लोकसभा ने शुक्रवार को भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) को अधिक स्वायत्तता प्रदान करने वाले ‘आईआईएम विधेयक 2017’ को मंज़ूरी दे दी। इस मौके पर मानव संसाधन एवं विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बताया कि इस विधेयक में आईआईएम द्वारा डिग्री और पीएचडी की उपाधि प्रदान करने का भी प्रावधान है। बतौर जावड़ेकर, आईआईएम को केंद्र से चलाना ठीक नहीं है।

लोकसभा में विधेयक पर बहस के दौरान तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय ने कहा कि आईआईएम को स्वायत्तता प्रदान करना अच्छी पहल है। लेकिन इसके साथ ही इस बात पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि इन संस्थाओं में फीस के विषय से कैसे निपटा जाएगा। पहले ही इन संस्थाओं में फीस काफी अधिक है। अब इस विधेयक के अमल में आने की स्थिति में फीस से जुड़े विषय को कैसे व्यवहारिक बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि इनमें प्रतिभावान छात्र पढ़ते हैं, ऐसे में अधिक फीस होने पर उन्हें बैंकों से लोन लेना पड़ेगा। इस विषय पर ध्यान देने की जरूरत है।

कांग्रेस के शशि थरूर ने विधेयक का समर्थन किया और कहा कि अनुसूचित जाति जनजाति के सदस्यों को आरक्षण प्रदान करने के संबंध में यह विधेयक मौन है। उन्होंने कहा कि आईआईएम समेत उच्च शिक्षण संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के संस्थानों के समकक्ष लाने के लिए धन, फैकल्टी और सुविधाओं में निवेश की जरूरत है लेकिन सरकार ने अपने शिक्षा बजट में बेहद मामूली वृद्धि की है। उन्होंने कहा कि आईआईएम में निवेश की बहुत जरूरत है क्योंकि मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री ने खुद लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि आईआईएम में 26 फीसदी और आईआईटी में 30 फीसदी फैकल्टी के पद खाली पड़े हैं और विश्व के 100 सर्वोच्च प्रबंधन संस्थानों में देश के केवल तीन संस्थान ही जगह हासिल कर पाए हैं। थरूर ने कहा कि छह आईआईएम में 233 फैकल्टी में से अनुसूचित जाति के केवल दो लोग हैं जबकि अनुसूचित जनजाति से एक भी सदस्य नहीं है। बोर्ड में तीन महिला सदस्यों को शामिल करने के प्रावधान को उन्होंने शानदार विचार करार दिया लेकिन शिक्षण विभागों में आरक्षण पर विधेयक के मौन रहने पर सवाल उठाया।

बीजद के नागेन्द्र कुमार प्रधान ने कहा कि आईआईएम दुनिया के उत्कृष्ठ संस्थाओं में शामिल है। इन्हें स्वायत्तता मिलनी चाहिए। लेकिन इसके साथ इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि देश में गैर आईआईएम संस्थाओं से प्रति वर्ष पांच लाख छात्र पढ़कर निकलते हैं। एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि इनमें से बड़ी संख्या में युवाओं को 10 हजार रुपये तक ही वेतन मिल पाता है। उन्होंने कहा कि मैं सरकार से आग्रह करूंगा कि गुणवत्ता के इस विषय पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

