जानें- क्या होता है रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट और सीआरआर और बाजार पर इसका असर, UPSC के लिए है अहम

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रेपो रेट-

रेपो रेट अल्पकालिक(2 दिन से 90 दिन तक) आवश्यकताओ की पूर्ती हेतु अपनी वित्तीय प्रतिभूतियो को देकर जिस ब्याज दर पर वाणिज्यिक बैंक RBI से नगदी प्राप्त करते है रेपो रेट कहलाता है इससे बाज़ार में तुरंत प्रभाव आता है। बैंकों को अपने दैनिक कामकाज के लिए प्राय: ऐसी बड़ी रकम की जरूरत होती है जिनकी अवधि ज्यादा नहीं होती। इसके लिए बैंक जो विकल्प अपनाते हैं। इस कर्ज पर रिजर्व बैंक को उन्हें जो ब्याज देना पड़ता है, उसे ही रेपो दर कहते हैं। रेपो रेट कम होने से बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से कर्ज लेना सस्ता हो जाता है और इसलिए बैंक ब्याज दरों में कमी करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा रकम कर्ज के तौर पर दी जा सके। रेपो दर में बढ़ोतरी का सीधा मतलब यह होता है कि बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से छोटी अवधि के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा। साफ है कि बैंक दूसरों को कर्ज देने के लिए जो ब्याज दर तय करते हैं, वह भी उन्हें बढ़ाना होगा। इस समय रेपो रेट 6.25% है।

रिवर्स रेपो दर-

अल्पकालिक(2 दिन से 90 दिन तक) आवश्यकताओ की पूर्ती हेतु अपनी वित्तीय प्रतिभूतियो को देकर जिस ब्याज दर पर RBI वाणिज्यिक बैंको से नगदी प्राप्त करते है रिवर्स रेपो रेट कहलाता है इससे बाज़ार में तुरंत प्रभाव आता है। नाम के ही मुताबिक रिवर्स रेपो दर ऊपर बताए गए रेपो दर से उलटा होता है। बैंकों के पास दिन भर के कामकाज के बाद बहुत बार एक बड़ी रकम शेष बच जाती है। बैंक वह रकम अपने पास रखने के बजाय रिजर्व बैंक में रख सकते हैं, जिस पर उन्हें रिजर्व बैंक से ब्याज भी मिलता है। जिस दर पर यह ब्याज मिलता है, उसे रिवर्स रीपो दर कहते हैं। अगर रिजर्व बैंक को लगता है कि बाजार में बहुत ज्यादा नकदी है, तो वह रिवर्स रेपो दर में बढ़ोतरी कर देता है, जिससे बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपना धन रिजर्व बैंक के पास रखने को प्रोत्साहित होते हैं और इस तरह उनके पास बाजार में छोड़ने के लिए कम धन बचता है। इस समय रिवर्स रेपो रेट 6.00% है।

बैंक दर –

यह एक ब्याज दर है जिस पर जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंको को दीर्घ अवधि(91 दिन से 364दिन तक) के लिए ऋण देता है। अगर RBI बाज़ार में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ाना चाहता है तो वह बैंक दर को कम कर देता है इसके विपरीत जब RBI बाज़ार में मुद्रा की आपूर्ति को कम करना चाहता है तो वह बैंक दर का बढ़ा देता है।  इस समय बैंक रेट 6.50% है।

कैश रिजर्व रेश्यो (सीआरआर)-

सभी बैंकों के लिए जरूरी होता है कि वह अपने कुल कैश रिजर्व का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास जमा रखें। इसे नकद आरक्षी अनुपात कहते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि अगर किसी भी मौके पर एक साथ बहुत बड़ी संख्या में जमाकर्ता अपना पैसा निकालने आ जाएं तो बैंक डिफॉल्ट न कर सके। आरबीआई जब ब्याज दरों में बदलाव किए बिना बाजार से तरलता कम करना चाहता है, तो वह सीआरआर बढ़ा देता है। इससे बैंकों के पास बाजार में कर्ज देने के लिए कम रकम बचती है। इसके उलट सीआरआर को घटाने से बाजार में मनी सप्लाई बढ़ जाती है। लेकिन रीपो और रिवर्स रीपो दरों में कोई बदलाव नहीं किए जाने से कॉस्ट ऑफ फंड पर कोई असर नहीं पड़ता। रीपो और रिवर्स रीपो दरें रिजर्व बैंक के हाथ में नकदी की सप्लाई को तुरंत प्रभावित करने वाले हथियार माने जाते हैं, जबकि सीआरआर से नकदी की सप्लाई पर तुलनात्मक तौर पर ज्यादा समय में असर पड़ता है। इस समय सीआरआर 4% है।

एसएलआर यानी कि स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो-

वाणिज्यिक बैंकों के लिए अपने प्रतिदिन के कारोबार के आखिर में नकद, सोना और सरकारी सिक्यॉरिटीज में निवेश के रूप में एक निश्चित रकम रिजर्व बैंक के पास रखनी जरूरी होता है। इस रकम का इस्तेमाल किसी भी आपात देनदारी को पूरा करने में इस्तेमाल किया जा सकता है। अब वह रेट जिस पर बैंक यह पैसा सरकार के पास रखते हैं, उसे ही एसएलआर कहते हैं। इसके तहत अपनी कुल देनदारी के अनुपात में सोना आरबीआई के पास रखना होता है। इस समय एसएलआऱ 20.50% है।

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