इतिहास: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रिप्स मिशन की क्या है भूमिका, जानिए इस प्रस्ताव जुड़ी खास बातें…

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Simla Studio/Old Pix/March 31, 1942, A31e(i)On March 27, 1942 Mahatma Gandhi called at 3-Queen Victoria Road, New Delhi, and had an interview lasting over two hours with Sir Stafford Cripps.Sir Stafford Cripps sees Gandhiji to her car, as numerous journalists surrounded the leader and ask questions.

1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दक्षिण पूर्व एशिया के विभिन्न देशों में जापानी सेना के हाथों ब्रिटिश सेना को हार का सामना करना पड़ा था और यहां तक कि जापान की सेना ने भारत के भी कई क्षेत्रों पर हवाई हमले किये थे। जापान की फ़ौजों के रंगून (अब यांगून) पर क़ब्ज़ा कर लेने से भारत के सीमांत क्षेत्रों पर सीधा ख़तरा पैदा हो गया था। इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति रुज्वेल, ऑस्टेलियाई प्रधानमंत्री यार्न तथा चीनी राष्ट्रपति चाउ काई शेख ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल पर दबाव डाला की वह भारतीयों का युद्ध में सहयोग प्राप्त करने के लिए उनसे आकांक्षाओं के अनुकूल विचार विमर्श करेँ। भारतीयों ने इस शर्त पर मित्र राष्ट्रों को समर्थन देना स्वीकार कर लिया था कि भारत को ठोस उत्तरदायी शासन का त्वरित हस्तांतरण कर दिया जाये तथा युद्धोपरांत भारत को पूर्ण आजादी देने का वचन दिया जाये। परिणामतः ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने भारत के राजनीतिक एवं वैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए 11 मार्च 1942 को ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि इंग्लैंड के प्रसिद्ध समाजवादी नेता सर स्टिफ़र्ड क्रिप्स को शीर्घ नए सुझावों के साथ भारत भेजा जायेगा जो राजनैतिक सुधारो के लिए भारतीय नेताओं से परामर्श करेंगे। 22-23,मार्च 1942 सर स्टिफ़र्ड क्रिप्स दिल्ली आये। उन्होंने भारतीय नेताओ से लम्बी बातचीत कांग्रेस की ओर से मौलाना आजाद और पंडित जवाहरलाल नेहरु मुस्लिम लीग की ओर से मौहम्मद अली जिन्ना और हिंदू सभा की ओर से वीर सावरकर ने बात की। इनके अतिरिक्त देशी रियासतो के प्रतिनिधियों से भी बातचीत की गई विभिन्न पक्षों से वार्ता करने के पश्चात सर स्टिफ़र्ड क्रिप्स ने जो सुझाव दिए वे क्रिप्स सुझाव के नाम से जाने जाते है, उनके सुझाव निंम्नलिखित थे-

क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव

– डोमिनियन के दर्जे के साथ एक भारतीय संघ की स्थापना की जाएगी जो कि राष्ट्रमंडल के साथ संबंधों को तय करने के लिए स्वतंत्र होगा साथ संयुक्त राष्ट्र व अन्य अंतर्राष्ट्रीय निकायों में भागीदारी के लिए वह स्वतंत्र होगा।

– युद्ध की समाप्ति के बाद एक नए संविधान का निर्माण करने के लिए संवैधानिक सभा बुलाई जाएगी। इस सभा के सदस्य आंशिक रूप से प्रांतीय सभाओं के द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार चुने जायेंगे और आंशिक रूप से रजवाड़ों द्वारा नामित किये जायेंगे।

– ब्रिटिश सरकार नए संविधान को निम्नलिखित शर्तों पर ही स्वीकार करेगी:

– जो भी प्रान्त संघ में शामिल नहीं होना चाहता है वह अपना अलग संघ और अलग संविधान निर्मित कर सकता है।

– नए संविधान का निर्माण करने वाला निकाय और ब्रिटिश सरकार शक्तियों के हस्तांतरण और प्रजातीय व धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए एक संधि करेगा|

– गवर्नर जनरल का पद यथावत रहेगा और भारत की रक्षा का दायित्व ब्रिटिश हाथों में ही बना रहेगा|

क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों का पूर्ववर्ती प्रस्तावों से भिन्न होनाः क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव इसके पूर्ववर्ती प्रस्तावों से अनेक अर्थों में भिन्न थे-

– संविधान के निर्माण का अधिकार अब वास्तविक तौर पर भारतीयों के हाथों में था।

– संविधान निर्मात्री सभा के गठन हेतु एक ठोस योजना बनायी गयी थी।

– प्रांतों को अपना पृथक संविधान बनाने का विकल्प दिया गया था। यह व्यवस्था, अप्रत्यक्ष रूप से भारत का विभाजन सुनिश्चित करती थी।

