NGT क्या है और यह कैसे काम करता है, NGT के बारे में इन तथ्यों को जरूर जानें…

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हाल में अपनी कुछ फैसलों की वजह से एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल काफी चर्चा में है। हालांकि एनजीटी उस समय भी चर्चा में था जब राजधानी दिल्ली में यमुना के किनारे आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर का वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल से हुआ था। गंगा सफाई का मुद्दा हो या दिल्ली में प्रदुषण का मामला, एनजीटी ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। आइए जानते हैं  एनजीटी के गठन का इतिहास और इसके काम करने का तरीका।

एनजीटी का गठन-

ग्लोबल वार्मिंग के वैश्विक चिंता के रूप में उभरने के साथ ही भारत का सर्वोच्च न्यायालय काफी पहले से पर्यावरण संबंधी कई पेचीदा मामलों के निपटारे के लिए एक विशेष पर्यावरण अदालत के गठन पर जोर देता रहा था। सुप्रीम कोर्ट के इन कोशिशों के बाद ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट, 2010 में भारतीय संसद में पेश हुआ जिसमें एक ऐसे ट्रिब्यूनल की बात की गई जो पर्यावरण के मुद्दों पर फैसला दे। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का गठन 18 अक्टूबर 2010 में किया गया। एनजीटी पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन से निपटने के लिए एक व्यापक अधिकार प्राप्त, भारत की पहली समर्पित अदालत है। यहां यह बताना जरूरी है कि न्यूजीलैण्ड और ऑस्ट्रेलिया के बाद, भारत उन कुछ ही देशों में से एक है जहां पर्यावरण से संबंधित एक विशेष अधिकरण की स्थापना की गई है।

जाहिर है यह न सिर्फ पर्यावरण लोकतंत्र को लागू करने की दिशा में एक बड़ा और ठोस कदम है बल्कि 1972 में रियो डि जिनेरियो में हुए पर्यावरण औैर विकास से संबंधित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में लिए गए निर्णय को भी पूरा करने की दिशा में एक कदम है। इस सम्मेलन में विभिन्न राष्ट्रों ने जिसमें भारत भी शामिल था, यह निर्णय लिया था कि न्यायिक और प्रशासनिक कार्यवाहियों से यदि पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, तो उसके उपचार और पीड़ित पक्षों को समुचित राहत और मुआवजा प्रदान किया जाए। यही नहीं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में भी में स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को जीवन के अधिकार के रूप में शामिल किया गया है।  इस अधिकरण में पर्यावरण पर होने वाले दीर्घकालीन प्रभावों को ध्यान में रखकर निर्णय लिये जा रहे हैं। इस अधिकरण के गठन के बाद से विभिन्न माननीय हाईकोर्ट में पर्यावरण से संबंधित मामले अब इस अधिकरण द्वारा निपटाए जा रहे हैं।

एनजीटी की मुख्य शाखा ने नई दिल्ली में 4 जुलाई 2011 से कार्य करना शुरू किया है, और यह अब तक 200 से अधिक पर्यावरण से संबंधित संवेदनशील मामलों की सुनवाई कर चुका है। भारत के दूरदराज के हिस्सों में भी इस अधिनियम की पहुंच बनाने की दृष्टि से इस अधिकरण की बेंच चेन्नई, भोपाल, पुणे और कोलकाता में स्थापित किए जाने का प्रावधान किया गया है, जिसमें से चेन्नई और भोपाल के सर्किट बेंच में मामलों की सुनवाई प्रारंभ हो चुकी है।

इस प्राधिकार को खासतौर पर ऐसे अधिकार दिए गए जिनके इस्तेमाल से न सिर्फ पर्यावरण से जुड़े विवादों को जल्द से जल्द सुलझाया जा सके बल्कि उपरी न्यायलयों का भार भी कम किया जा सके। इस प्रधिकरण के अंतर्गत जंगलों की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करना, प्राकृतिक स्त्रोतों का संरक्षण,  पर्यावरण से जुड़े कानूनी अधिकारों की रक्षा के साथ साथ किसी नागरिक के अधिकारों के हनन पर उन्हें आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना और भारतीय नागरिकों के स्वस्थ पर्यावरण मिलने के अधिकार जैसे मुद्दे आते हैं। इस ट्रिब्यूनल में किसी भी विवाद को 6 महीने के भीतर सुलझाने की कोशिश की जाती है।

