जस्टिस कर्णन केस: इतिहास में पहली बार न्यायपालिका आमने-सामने, जानें, इस टकराव के संवैधानिक पहलू…

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कलकत्ता उच्च न्यायालय के जज सी.एस कर्णन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट की अवमानना के लिए कार्यवाही शुरू की है। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के किसी वर्तमान जज पर यह कार्यवाही की है। कोर्ट ने उनके खिलाफ अवमानना मामले में पेश ना होने पर ज़मानती वारंट जारी करते हुए उन्हें जूडिशल और ऐडमिनिस्ट्रेटिव काम से भी रोक दिया है। इसके बाद करनन ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर सहित सुप्रीम कोर्ट के 7 न्यायाधीशों के खिलाफ सीबीआई जांच के आदेश दे दिए। जाहिर है इन सबके जिम्मेदार कर्णन खुद हैं क्योंकि उन्होंने बीते 23 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुप्रीम कोर्ट एवं विभिन्न हाई कोर्टों के 20 जजों की सूची भेजी, जिन्हें उन्होंने भ्रष्ट बताते हुए इनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 8 फरवरी को कर्णन के खिलाफ नोटिस जारी किया करते हुए पूछा था कि उनके इस पत्र को कोर्ट की अवमानना क्यों न माना जाए। हालांकि जब वह मद्रास हाई कोर्ट में जज थे, तब उन्होंने अपने तबादले पर खुद ही रोक लगा दी थी। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट को उन्हें किसी प्रकार के न्यायिक आदेश जारी करने से रोकना पड़ा था। उसके कुछ महीनों बाद जस्टिस कर्णन ने कलकत्ता हाई कोर्ट में ज्वाइन किया, लेकिन तब जबकि राष्ट्रपति ने इसकी समयसीमा तय की। न्यायपालिका के मामले को बाहर कर्णन खुद ले गए हैं और ऐसे में न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न होने से इंकार नहीं किया जा सकता।

जस्टिस कर्णन शुरुआत से ही कॉलेजियम पर आरोप लगाते रहे हैं कि यहां दलित विरोधी नीति अपनाई जाती है। वे 2011 से पूर्व और मौजूदा जजों पर आरोप लगाते आ रहे हैं कि उनके दलित होने की वजह से उन्हें दूसरे जजों द्वारा प्रताड़ित किया जाता रहा है। 2016 में जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा उनके कोलकाता हाईकोर्ट में ट्रांसफर किए जाने के आदेश पर कहा था कि उन्हें दुख है कि वह भारत में पैदा हुए हैं और वह ऐसे देश में जाना चाहते हैं जहां जातिवाद न हो।

भारतीय संविधान में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के तहत विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकारक्षेत्र को अलग कर संतुलन पर जोर दिया गया है। इसके अनुसार विधायिका का काम कानून बनाना, कार्यपालिका का काम विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करना और न्यायपालिका का काम विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों के संविधान सम्मत होने की जांच करना है। ऐसा माना जाता है कि लोकतंत्र में अगर इन तीनों स्तंभों के बीच मधुर संबंध स्थापित हो जाता है तो वह राष्ट्र को खतरनाक स्थिति की तरफ भी ले जा सकती है। एक सफल लोकतंत्र की निशानी यही है कि संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए तीनों स्तंभ एक-दूसरे से मिलकर काम करें जिसमें विधायिका सबसे सक्रिय भूमिका निभाए और न्यायपालिका उसका मार्गदर्शन करे।