– स्वतंत्र भारत के लिये यह अधिकार सुनिश्चित किया गया था कि उसे राष्ट्रमंडल से पृथक होने का अधिकार होगा।

– भारतीयों को प्रशासन में भागीदारी का भरपूर अवसर प्रदान किया जाना सुनिश्चित किया गया था।

क्रिप्स मिशन की असफलता के कारण

क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव भारतीय राष्ट्रवादियों को संतुष्ट करने में असफल रहे तथा साधारण तौर पर भारतीयों के किसी भी वर्ग की सहमति नहीं प्राप्त कर सके। विभिन्न दलों तथा समूहों ने अलग-अलग आधार पर इन प्रस्तावों का विरोध किया। कांग्रेस ने निम्न आधार पर प्रस्तावों का विरोध किया-

– भारत को पूर्ण स्वतंत्रता के स्थान पर डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा दिये जाने की व्यवस्था।

– देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के लिये निर्वाचन के स्थान पर मनोनयन की व्यवस्था।

– प्रांतों को भारतीय संघ से पृथक होने तथा पृथक संविधान बनाने की व्यवस्था, जो कि राष्ट्रीय एकता के सिद्धांत के विरुद्ध था।

– सत्ता के त्वरित हस्तांतरण की योजना का अभाव तथा प्रतिरक्षा के मुद्दे पर वास्तविक भागीदारी की व्यवस्था का न होना; गवर्नर जनरल की सर्वोच्चता पूर्ववत थी; तथा गवर्नर-जनरल को केवल संवैधानिक प्रमुख बनाने की मांग को स्वीकार न किया जाना।

– कांग्रेस की ओर से जवाहरलाल नेहरु तथा मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद को क्रिप्स मिशन के संदर्भ में परीक्षण एवं विचार विमर्श हेतु अधिकृत किया था।

मुस्लिम लीग ने भी क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया तथा इसके लिये निम्न तर्क दिये-

– एकल भारतीय संघ की व्यवस्था का होना उसे स्वीकार्य नहीं था।

– संविधान निर्मात्री परिषद के गठन का जो आधार सुनिश्चित किया था वह उसे स्वीकार्य नहीं था तथा प्रांतों के संघ से पृथक होने तथा अपना पृथक संविधान बनाने की जो विधि निर्धारित की गयी थी, उससे भी लीग असहमत थी।

– प्रस्तावों में मुसलमानों के आत्म-निर्धारण के सिद्धांत तथा पृथक पाकिस्तान की मांग को नहीं स्वीकार किया गया था।

अन्य दलों ने भी प्रांतों को संघ से पृथक होने का अधिकार दिये जाने का विरोध किया। उदारवादियों का मानना था कि प्रांतों को संघ से पृथक होने का विकल्प देना भारत की एकता एवं सुरक्षा के विरुद्ध है। हिन्दू मह्रासभा ने भी इस प्रावधान की आलोचना की। दलितों ने अनुमान लगाया कि विभाजन के पश्चात् उन्हें बहुसंख्यक हिन्दुओं की कृपा पर जीना पड़ेगा। सिक्खों का विरोध इस बात पर था कि विभाजन होने पर पंजाब उनसे छिन जायेगा।

अंग्रेजों ने कहा कि यह योजना 1940 के अगस्त प्रस्तावों का ही एक रुप है, जिसे अधिक स्पष्ट किया गया हो इसका उद्देश्य उस पुराने प्रस्ताव का अतिक्रमण करना नहीं है। अंग्रेजों की इस घोषणा से सरकार के प्रति शंका और बढ़ गयी।

क्रिप्स द्वारा प्रस्तावों से आगे आकर भारतीयों का विश्वास जीतने की असफलता तथा उनका यह कहना कि “इसे स्वीकार करो या छोड़ दो” गतिरोध के सबसे प्रमुख कारण थे। प्रारम्भ में क्रिप्स ने “मंत्रिमंडल के गठन” तथा “राष्ट्रीय सरकार” की स्थापना की बात कही, किन्तु बाद में वे अपनी बातों से मुकर गये तथा कहने लगे कि उनका आशय केवल कार्यकारिणी परिषद् के विस्तार से था।

प्रांतों के विलय या पृथक होने की व्यवस्था का प्रावधान अस्पष्ट था। संघ से पृथक होने के प्रस्ताव का विधानमंडल में 60 प्रतिशत सदस्यों द्वारा अनुमोदन किया जाना आवश्यक था। यदि इस प्रस्ताव का 60 प्रतिशत से कम सदस्य समर्थन करेंगे तब इसे प्रांत के वयस्क पुरुषों के सामान्य बहुमत से पारित होना आवश्यक होगा। यह व्यवस्था विशेष रूप से पंजाब एवं बंगाल के हिन्दुओं के लिये हानिकारक थी, भले ही वे भारतीय संघ में शामिल होना चाहते थे।