अधिकरण की संरचना-

इस अधिकरण में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष हैं जो माननीय सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, या माननीय हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त चीफ जस्टिस स्तर के होते हैं। इसके अलावा इसमें दस या अधिकतम 20 की संख्या में न्यायिक और इसी संख्या में विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान है। अधिकरण के अध्यक्ष न्यायिक सदस्यों एवं विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाती है। इसके अलावा आवश्यकता पड़ने पर अधिकरण किसी खास मामले में विषय का ज्ञान और अनुभव रखने वाले विशेषज्ञों को भी आमंत्रित कर सकता है।

सजा का प्रावधान-

जहां तक सजा की बात है तो इस अधिकरण द्वारा जारी किसी आदेश का पालन नहीं करने पर तीन साल तक की जेल या 10 करोड़ तक का जुर्माना, या दोनों की सजा दी जा सकती है। अगर कोई व्यक्ति या संस्था इसके बाद भी उल्लंघन जारी रखता है, तो उसे प्रतिदिन पच्चीस हजार रुपए तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। यदि कोई कंपनी, अधिकरण के आदेशों का पालन करने में असफल रहती है, तो उसे 25 करोड़ रुपए तक का जुर्माना और उल्लंघन जारी रहने की दशा में प्रतिदिन एक लाख रुपए तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। इसके अलावा अगर कोई अपराध कंपनी द्वारा किया जाता है तो प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध होने के समय, कंपनी के कारोबार का संचालन करता है या उसके लिए उत्तरदायी है, दंडित किए जा सकेंगे। साथ ही वह कंपनी भी अपराध के दोषी होंगे और तदनुसार दंडित किए जा सकेंगे। अगर कोई अपराध सरकारी विभाग द्वारा किया जाता है, तो अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार विभाग के अध्यक्ष दोषी होंगे। इस अधिकरण के फैसले से असंतुष्ट होने की स्थिति में कोई भी व्यक्ति 90 दिनों के भीतर फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकता है, लेकिन 2014 में मद्रास हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि कुछ मुद्दों पर हाईकोर्ट भी एनजीटी के खिलाफ चुनौती को स्वीकार कर सकता है।

एनजीटी की उपलब्धियां-

एनजीटी ने समय-समय पर अपनी महत्ता को बखूबी तरीके से निभाया है। अवैध खनन हो या नदियों के जलप्रवाह की बात हो एनजीटी ने कई बार पर्यावरण के खिलाफ उठाए जाने वाले कदम पर रोक लगाने का फैसला किया। एनजीटी ने ही सरकार से दिल्ली से होकर उत्तर प्रदेश में बहने वाली यमुना नदी के 52 किलोमीटर तक के तटीय इलाक़े को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने के लिए कहा था। यही नहीं राजधानी दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण के चलते एनजीटी ने ही सुनिश्चित किया था कि 10 वर्ष से पुरानी सभी डीज़ल गाड़ियों के चलने पर रोक लगाई जाए।

हिमाचल प्रदेश में एनजीटी ने आदेश के जरिए कहा कि रोहतांग दर्रा जाने वाली सभी व्यवसायिक डीजल गाड़ियों से अधिक टैक्स वसूल कर उनकी संख्या घटाई जाए। ग्रेटर नोएडा समेत देश के कई औद्योगिक क्षेत्रों में वायु प्रदूषण फैलाने वाली कई फैक्ट्रियों पर कार्रवाई के निर्देश जारी कर एनजीटी ने प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में साकारात्मक पहल की थी। अप्रैल, 2014 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू के नेतृत्व वाली एक पीठ ने दिल्ली में एनजीटी के कदमों की सराहना करते हुए कहा था कि ये न्यायाधिकरण एक अहम सरकारी संस्था है जो आम जनता की भलाई करना चाह रही है। उन्हें हतोत्साहित करने के बजाए हमें उनकी मदद करनी चाहिए।

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