शुरुआत में न्यायपालिका ने विधायिका और कार्यपालिका के मामलों में हस्तक्षेप करने में विश्वास नहीं किया लेकिन हाल के दिनों में न्यायपालिका ने लगातार ऐसे निर्णय दिए हैं जिसने न्यायालयों की भूमिका को बहस का विषय बना दिया है। यही नहीं वर्तमान समय में विधायिका को लगता है कि न्यायपालिका सिर्फ सरकार की आलोचना कर रही है तो दूसरी तरफ न्यायपालिका सरकार के रोजमर्रा के कामों में दखल देखर अपनी सर्वोच्चता साबित करने में लगी है। एक तरफ जहां कई सार्वजनिक मौकों पर केंद्रीय मंत्रियों ने अदालत से लक्ष्मण रेखा खींचने और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश न करने की बात कही है वहीं न्यायपालिका भी कई बार कह चुकी है कि सरकार न्यायपालिका का नाश करने पर तुली है और बेहतर है कि अदालतों में ताले लगा दिए जाएं और लोगों को न्याय देना बंद कर दिया जाए। वहीं न्यायालय ने जजों की बहाली के लिए एक राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन को लेकर सरकार के फैसले को यह कहते हुए उसे खारिज कर दिया था कि आयोग में मंत्रियों के शामिल होने से न्यायपालिका की निष्पक्षता पर आंच आने का अंदेशा है। 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका के शीर्ष स्तर पर नियुक्तियों और जजों के तबादले का काम पूरी तरह से अपने हाथ में ले लिया और सरकार की इसमें भूमिका सिर्फ औपचारिकता भर रह गई।

गौरतलब है कि 1950 से 1973 तक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही प्रमुख न्यायाधीश बनाया जाता था लेकिन इस व्यवस्था का हनन 1973 में हुआ जब प्रमुख न्यायाधीश सिकरी जे की सेवानिवृत्ति के बाद ए.एन राय को तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों से ऊपर प्रमुख न्यायाधीश बनाया गया। राजनीतिज्ञ विशेषज्ञों का मानना है कि उस वक्त न्यायिक सक्रियता अधिक नहीं थी और यही वजह थी कि राय ने इंदिरा गांधी के आपातकाल के फैसले का भी न्यायिक पुनरावलोकन भी नहीं किया। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि उस समय विधायिका हावी थी और न्यायपालिका को अपने नियंत्रण में रखना चाहती थी। यही नहीं 1977 में दोबारा एम.यू. बेग को वरिष्ठतम व्यक्ति के ऊपर प्रमुख न्यायाधीश बना दिया गया। हालांकि सरकार के इस निर्णय की स्वतंत्रता को कोर्ट ने 1993 में कम किया और कहा कि वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही प्रमुख न्यायाधीश बनाया जाना चाहिए।

हालांकि न्यायालय ने प्रमुख न्यायाधीश के नियुक्ति के मामले में 1982 में कहा कि न्यायलय सरकार से परामर्श ले सकती है लेकिन परामर्श का मतलब सहमति नहीं वरन विचारों का आदान प्रदान है। वहीं 1993 में न्यायलय ने अपने फैसले को बदलते हुए कहा कि परामर्श का मतलब सहमति प्रकट करना है और राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायधीश द्वारा दी गई सलाह मानने की बाध्यता होगी लेकिन मुख्य न्यायाधीश यह सलाह अपने दो वरिष्ठतम सहयोगियों से विचार विमर्श करने के बाद देगा। इसी तरह तीसरे मामले में 1998 में न्यायालय ने कहा कि केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश का एकल मत ही परामर्श प्रक्रिया को पूरण नहीं करता। उसे वरिष्ठतम न्यायाधीशों से सलाह करनी चाहिए इनमें से अगर 2 का मत भी पक्ष में नहीं है तो वह नियुक्ति के लिए सिफारिश नहीं भेज सकता और बिना अन्य न्यायाधीशों की सलाह के भेजी गई सिफारिशों को मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं है।

हाल के दिनों में न्यायपालिका के रुख को देखते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली को यहां तक कहना पड़ा कि कोर्ट कार्यपालिका का विकल्प नहीं हो सकती और कोर्ट उसकी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकती। साफ है कि अदालत और सरकार के कामकाज के दायरे अलग हैं और दोनों को अपनी लक्ष्मणरेखा खींचनी होगी। इसके अलावा उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन खत्म करने के फैसले से भी सुप्रीम कोर्ट और केंद्र में टकराव देखने को मिला। दिल्ली में डीज़ल गाड़ियों पर बैन लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी सरकार निराश है और ताज़ा मामला मेडिकल एंट्रेंस को लेकर एनईईटी का है।

