के मामले में भारत ने इंटनरेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस का दरवाज़ा खटखटाया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गोपाल बागले के अनुसार इस अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने भारत सरकार के अनुरोध पर कदम उठाए हैं। लेकिन आखिर ये अंतरराष्ट्रीय न्यायालय काम कैसे करता है और इसके अधिकार क्या हैं?

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) संयुक्त राष्ट्र (यूएन) का प्रमुख न्यायिक अंग है। यह संयुक्त राष्ट्र के चार्टर द्वारा जून 1945 में स्थापित किया गया था और इसने अप्रैल 1946 में काम करना शुरू किया था। न्यायालय का मुख्यालय हेग (नीदरलैंड) में शांति पैलेस में है। यह न्यायालय संयुक्त राष्ट्र के छः प्रमुख अंगों में से, एकमात्र ऐसा अंग है जो कि न्यूयॉर्क (संयुक्त राज्य अमेरिका) में स्थित नहीं है। इसका अधिवेशन छट्टियों को छोड़कर हमेशा चालू रहता है। न्यायालय के प्रशासनिक व्यय का भार संयुक्त राष्ट्र संघ उठाता है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में कितने न्यायधीश हैं-

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में 15 न्यायधीश हैं, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद द्वारा नौ साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं और इनको दुबारा भी चुना जा सकता है, हर तीसरे साल इन 15 न्यायधीशों में से पांच दुबारा चुने जा सकते है।  न्यायधीशों की नियुक्ति के संबंध में मुख्य शर्त यह होती है कि दो न्यायधीश एक देश से नहीं चुने जा सकते हैं। भारतीय जज के तौर पर यहां दलवीर भंडारी हैं, इनका कार्यकाल 2018 तक का है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्याय क्षेत्र- 

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की मदद इसके एक प्रशासनिक अंग “रजिस्ट्री” द्वारा की जाती है। न्यायालय का काम कानूनी विवादों का निपटारा करना और अधिकृत संयुक्त राष्ट्र के अंगों और विशेष एजेंसियों द्वारा उठाए कानूनी प्रश्नों पर राय देना है।  यानी इसके दो ख़ास कर्तव्य हैं: अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार यह कानूनी विवादों पर निर्णय लेता है, दो पक्षों के बीच विवाद पर फैसले सुनाता है और संयुक्त राष्ट्र की इकाइयों के अनुरोध पर राय देता है। इसकी आधिकारिक भाषा अंग्रेजी और फ्रेंच हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 93 में बताया गया है कि संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य इस न्यायालय से न्याय पाने का हक़ रखते हैं। हालांकि जो देश संयुक्त राष्ट्र के सदस्य नही हैं वे भी इस न्यायालय में न्याय पाने के लिये अपील कर सकते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय कैसे काम करता है

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को अपनी मर्जी के हिसाब से नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है। न्यायालय की न्यायिक प्रक्रिया, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय नियमावली,1978 के अनुसार चलती है जिसे 29 सितंबर 2005 को संशोधित किया गया था।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में किसी देश का कोई स्थायी प्रतिनिधि नहीं होता है- देश सामान्यतया अपने विदेश मंत्री के माध्यम से या नीदरलैंड में अपने राजदूत के माध्यम से रजिस्ट्रार से संपर्क करते हैं जो कि उन्हें कोर्ट में एक एजेंट के माध्यम से प्रतिनिधित्व प्रदान करता है। आवेदक को केस दर्ज करवाने से पहले न्यायालय के अधिकार क्षेत्र और अपने दावे के आधार पर एक लिखित आवेदन देना पड़ता है। प्रतिवादी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करता है और मामले की योग्यता के आधार पर अपना लिखित उत्तर दर्ज करवाता है।

इस न्यायालय में मामलों की सुनवाई सार्वजनिक रूप से तब तक होती है जब तक न्यायालय का आदेश अन्यथा न हो अर्थात यदि न्यायालय चाहे तो किसी मामले की सुनवाई बंद अदालत में भी कर सकता  है। सभी प्रश्नों का निर्णय न्यायाधीशों के बहुमत से होता है। सभापति को निर्णायक मत देने का अधिकार है। न्यायालय का निर्णय अंतिम होता है, उसकी अपील नहीं हो सकती किंतु कुछ मामलों में पुनर्विचार हो सकता है।

अभी हाल ही अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में भारत की ओर से दायर कुलभूषण यादव के मामले की सुनवाई हुई थी जिसमे अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने पाकिस्तान सरकार को आदेश दिया कि कुलभूषण को तब तक फांसी ना दी जाये जब तक कि सभी विकल्पों पर विचार ना कर लिया जाये।

इस प्रकार हमने पढ़ा कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की कार्यप्रणाली काफी जटिल प्रकृति की है जिसमे न्याय पाने के लिए बहुत लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जटिल न्यायिक प्रक्रिया होने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय विश्व में कई देशों के बीच पेचीदा मामलों को सुलझाकर शांति स्थापित करा चुका है, शायद यही कारण है कि इसके मुख्यालय का नाम ‘शांति भवन’ रखा गया है।

क्या है वियना संधि, जिसके तहत भारत ने उठाया आईसीजे में जाधव का मामला?
 