सदन में बहस के दौरान उठाए गए फीस व आरक्षण के मुद्दों पर जावड़ेकर ने स्पष्ट किया कि सच्चे, ईमानदार और प्रतिभावान छात्र दाखिले से वंचित नहीं होंगे। साथ ही आईआईएम में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के रिक्त पदों को भरने के लिए भी विश्ष्टि निर्देश दिए गए हैं। जावडेकर ने कहा कि फीस को लेकर सदस्यों को चिंता करने की जरूरत नहीं है और जो भी छात्र गुणवत्ता के आधार पर दाखिला लेना चाहता है, उसके लिए फीस कोई मुद्दा नहीं होगी। इस दिशा में मेधा आधारित छात्रवृत्ति, सीखो और कमाओ ऋण योजना को आगे बढ़ाया जा रहा है। आरक्षण के मुद्दे पर जावड़ेकर ने कहा कि छात्रों के लिए आरक्षण है और अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के रिक्त पदों को भरने के लिए पिछले सप्ताह विशिष्ट निर्देश भी जारी किए गए हैं।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारतीय प्रबंध संस्थानों (आईआईएम) को केंद्र से संचालित करना अच्छी बात नहीं थी और इसीलिए उन्हें स्वायत्तता देने का फैसला किया गया। उन्होंने विधेयक के प्रावधानों का जिक्र करते हुए हालांकि बताया कि स्वायत्तता से इतर इन संस्थानों का भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा आडिट किया जाएगा और कैग की रिपोर्ट पर जरूरत महसूस होने पर संसद में चर्चा भी की जाएगी।

जावडेकर ने कहा कि यह केंद्र सरकार का ऐतिहासिक कदम है जिसके तहत हम अपने संस्थानों पर भरोसा जता रहे हैं। उन्होंने साथ ही बताया कि इस विधेयक के पास होने से ये संस्थान डिप्लोमा की बजाय डिग्री प्रदान कर सकेंगे और साथ ही फैलोशिप के स्थान पर उन्हें पीएचडी प्रदान करने का अधिकार मिल जाएगा। विधेयक के प्रावधानों का जिक्र करते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री ने बताया कि पहले सरकार ही इन संस्थानों के बोर्ड आफ डायरेक्टर का गठन करती थी लेकिन अब ये संस्थान स्वयं इस प्रकार के फैसले लेंगे और इसमें भी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बोर्ड में तीन महिला सदस्यों का होना अनिवार्य होगा।

उन्होंने कहा कि यह विधेयक आईआईएम को कितनी अधिक स्वायत्तता प्रदान करने जा रहा है , इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ‘अब मैं कौंसिल का चेयरमैन नहीं रहूंगा।’ उन्होंने कहा कि आईआईएम को  केंद्र  से चलाना अच्छी स्थिति नहीं है, हर चीज के लिए सरकार की अनुमति अब इन संस्थानों को नहीं लेनी पड़ेगी। जावडेकर ने कहा कि यह एख ऐतिहासिक बिल है और हम नए युग की ओर जा रहे हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्री ने कहा है कि उच्च शिक्षा वित्त पोषण एजेंसी के जरिए शोध व आधारभूत ढांचे को मजबूत बनाने के लिए धन जुटाने का लक्ष्य निार्धारित किया है। इसके तहत अगले तीन सालों में तीन अरब डालर का निवेश जुटाने का फैसला किया गया है। इस राशि से भारत में विश्व स्तरीय शोध सुविधाएं मुहैया कराया जाएंगी। इस बारे में पहला आवेदन इसी महीने मंजूर होगा। जावड़ेकर ने कहा कि तकनीकी शिक्षा गुणवत्ता बेहतरी कार्यक्रम के तहत वित्त पोषण का कार्यक्रम भी बनाया गया है। इस योजना में अभी जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, बिहार, राजस्थान, पूर्वोंत्तर के राज्य, अंडमान निकोबार द्वीप समूह शामिल होंगे। इसके अलावा उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए दुनिया भर के जाने माने शिक्षकों व विद्वानों को भी जोड़ने की पहल की गई है।

गौरतलब है कि देश में 20 प्रबंधन संस्थान हैं। लेेकन अभी तक ये किसी कानून के तहत संचािलत नहीं हैं। जिसके चलते इन्हें डिग्री देने का अिधकार नहीं था। आईआईएम अभी डिप्लोमा एवं सािर्टिफकेट ही प्रदान कर सकते हैं। विधेयक को राज्यसभा में पािरत होना है। इसके बाद इन संस्थानों को डिग्री देने का अिधकार मिल जाएगा।

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