बतौर रिपोर्ट्स, भर्तियों को लेकर विवादों में रहने वाले उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने पिछले छह वर्षों में मुकदमेबाजी पर 2 करोड़ 36 लाख रुपये से अधिक खर्च कर दिए हैं। यह खुलासा जन सूचना अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई एक सूचना से हुआ है। आयोग ने इससे पहले 2013-2015 के बीच निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में मुकदमों पर 1 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए थे। यह खर्च, कर्मचारियों और परीक्षाओं के खिलाफ प्रतियोगी छात्रों की ओर से होने वाली मुकदमेबाजी पर किया गया है।

हालांकि, आयोग ने ताजा आरटीआई में मुकदमों की संख्या का खुलासा नहीं किया है। जबकि तीन वर्ष पहले मांगी गई सूचना में मुकदमों की संख्या भी बताई गई थी। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के मीडिया प्रभारी अवनीश पांडेय की ओर से आयोग से 11 मई 2008 को आरटीआई के तहत कुछ सूचनाएं मांगी गई थीं। पूछा गया था कि आयोग ने 1 अप्रैल 2012 से अब तक मुकदमों पर कितना खर्च किया गया है।

इसके साथ ही यह भी पूछा गया था कि, आयोग के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कितने मुकदमें पेंडिंग हैं। आयोग के जनसूचना अधिकारी सतीश चंद्र मिश्र ने 29 मई के भेजे गए अपने जवाब में बताया है कि 1 अप्रैल 2012 से 23 मई 2018 तक आयोग ने विधिक कार्य (मुकदमों की पैरवी) पर 2,36,58,601 रुपये खर्च किए हैं। हालांकि, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमों की जानकारी यह कहते हुए नहीं दी गई है कि सुप्रीम कोर्ट के 2011 के एक फैसले में दी गई व्यवस्था के तहत यह दिया जाना संभव नहीं है।

अवनीश के अनुसार आयोग ने 8 दिसंबर 2015 को इसी तरह की एक सूचना आरटीआई के तहत दी थी। इसमें बताया गया था कि आयोग ने 2013-15 के बीच आयोग ने मुकदमेबाजी पर एक करोड़ दस लाख रुपये से अधिक खर्च किए थे और 30 नवंबर 2015 तक सुप्रीम कोर्ट में 27 और हाई कोर्ट में 406 मामले पेंडिंग थे।

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