आजाद और संप्रभु देशों के बीच आपसी राजनयिक संबंधों को लेकर सबसे पहले 1961 में वियना कन्वेंशन हुआ। इसके तहत एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय संधि का प्रावधान किया गया जिसमें राजनियकों को विशेष अधिकार दिए गए। इसके आधार पर ही राजनियकों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनों का प्रावधान किया गया। इस संधि के तहत मेजबान देश अपने यहां रहने वाले दूसरे देशों के राजनियकों को खास दर्जा देता है। इस संधि का ड्राफ्ट इंटरनेशनल लॉ कमीशन ने तैयार किया था और 1964 में यह संधि लागू हुआ। फरवरी 2017 में इस संधि पर कुल 191 देशों दस्तखत कर चुके थे। इस संधि के तहत कुल 54 आर्टिकल हैं।
 
इस संधि के प्रमुख प्रावधानों के तहत कोई भी देश दूसरे देश के राजनियकों को किसी भी कानूनी मामले में गिरफ्तार नहीं कर सकता है। साथ ही राजनयिक के ऊपर मेजबान देश में किसी तरह का कस्टम टैक्स नहीं लगेगा। इंटरनेशनल कोर्ट में इटली के नौसेना के अफसरों को भारत द्वारा गिरफ्तार किए जाने का मामला इसी संधि के तहत चला था।
इसके दो साल बाद 1963 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसी संधि से मिलती जुलती एक और संधि का प्रावधान किया। इस संधि कोन‘वियना कन्वेंशन ऑन कांसुलर रिलेशंस’ के नाम से जाना जाता है। भारत ने आईसीजे में इसी जाधव का मामला इसी संधि के तहत उठाया है. इस संधि पर अभी तक 179 देश सहमत हो चुके हैं। इस संधि के तहत कुल 79 आर्टिकल हैं। इस संधि के आर्टिकल 31 के तहत मेजबान देश दूतावास में नहीं घुस सकता है और उसे दूतावास के सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठानी है। इसके आर्टिकल 36 के तहत अगर किसी विदेशी नागरिक को कोई देश अपनी सीमा के भीतर गिरफ्तार करता है तो संबंधित देश के दूतावास को बिना किसी देरी के तुरंत इसकी सूचना देनी पड़ेगी। गिरफ्तार किए गए विदेशी नागरिक के आग्रह पर पुलिस को संबंधित दूतावास या राजनयिक को फैक्स करके इसकी सूचना भी देनी पड़ेगी। इस फैक्स में पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति का नाम, गिरफ्तारी की जगह और गिरफ्तारी की वजह भी बतानी होगी। यानी गिरफ्तार विदेशी नागरिक को राजनयिक पहुंच देनी होगी। भारत ने आईसीजे में इसी आर्टिकल 36 के प्रावधानों का हवाला देते हुए जाधव का मामला उठाया है।
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया है कि चार कारणों से भारत सरकार ने कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है.
  • पहला कारण था पाकिस्तान के ज़रिए काउंसलर सेवा मुहैया कराने से इंकार करना
  • दूसरा कारण कुलभूषण जाधव से जुड़े क़ानूनी दस्तावेज़ की कॉपी देने से पाकिस्तान सरकार का इंकार करना है
  • तीसरे कारण है जाधव की माँ की अपील पर पाकिस्तान की ख़ामोशी
  • चौथा कारण रहा कुलभूषण जाधव के परिवार वालों को वीज़ा देने से पाकिस्तान का इंकार करना
 
फिर पाकिस्तान क्यों नहीं दे रहा जाधव को राजनयिक पहुंच-
 
इस संधि में यह भी प्रावधान है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में जैसे जासूसी या आतंकवाद आदि में गिरफ्तार विदेशी नागरिक को राजनयिक पहुंच नहीं भी दी जा सकती है। खासकर तब जब दो देशों ने इस मसले पर कोई आपसी समझौता कर रखा हो। भारत और पाकिस्तान के बीच 2008 में इसी तरह का एक समझौता हुआ था जिसका जाधव मामले में पाकिस्तान बार-बार हवाला दे रहा है। इसी समझौते का बहाना बनाकर पाकिस्तान ने जाधव को राजनयिक पहुंच देने से इनकार कर रहा है।

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