यूं ही नहीं संविधान के 42वें संशोधन को कहा जाता है मिनी संविधान, जानिए इस संशोधन की खास बातें…

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42वां संविधान संसोधन में अब तक के संशोधनों में सबसे व्यापक संशोधन है। इस संविधान संशोधन में एक प्रकार से संपूर्ण संविधान का पुनरीक्षण किया गया। इसकी व्यापकता को दृष्टिगत करते हुए ही इसे मिनी संविधान कहा जाता है। संवैधानिक संशोधन में कुल 59 प्रावधान थे और यह भारतीय संविधान का सर्वाधिक व्यापक एवं विवादस्पद संवैधानिक संशोधन था। मुख्यतः यह संशोधन स्वर्ण सिंह आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए किया गया था।

इस संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य शब्दों के स्थान पर प्रभुत्व संपन्न समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य शब्द और राष्ट्र की एकता शब्दों के स्थान पर राष्ट्र की एकता और अखंडता शब्द स्थापित किए गए। इसके अतिरिक्त मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत, संघीय कार्यपालिका, संसद, संघीय न्यायपालिका, भारत का नियंत्रक महालेखा-परीक्षक, राज्य कार्यपालिका, राज्य विधान मंडल, उच्च न्यायालय, संघ तथा राज्यों के संबंध, लोक सेवा आपात उपबंध, संविधान संशोधन, सातवीं अनुसूची आदि से संबद्ध उपबंधों का संशोधन किया गया। इस अधिनियम द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया। हालांकि 1978 में सत्ता में आने के ाद तत्कालीन जनता सरकार ने इस संशोधन के कई प्रावधानों को 44 वें संविधान संशोधन के जरिए रद्द कर दिया।

तत्कालीन शासक वर्ग के द्वारा इस संवैधानिक संशोधन के चाहे जो भी लक्ष्य और उद्देश्य बतलाए गए हो, वस्तुतः इसका सर्वप्रमुख उद्देश्य प्रधानमंत्री एवं कार्यपालिका के हाथ में अधिकाधिक शक्ति का सकेन्द्रण था।

42वां संशोधन (1976) की प्रमुख बातें: इसके द्वारा संविधान में व्यापक परिवर्तन लाए गए, जिनमें से मुख्य निम्लिखित थे।

संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ ‘धर्मनिरपेक्ष’ एवं ‘एकता और अखंडता’ आदि शब्द जोड़े गए।

-सभी नीति निर्देशक सिद्धांतो को मूल अधिकारों पर सर्वोच्चता सुनिश्चित की गई।

– इसके अंतर्गत संविधान में दस मौलिक कर्तव्यों को अनुच्छेद 51(क), (भाग-iv क) के अंतर्गत जोड़ा गया।

-इसके द्वारा संविधान संशोधन को को न्यायिक परीक्षण से मुक्त किया गया।

– 1971 की जनगणना के आदार पर 2001 तक विधान सभाओं एवं लोक सभा की सीटों की संख्या को स्थिर कर दिया गया।

– लोक सभा एवं विधान सभाओं की अवधि को पांच से छह वर्ष कर दिया गया।

– इसके द्वारा यह निर्धारित किया गया की किसी केंद्रीय कानून की वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय एवं राज्य के कानून की वैधता का उच्च न्यायालय परिक्षण करेगा। साथ ही, यह भी निर्धारित किया गया कि किसी संवैधानिक वैधता के प्रश्न पर पांच से अधिक न्यायधीशों की बेंच द्वारा दी तिहाई बहुमत से निर्णय दिया जाना चाहिए और यदि न्यायाधीशों की संख्या पांच तक हो तो निर्णय सर्वसम्मति से होना चाहिए।

-इसके द्वारा वन संपदा, शिक्षा, जनसंख्या- नियंत्रण आदि विषयों को राज्य सूचि से समवर्ती सूची के अंतर्गत कर दिया गया।

– इसके अंतर्गत निर्धारित किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद एवं उसके प्रमुख प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार कार्य करेगा।

– इसने संसद को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए कानून बनाने के अधिकार दिए एवं सर्वोच्चता स्थापित की।

-अखिल भारतीय विधिक सेवा के निर्माण की व्यवस्था

-प्रशासनिक अधिकरणों औप अन्य मामलों पर अधिकरणों की व्यवस्था

– न्यायािक समीक्षा औऱ रिट न्यायक्षेत्र में उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों की शक्ति में कटौती

-भारत के किसी एख भाग में राष्ट्रीय आपदा की घोषणा

-राज्य में राष्ट्रपति शासन के कार्यकाल में एक बार में 6 माह से 1 साल की बढ़ोतरी

– केंद्र को किसी राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिएसैन्य बल भेजने की शक्ति

– संसद और विधानमंडल में कोरम की आवश्यकता की समाप्ति

– संसद को यह निर्णय की शक्ति प्रदान की कि समय-समय पर अपने सदस्यों एवं समितियों के अधिकार एवं विशेषाधिकारों का निर्धारण करे।

– सिविल सेवक को दूसरे चरण पर जांच के उपरांत प्रतिवेदन के अधिकार को समाप्त कर अनुशासनात्मक कार्यवाही को छोटा किया गया।

(44 वें संविधान संशोधन के तहत 42 वें संविधान संशोधन के कुछ मामलों को रद्द किया गया)

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