भारत में राष्ट्रपति के निर्वाचन के बारे में क्यों है विवाद, क्यों देश में नहीं लग पाया है महाभियोग?

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भारतीय संविधान के अनुच्छेद (71) में यह उपबंध है कि राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बंधित सभी विवादों की जाँच सुप्रीम कोर्ट करेगा। जहाँ राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति का निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया जाता है वहाँ राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन में विनिश्चय की तारीख को या उससे पहले किए गए कार्य अवैध नहीं होंगे।

रिक्तियों की विद्यमानता

यदि राष्ट्रपति के निर्वाचन के निर्वाचकगण में रिक्तियाँ हैं तो ऐसी रिक्ति के आधार पर निर्वाचन को प्रश्नगत नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति के पद का निर्वाचन इस आधार पर नहीं टाला जा सकता कि कुछ विधान सभाओं का विघटन हो गया है और उनका निर्वाचन होना बाक़ी है। अनु.(62) के अनुसार ये आदेश है कि रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन राष्ट्रपति की अवधि की समाप्ति से पूर्व हो जाना चाहिए।

उत्तराधिकार का प्रावधान

राष्ट्रपति के उत्तराधिकार के बारे में व्यवस्था यह है कि उसके हटते ही उपराष्ट्रपति को कार्यवाहक राष्ट्रपति का पद प्राप्त होगा। मृत्यु, त्यागपत्र या महाभियोग के प्रस्ताव पास होने के कारण राष्ट्रपति का पद रिक्त होगा। संविधान में यह लिखित है कि राष्ट्रपति के हटाने के अगले छ: महीनों के अन्दर नए पदाधिकारी का चुनाव होगा, नया राष्ट्रपति पूरे पाँच वर्षों के लिए अपने पद पर आसीन होगा। मूल संविधान के अनुसार राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उप-राष्ट्रपति को देगा, परन्तु यह कहीं भी लिखित नहीं है कि उस स्थिति में क्या होगा यदि उप-राष्ट्रपति भी अपना त्यागपत्र देना चाहे। इस प्रकार की समस्या का सामना 1969 में करना पड़ा जब डॉ. जाकिर हुसैन के निधन के बाद वी.वी. गिरी को कार्यवाहक राष्ट्रपति का पद प्राप्त हुआ। परन्तु कुछ समय बाद उन्होने भी अपना त्यागपत्र देना चाहा। अब यह प्रश्न पैदा हो गया कि कार्यवाहक राष्ट्रपति की जगह पदभार कौन संभालेगा। इसलिए एक नया क़ानून (Discharge of Presidential Act) पास किया गया जिसमें कहा गया कि यदि राष्ट्रपति के हटने के बाद उप-राष्ट्रपति भी कार्यवाहक राष्ट्रपति राष्ट्रपति के पद से त्यागपत्र दे, तो सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान जज व उनकी अनुपस्थिति में वरिष्ठता के आधार पर न्यायालय का कोई अन्य जज कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा। इसी कारण वी.वी. गिरी के त्यागपत्र देने के बाद कुछ समय के लिए उस समय के प्रधान न्यायधीश एम. हिदायतुल्ला ने कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया।

 

राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया

संविधान के अनुच्छेद 61(1) में राष्ट्रपति का महाभियोग चलाने की प्रक्रिया दी गई हैं कि संविधान का अतिक्रमण करने, कदाचार या अक्षमता पर संसद राष्ट्रपति को 5 वर्ष के निर्धारित कार्यकाल से पहले महाभियोग की प्रणाली द्वारा पदमुक्त कर सकती है।

अमरीकी संविधान में राष्ट्रपति पर महाभियोग राजद्रोह, रिश्वत लेने या गंभीर अपराधों के लिए चलाया जा सकता है।

(i)    राष्ट्रपति के विरुद्ध आरोप संसद के किसी भी सदन में चलाया जा सकता है। महाभियोग का प्रस्ताव तभी मान्य होगा जबकि सदन की कुल सदस्य संख्या में से कम से कम दो-तिहाई उस प्रस्ताव का समर्थन करें। उपरोक्त प्रकिया से संपन्न उस संविधान के उल्लंघन के आरोप वाले संकल्प को वह सदन दूसरे सदन में पेश करेगा यानि जाँच के लिए भेजेगा। यानी लोकसभा में आरोप लगे तो राज्यसभा में और अगर राज्यसभा में आरोप लगे तो वह लोकसभा में ले जाएगा।