मिशन के प्रस्तावों में यह भी अस्पष्ट था कि सत्ता के हस्तांतरण संबंधी प्रावधानों को कौन लागु करेगा तथा कौन इनकी व्याख्या करेगा।

ब्रिटिश सरकार की वास्तविक मंशा यह थी कि क्रिप्स मिशन सफल न हो। क्योंकि वह भारतीयों को सत्ता के हस्तांतरण तथा देश की प्रतिरक्षा संबंधी जिम्मेदारी में भागीदारी, दोनों के विरुद्ध थी। उधर, चर्चिल (ब्रिटिश प्रधानमंत्री), एमरी (विदेश मंत्री), लिनलिथगो (वायसराय) तथा वेवेल (कमांडर-इन-चीफ) भी नहीं चाहते थे कि क्रिप्स मिशन सफल हो। वायसराय के वीटो (निषेधाधिकार) के मुद्दे पर स्टेफर्ड क्रिप्स तथा कांग्रेस के नेताओं के मध्य बातचीत टूट गयी।

गांधीजी ने क्रिप्स प्रस्तावों पर टिप्पणी करते हुये कहा कि “यह आगे की तारीख का चेक था, जिसका बैंक नष्ट होने वाला था” (It was post-dated cheque on a crashing Bank) । जवाहरलाल नेहरू ने क्रिप्स प्रस्तावों के संबंध में कहा कि “क्रिप्स योजना को स्वीकार करना भारत को अनिश्चित खण्डों में विभाजित करने के लिये मार्ग प्रशस्त करना था।”

इस प्रकार स्टेफर्ड क्रिप्स भारतीयों को निराशा एवं असमंजस के वातावरण में छोड़कर वापस इंग्लैंड लौट गये। भारतीय जो अभी भी फासीवादी आक्रमण के पीड़ितों के प्रति पूरी सहानुभूति की तस्वीर अपने मनो-मस्तिष्क में संजोये हुये थे, अंग्रेजी सरकार के रवैये से खुद को छला हुआ महसूस करने लगे थे। अब भारतीयों ने यह मानना प्रारम्भ कर दिया कि वर्तमान परिस्थितियां असहनीय बन चुकी हैं तथा साम्राज्यवाद पर अंतिम प्रहार करना आवश्यक हो गया है।

‘अगस्त प्रस्ताव’ की तुलना में क्रिप्स द्वारा लाया गया प्रस्ताव बेहतर था। इसमें भारत को ऐच्छिक रूप से राष्ट्रमण्डल से अलग होने का अधिकार मिला हुआ था। इस प्रकार क्रिप्स की इस योजना को लिनलिथगो के ‘अगस्त प्रस्ताव’ से अधिक प्रगतिशील कहा गया। गाँधी जी ने क्रिप्स योजना के बारे में कहा कि “यह एक आगे की तारीख का चेक था”, जिसमें जवाहरलाल नेहरू ने “जिसका बैंक नष्ट होने वाला था”, वाक्य जोड़ दिया।

क्रिप्स प्रस्तावों में भारत के विभाजन की रूपरेखा का संकेत मिल रहा था, अतः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंतरिम प्रबंध, रक्षा से सम्बधित योजना एवं प्रान्तों के आत्मनिर्णय के अधिकार को अस्वीकार कर दिया। दूसरी ओर पाकिस्तान की स्पष्ट घोषणा न किये जाने एवं संविधान सभा के गठन के कारण क्रिप्स प्रस्ताव को मुस्लिम लीग ने भी अस्वीकार कर दिया। पंजाब को भारत से अलग करने की योजना से सिक्खों में भी असन्तोष व्याप्त था। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इस प्रस्ताव के पीछे ब्रिटिश सरकार का मूल उद्देश्य युद्ध के दौरान सभी भारतीय वर्गों एवं दलों की सहायता प्राप्त करना था। इस प्रस्ताव में भारतीय हितों की अनदेखी की गयी थी।

निष्कर्ष

क्रिप्स मिशन द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिशों के प्रति भारतीयों का पूर्ण सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य भेजा गया था लेकिन जब स्टैफोर्ड क्रिप्स वापस गए तो अपने पीछे हताशा और कड़वाहट से भरे भारतीयों को छोड़ गये, जिनके मन में अभी भी फासीवादी आक्रोश के शिकार लोगों के प्रति संवेदना थी, जो यह महसूस करते थे कि देश की वर्तमान परिस्थितियाँ असहनीय हो चुकी है और अब समय आ गया है कि साम्राज्यवाद पर अंतिम और निर्णायक प्रहार किया जाये।

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