अगर अतीत में जाएं तो वर्ष 1951 में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भूमि सुधारों की शुरुआत की थी तब नौवीं अनुसूची को संविधान में जोड़ा गया था ताकि इन सुधारों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सके लेकिन इसके बाद नौंवी अनुसूची में कई ऐसे मुद्दे जोड़े गए जिस पर सरकार अदालती फैसले का सामना करने से बचना चाहती थी। संसद को सर्वोच्च दिखाने की कोशिश सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने की थी। लेकिन 1972 में सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की अब तक की सबसे बड़ी संविधान पीठ ने केशवानंद भारती मामले में अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि भारत में संसद नहीं बल्कि संविधान सर्वोच्च है और इसके लिए संविधान के मौलिक ढांचे का सिद्धांत भी पारित किया। इस सिद्धांत के तहत कहा गया कि संसद ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती है जो संविधान के मौलिक ढांचे को प्रभावित करे। न्यायालय ने कहा है कि 24 अप्रैल 1973 के बाद जो भी कानून नौंवी अनुसूची में रखे गए हैं उनकी वैधता को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

जहां न्यायपालिका ने अपनी समीक्षा की शक्ति से कई बार संसदीय निर्णयों को प्रभावित किया तो दूसरी ओर संसद ने संविधान संशोधन कर न्यायालय के निर्णयों को शून्य कर दिया। उदाहरणस्वरूप गोलकनाथ बनाम पंजाब विवाद, केशवानंद भारती बनाम केरल, बाद में मेनमा बनाम भारत संघ व मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ आदि मामलों में यह स्थिति दिखती है। 1975-77 में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर कार्यपालिका द्वारा खुलकर सत्ता का दुरुपयोग तथा लोकतंत्र की अवमानना की गई परन्तु न्यायपालिका कुछ न कर सकी। 1986 में ‘मुस्लिम महिला संरक्षण कानून’ पारित कर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सरकार ने न्यायालय के ‘शाहबानो विवाद’ के प्रगतिशील निर्णय को शून्य कर दिया गया। अत: इस स्थिति को ‘न्यायिक शिथिलता’ के रूप में परिभाषित कर दिया गया किन्तु विगत कुछ वर्षों में स्थिति में परिवर्तन आया।

इसके अलावा न्यायालय ने यह भी कहा कि वह अनुच्छेद 13 के तहत समस्त निर्णयों की समीक्षा का अधिकार रखता है। यहां तक कि राष्ट्रपति के क्षमादान विशेषाधिकार भी न्यायिक समीक्षा के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं है। एस.आर.बोम्मई का मामला न्यायिक सक्रियता का एक हम उदाहरण है जिसके तहत न्यायालय ने राष्ट्रपति के तीन अध्यादेशों का निरस्त कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का काम संवैधानिक नियम-कायदों की रक्षा करना है, अगर कोई प्रभावित व्यक्ति जनहित याचिका लेकर या इंसाफ की गुहार लगाते हुए अदालत में जाए और अदालत उस पर फैसला करे, तो इसे विधायिका या कार्यपालिका में दखल नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन मौजूदा टकराव यह पैदा हो रहा है कि विधायिका और कार्यपालिका के रोजमर्रा के कामों पर भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले आ रहे हैं। सार रूप में जिस तरह सरकार न्यायपालिका का काम नहीं कर सकती उसी प्रकार न्यायपालिका को भी कार्यपालिका के लिए सोचना चाहिए। इसके लिए कार्यपालिका को यह भूलना होगा कि वह सर्वशक्तिमान है, वहीं न्यायपालिका को भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि वह मार्गदर्शक की भूमिका निभाने के लिए है न कि सरकार चलाने के लिए। लोकतंत्र के लिए आदर्श स्थिति वह है जिसमें सभी अपनी−अपनी मर्यादा का बिना राग−द्वेष के पालन करें। बेहतर यही है कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट में टकराव की स्थिति बनने ही नहीं दी जाए। इसी से लोकतांत्रिक व्यवस्था सुदृढ़ होगी।

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