(ii)    एक सदन द्वारा राष्ट्रपति पर इस प्रकार आरोप लगाया जाता है तो दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाए गए आरोपों की जाँच करता है। जाँच के समय सदन एक न्यायालय के रूप में कार्य करता है। राष्ट्रपति को ऐसी जाँच में उपस्थित होने का तथा अपना प्रतिनिधित्व कराने का अधिकार होगा अर्थात राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कोई अधिवक्ता या अन्य व्यक्ति उपस्थित हो सकता है। राष्ट्रपति को पूर्ण अवसर दिया जाता है कि वह अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए जो कुछ कहना चाहे, कह सकते हैं। यदि जाँच के पश्चात् सदन दो-तिहाई बहुमत से संकल्प पारित करके यह घोषित कर देता है कि आरोप साबित हो गया तो ऐसे संकल्प का प्रभाव उसके पारित किए जाने की तारीख से राष्ट्रपति को उसके पद से हटना पड़ेगा।

महाभियोग की प्रक्रिया-

  • निष्कासन प्रस्ताव को 100 सदस्यों (लोकसभा के मामले में) या 50 सदस्यों (राज्यसभा के मामले में) द्वारा हस्ताक्षर करने के बाद अध्यक्ष/ सभापति को दिया जाना चाहिए।
  • अध्यक्ष/ सभापति इस प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
  • स्वीकार करने के बाद इस तीन सदस्यीय समिति (मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, प्रतिष्ठित न्यायवादी) के पास भेजा जाता है।
  • यदि समिति न्यायाधीश को दुर्व्यवहार का दोषी पाती है तो सदन इस प्रस्ताव पर विचार सकता है।
  • विशेष बहुमत से दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित कर इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।
  • अंत में राष्ट्रपति न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी कर देते हैं।

 

अमेरिका में सीनेट को महाभियोग पर विचार करने का अधिकार है। कांग्रेस को नहीं। इस विचार की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति करता है। राष्ट्रपति को हटाए जाने का संकल्प विचार में उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से पारित होता है।

देश में महाभियोग की कार्यवाही का पहला मामला सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी. रामास्वामी का था। उनके खिलाफ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन यह प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया था, क्योंकि सत्ताधारी कांग्रेस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने उस समय लोकसभा में न्यायमूर्ति रामास्वामी का बचाव किया था। इसके बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन देश के इतिहास में दूसरे ऐसे न्यायाधीश थे जिन्हें अनाचार के आरोप में महाभियोग की कार्यवाही का सामना करना पड़ा। राज्यसभा द्वारा महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद लोकसभा में अपने खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव आने के पहले न्यायमूर्ति सौमित्र सेन ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद से 1 सितंबर 2011 को इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद लोकसभा ने इस प्रस्ताव को रोक दिया। इसके पहले सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी डी दिनाकरन के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए राज्यसभा के सभापति ने एक न्यायिक समिति गठित की थी हालांकि उनके खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई शुरू हो पाती, इसके पहले ही उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया था।
नोट:- भारत के संविधान में अनुच्छेद 56 के अनुसार महाभियोग की प्रक्रिया ही राष्ट्रपति को हटाने के लिए प्रयुक्त की जा सकती है। अनुच्छेद 61 के अनुसार राष्ट्रपति को हटाने के लिए महाभियोग चलाने का आधार सिर्फ एक ही हो सकता है, वह है संविधान का अतिक्रमण। न्यायधीशों पर महाभियोग का उल्लेख अनुच्छेद 124(4) में मिलता है। इसके तहत सुप्रीमकोर्ट या हाईकोर्ट के किसी न्यायाधीश पर साबित कदाचार या अक्षमता के लिए महाभियोग का प्रस्ताव लाया जा सकता है

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